Monday, 20 May 2013

जमाव रिश्तों का ...




एक ज्योतिषी ने एक बार कहा था
उसे वह मिलेगा सब
जो भी वह चाहेगी दिल से
उसने मांगा
पिता की सेहत,
पति की तरक्की,
बेटे की नौकरी,
बेटी का ब्याह,
एक अदद छत.
अब उसी छत पर अकेली खड़ी
सोचती है वो
क्या मिला उसे ?
ये पंडित भी कितना झूठ बोलते हैं
.
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चाहते हैं हम कि बन जाएँ रिश्ते 
जरा से प्रयास से 
थोड़ी सी गर्मी से 
और थोड़े से प्यार से 
पर रिश्ते दही तो नहीं 
जो जम जाए बस दूध में 
ज़रा सा जामन मिलाने से .
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आखिर क्यूँ कर कोई उन्हें कहे अपना 
जो देते हैं यह बहाना अपनी दूरी का कि 
तुम्हारे करीब लोगों का जमघट बहुत है
अपना तो वो हो जो मिले जमघट में भी
अपनों की तरह, पूरे अधिकार से

Thursday, 9 May 2013

त्रिशूल,चीड़ और भांग --दिग दिगंत आमोद भरा...


 

आह हा आज तो त्रिशूल दिख रही है. नंदा देवी और मैकतोली आदि की चोटियाँ तो अक्सर दिख जाया करती थीं हमारे घर की खिडकी से। परन्तु त्रिशूल की वो तीन नुकीली चोटियाँ तभी साफ़ दिखतीं थीं जब पड़ती थी उनपर तेज दिवाकर की किरणें.
एकदम किसी तराशे हुए हीरे की तरह लगता था हिमालय। सात रंगों की रोशनियाँ जगमगाया करती थीं. एक अजीब सा सुकून और गर्व का सा एहसास होता था उसे देख. कि यह धीर गंभीर, शांत, श्वेत ,पवित्र सा गिरिराज हमारा है, कोई बेहद अपना सा. 

यूँ वो चीड़ के ऊँचे ऊँचे पेड़ भी कम लुभावने नहीं होते. सीधे, लंबे तने हुए वे वृक्ष जैसे संयम और संकल्प का पाठ पढाते हैं. बड़े बड़े आंधी तूफानों में भी सहजता और धीरता के साथ सीधे खड़े रहते हैं.अपनी प्रकृति के अनुरूप उनके फूल भी होते हैं. विभिन्न आकार के उन्हीं फूलों को ढूँढने हम घंटों उन चीड़ के जंगलों में घूमा करते थे, रोज रोज की इन बातों के बावजूद कि जंगल में बाघ है, चीड़ के आपस में रगड़ने से आग लग जाती है या जंगली चीड़ की नुकीली पत्तियाँ चुभ कर खरोंच बना देंगी पैरों में , हम दौड़ते भागते छोटे - छोटे उन पहाड़ों पर उछल कूद मचाते न जाने कितनी दूर निकल जाते फिर शाम ढलने पर होश आता तो इतनी दूर लौटने में नानी याद आ जाती परन्तु फिर भी यह क्रम रुका नहीं करता था. शायद चीड के उन फूलों को रंग कर, खूबसूरत सजावटी कोई वस्तु बनाने का उत्साह और खुशी, जंगल के उन सभी डर पर भारी पड़ा करता था.
फिर उन्हीं जंगलों में तो मिला करते थे किलमोड़े और जंगली बेर (हिसालू) भी, जिन्हें मन भर खाने के बाद अपनी छोटी छोटी जेबों में भर लाया करते थे , और घर में दोपहर को मम्मी की नज़रों से बच कर , घर के बाहर से ही एक अनगढ़ सा सिलबट्टा तलाश कर, उनकी खट्टी मिट्ठी चटनी बना करती थी.और फिर वहीँ पेड़ों से आडू और प्लम तोड़ कर या बड़े से पहाड़ी खीरे पर लगा कर चटखारे लेकर खाई जाती थी. जाने क्यों हम सब के घरवाले यह सब खाने को मना किया करते थे, हमारे स्कूल बंक करने के पेट दर्द के बहाने का कारण उन्हें हमेशा वे किलमोड़े ही लगा करते. पर राज की यह बात कोई नहीं जनता था कि उनसे कभी कोई परेशानी हमें नहीं हुई थी. सिवाय हाथ पैरों में लगी खरोंचों के, जिनके बारे में मम्मी को शायद आज तक पता नहीं.
 
खीरा , हिसालू,  किलमोड़ा 
यूँ मम्मी को यह समझाने में भी खासा वक्त लगा था. कि इस भांग में नशा नहीं होता, जिसके बीजों को नमक, हरी मिर्ची के साथ पीस कर हम मसाला बनाया करते थे और फिर उसके साथ उन बड़े बड़े नीबू की चाट, फिर नीबू में दही भी डालना मम्मी के हाजमे से बाहर की बात थी. वो तो भला हो पापा का जिन्होंने मम्मी को स्थानीय व्यंजनों पर व्याख्यान देकर समझा दिया था, हालाँकि पूरी तरह से वो आश्वस्त नहीं हो पाईं कभी.और इसीलिए वर्षों उस इलाके में रहने के वावजूद कभी चखी तक नहीं यह बेमेल चाट उन्होंने.
उन सीढ़ीदार खेतों में ही पत्थर से गाड़ा खोद कर स्टापू बनाना दुनिया का सबसे मुश्किल और महत्वपूर्ण काम हुआ करता था. अत: बारिश का होना और फिर थोड़ी देर में बंद हो जाना हमारे लिए बेहद आवश्यक था, जिससे जमीन थोड़ी मुलायम हो जाए और हम उसपर इक्का दुक्का (स्टापू ) काढ सकें. वर्ना सूखी मिट्टी में घेरा बनाकर सिर्फ गिट्टू ही खेले जा सकते थे.

वैसे वो सूखे खेत धूप में चादर बिछाकर बैठने के काम भी आते थे और ऐसे ही एक शुभ दिन हम दोनों बहने वहीँ एक पड़ोसन से, सुई से ही कान छिदवा कर आ गईं थीं. सोचा था अपनी इस बहादुरी के लिए तमगा न सही एक शाबाशी तो मिलेगी ही, परन्तु जो इन्फेक्शन पर लेक्चर मिला वो आज तक याद है.
मकानों के बीच सीढ़ीदार खेत (पिथौरागढ़)
ये लो हिमालय से खेतों तक पहुँच गए हम यूँ ही बात करते करते ..... आज किसी ने हिमालय के कुछ चित्र भेजे मेल में, तो रानीखेत, पिथौरागढ़ में बिताए बचपन की यादों का यह पिटारा खुल पड़ा.
काश लौट आता फिर से वो बचपन.
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Friday, 3 May 2013

चीखते प्रश्न...



कैसे कहूँ मैं भारतीय हूँ 
क्यों करूँ मैं गुमान 
आखिर किस बात का 
क्या जबाब दूं उन सवालों का 
जो "इंडियन" शब्द निकलते ही 
लग जाते हैं पीछे ...
वहीँ न , 
जहाँ रात तो छोड़ो 
दिन में भी महिलायें 
नहीं निकल सकती घर से ?
बसें , ट्रेन तक नहीं हैं सुरक्षित
क्यों दूधमुंही बच्चियों को भी 
नहीं बख्शते वहां के दरिन्दे ?
क्या बेख़ौफ़ खेल भी नहीं सकतीं 
नन्हीं बच्चियाँ ?
कैसे जाते हैं बच्चे स्कूल ?
क्या करती हैं उनकी मम्मियाँ 
क्या रखती हैं हरदम उन्हें 
घर के अन्दर बंद 
या फिर बाहर भी नहीं करतीं 
एक पल को नज़रों से ओझल.
क्या हैं वहां कोई नागरिक अधिकार? 
अपने किसी नागरिक की क्या 
कोई जिम्मेदारी लेती है सरकार ?
क्यों एक भी मासूम को नहीं बचा पाती 
दुश्मनों के खूनी शिकंजे से ?
कैसे वे मार दिए जाते हैं निर्ममता से 
उनकी जेलों में ईंटों से 
क्या होते है वहां पुलिस स्टेशन?
क्या बने हैं कानून और अदालतें?
या बने हैं सिर्फ मंदिर और मस्जिद 
गिरजे और गुरुद्वारे......
ओह.. बस बस बस ..
चीखने लगती हूँ मैं 
लाल हो जाता है चेहरा 
बखानने लगती हूँ 
अपना स्वर्णिम इतिहास 
सुनाने लगती हूँ गाथाएँ महान 
उत्तर आता है ..
ओह !! इतिहास है 
वर्तमान नहीं, 
और भविष्य का तो 
पता ही नहीं..
मैं रह जाती हूँ मौन,स्तब्ध 
और चीखने लगते हैं 
फिर से वही प्रश्न..

Monday, 29 April 2013

जंगल, फन और "मोहब्बतें"...

मैंने अपनी पिछली गाँव वाली पोस्ट में जिक्र किया था कि वहां की योजना बनाते वक़्त बच्चों के थोबड़े  सूज गए थे,और हमें समझ में आ गया था कि जब तक इन बच्चों के लायक भी किसी स्थान का चयन नहीं किया जाएगा हमारी भी गाँव यात्रा खटाई में पड़ी रहेगी। अपनी आँखों और मन को विटामिन G देने के लिए जरूरी था की  उनके विटामिन M (मस्ती ) का इंतजाम किया जाता। 

अभी इसी विषय पर जब दिमाग , मन और जेब की मंत्रणा चल रही थी इत्तेफाकन तभी टीवी पर फिल्म मोहब्बतें (यश  चोपड़ा निर्देशित, अमिताभ बच्चन, शाहरुख़ खान आदि अभिनीत) दिखाई जा रही थी ,शायद पहली बार किसी फिल्म से इतना डायरेक्ट फायदा हुआ , याद आया कि उसमें दिखाया जाने वाला गुरुकुल यहीं कहीं लन्दन के आसपास का कोई ऐतिहासिक महल है, तुरंत ही गूगल बाबा से संपर्क किया गया तो मालूम हुआ कि लन्दन से करीब 109 मील दूर ही यह लॉन्गलीट नाम की जगह है जहाँ यह भवन है, जिसका नाम भी "लॉन्गलीट हाउस" है और इसी कैंपस में है यू के का सबसे बड़ा सफारी और वहीँ पर है बच्चों के लिए एडवंचर पार्क भी। 
अब बच्चों को खुश करने के लिए और एक दिन हमारी खातिर उन्हें गाँव झिलवाने के लिए इस थ्री इन वन से अच्छा उपाय हमें नहीं सूझा, शाहरुख़ खान के प्रशंसक, खुले में दुनिया के जंगली जानवर देखने का रोमांच और उसपर एडवंचर पार्क भी ,भला इससे ज्यादा आकर्षक ऑफर उनके लिए और क्या हो सकता था. अत: सर्वसम्मति से इस योजना पर फाइनल मुहर लगा दी गई। और हम निकल पड़े अपनी दो दिन की यात्रा पर। जिसमें पहला दिन बच्चों के अनुसार हमें ब्रिटेन के गांवों की ख़ाक छाननी थी और फिर दूसरे  दिन लॉन्गलीट में आनंद से गुजारना था. 


अत: एक दिन प्रकृति के बीच टहल कर हमने रुख किया लॉन्गलीट का। यूँ लन्दन से करीब ढाई घंटे का  सड़क का सफ़र है परन्तु हम जहाँ से जाने वाले थे वहां से सिर्फ 45 माइल था और ज्यादा से ज्यादा डेढ़ घंटा लगने वाला था।मौसम बसंत का हो और आप यूरोप के कंट्री साईट में ड्राइव कर रहे हों तो ये डेढ़ घंटा तो जैसे यूँ बैठे और यूँ पहुंचे सा प्रतीत होता है अत : जैसे पलक झपकते ही हमें लॉन्गलीट की सीमा दिखाई देने लगी थी। 
सुबह का समय था और हमने वहां की तीनो जगहों का संयुक्त, पूरे दिन का टिकट ले रखा था इसलिए निर्णय किया गया कि पहले सफारी का लुत्फ़ उठाया जाए। 

सैकड़ों एकड़ भूमि पर बना यह ड्राइव थ्रू सफारी यू के का सबसे बड़ा सफारी है और कहा जाता है की अफ्रीका के खुले सफारी के बाद यही पहला भी है, जिसे 1966 में पहली बार आम जनता के लिए खोला गया, जहाँ शेर, चीता जैसे जंगली जानवर जंगल की तरह बाकी पशुओं के हाथ में हाथ डाल कर बेफिक्री से घुमा करते हैं और आप अपनी कार के बंद शीशों के एकदम सामने उन्हें उनकी हर प्रकार की प्राकृतिक अवस्था में देख सकते है।
सो हम अपनी कार लेकर उस जंगल में प्रवेश कर गए। 

पहले नजर आये जिराफ़, हिरन, जेब्रा जैसे शाकाहारी और मनुष्य को नुकसान न पहुँचाने वाले जीव जंतु। इसीलिए तब तक अपनी कार की खिड़कियाँ खोलकर चलने की इजाजत थी। फिर आये बन्दर, और तब सन्देश आया कि खिड़कियों के शीशे न खोले जाएँ। क्योंकि इन इंसानों के पूर्वज कहे जाने वाले जीव को उछल कूद की आदत है और लगभग सभी कारों पर बड़ी शान से वे सवारी करते जा रहे थे। हमने भी बड़ी कोशिश की, कि इनमें से कोई हमारी भी कार की छत पर विराजमान हो जाये परन्तु शायद हमारी कार के अंदर वे अपनी ही प्रजाति के दो, उन से भी खतरनाक जीवों से डर गए और पास नहीं फटके , आखिर उन्हें वहीँ छोड़ कर हम आगे  बढ़े । और फिर ऐसे ही कुछ छोटे बड़े जानवरों को निहारते , पुचकारते , खिलाते हम पहुंचे जंगल के राजा के दरबार  में , जहाँ प्रवेश करने से पहले खतरे और सुरक्षा की हिदायतों के अलावा थे दो बड़े बड़े लोहे की सलाखों के गेट, जो कि एक- एक करके ऐसे खुलते हैं जैसे बता रहे हों कि सावधान! अब आप खतरनाक ज़ोन में प्रवेश करने वाले हैं। और फिर शुरू होता है वह दृश्य जिसे देखकर खुद अपनी ही आँखों पर यकीन नहीं होता, निमग्न अपनी ही धुन में ,बेफिक्र  घूमते , खाते ,सोते , निहारते जंगल के वे जीव जिन्हें यूँ खुला देख सांस अटक जाए , इतने खूबसूरत लगते हैं कि अपनी कार से उतर कर उनके साथ खेलने को जी कर आये। सबसे ज्यादा कारों का कारवां वहीँ देखने को मिलता है। हर कोई जितना हो सके वहां रुक कर उन दृश्यों को आँखों में भर लेना चाहता है।, परन्तु पार्क में अभी और भी बहुत कुछ देखना बाकी था अत : सभी धीरे धीरे आगे बढ़ते जा रहे थे और फिर उसके बाद चीता , हाथी , गैंडा आदि सभी जंगल वासियों से मिलते मिलाते हम उनकी गृह सीमा से बाहर आ गए .


अब बारी थी एड्वंचर पार्क की - जिसमें बच्चों के झूलों , पार्क , खाने पीने के स्टाल के अलावा मुख्य आकर्षण था - "एनीमल किंगडम" जहाँ दुनिया के दुर्लभ जीवों को करीब से देखा जा सकता है, और एक बड़ी सी झील में विचरते सी लायन को देखने के लिए क्रूज की सैर की जा सकती है . उस नौका विहार के दौरान उन सी लायंस  का नौका से दर्शकों द्वारा फेंकी गई मछलियों को पाने के लिए उछल उछल कर आना , एक  दूसरे  से टक्कर लेना और अपनी मार्मिक सी गुर्राहट में खाने के लिए चिल्लाना एक अजीब सा रोमांच पैदा करता है।
 
इसके अलावा बच्चों के लिए भूल भुलैया , जंगल की सैर करने के लिए छोटी सी रेलगाड़ी और "आसमान के शिकारी " नामक एक शानदार पक्षियों का एक शो भी होता है और यह सब मिलकर पिछले ६ ०  वर्षों से एक पारिवारिक पिकनिक के लिए बेहतरीन और सर्वप्रिय जगह के रूप में इस जगह की पहचान बनी हुई है. 

अत: इन सभी जगहों का  आनंद  लेने के बाद जब हम बाहर निकले तो वहां बर्गर , पिज़्ज़ा  आदि खाद्य पदार्थों के स्टाल और कुछ कैफ़े से आती हुई सुगंध ने पेट के चूहों को भी कूदने का मौक़ा दे दिया अत: उन्हें शांत करने के पश्चात हमने प्रवेश किया उस महल में जिसे देखने के लिए हम अब तक बेताब थे और जो एक तरफ बड़ी खूबसूरत झील , दूसरी तरफ लंबा हरा मैदान और अपनी उत्कृष्ट वास्तु कला से हमें सुबह से ही लुभा रहा था।

करीब 900 एकड़ भूरी मिट्टी के मैदान पर बना यह "लॉन्ग लीट हाउस" ब्रिटेन में उच्च एलिज़ाबेटन वास्तुकला का सबसे अच्छा उदाहरण है और आम जनता के देखने के लिए खुले सबसे सुंदर और आलीशान घरों में से एक माना जाता है.
1568 में सर जॉन थायेन द्वारा बनाया गया, लॉन्ग लीट हाउस, बाथ के सप्तम मार्कीस (राजकुमार) अलेक्जान्द्र थाएन का घर है। जिसका दौरा 1575 में एलिजाबेथ प्रथम ने किया और उनके हस्ताक्षर वहां रखी एक पुस्तक में अब भी दृष्टिगत हैं. यह पहला ऐसा शानदार घर था जिसे 1 अप्रैल 1949 को पूरी तरह से व्यावसायिक आधार  पर जनता के लिए खोला गया. 




महल में प्रवेश करते ही एक तरफ कुछ राजसी पोशाक लटकी हुई दिखाई देती हैं जो कि दर्शकों के लिए हैं। जिसे पहन कर यदि वे चाहें तो पूरे महल के दर्शन कर सकते हैं और बेशक कुछ समय के लिए ही सही खुद के एक राजसी परिवार का सदस्य होने का मुगालता पाल सकते हैं। अत: यह कसर हमने भी नहीं छोड़ी और एक अच्छा सा गाउन लटका के आगे प्रस्थान किया। अब शुरू होते थे राजसी परिवार की भव्यता को दर्शाते वे बड़े बड़े आलिशान कमरे जिनमें शामिल हैं बड़े बड़े पुस्तकालय , खाने के  कमरे जो भव्य बर्तनों से सजे हुए थे , बैठने , सोने और नहाने के कमरे , श्रृंगार गृह , आलीशान लॉबीज़ और सलून जो अपने भव्य इतिहास के साथ अपनी अनुपम बनावट की कहानी भी कहते चलते है।

महल की दिवार पर बने बड़े पारिवारिक वृक्ष के अलावा  एक जगह ऐसी भी है,जो एक अनुचर के वध की गाथा कहती है। एक किंवदंती के  अनुसार वेमाउथ की दूसरी वेसकाउनटेस लूसिया कॉरट्रेट जिसे "ग्रे लेडी" के नाम से जाना जाता है, की आत्मा इस महल में निवास करती है जो अपने उस वफादार अनुचर को ढूंढती है, जिसका इस जगह पर क़त्ल कर के दफना दिया गया था। और बाद में इस महल की मरम्मत के दौरान एक कंकाल और शुरूआती सत्रहवी शताब्दी के कुछ कपडे इस जगह से बरामद हुए थे, माना जाता है कि वे इसी अनुचर के ही थे. 

इस तरह इस महल की भव्यता और इतिहास को देख - समझ कर ब्रिटेन के एक भूतिया महल को देखने की भी इच्छा पूर्ति के साथ हम इस आलिशान घर से जब बाहर निकले तो उन राजसी चोगों को उतार कर वापस करते हुए एक युग से वापस वर्तमान में दाखिल होने का एहसास लिए हुए थे। 
और इसी एहसास के साथ वहां की एक दूकान से एक सुविनियर खरीद कर हमने वापसी का रास्ता ले लिया।
इस सिर्फ एक दिन में हमने गुजारा था बेहद खुशनुमा , रोमांचकारी और मनोरंजक समय जो आगे कुछ महीनो के लिए शहरी भाग दौड़ से टक्कर लेने के लिए जरूरी ऊर्जा देने के लिए काफी था .


Friday, 19 April 2013

थोड़ा अपना सा,थोड़ा बेगाना सा ..


इस शहर से मेरा नाता अजीब सा है। पराया है, पर अजनबी कभी नहीं लगा . तब भी नहीं जब पहली बार इससे परिचय हुआ। एक अलग सी शक्ति है शायद इस शहर में कि कुछ भी न होते हुए भी इसे हमने और हमें इसने पहले ही दिन से अपना लिया। अकेलापन है, पर उबाऊ नहीं है। सताती हैं अपनों की यादें, कचोटता है इतिहास, बेबस कर देती हैं दूरियां फिर भी ...जाने क्या है कि इससे जुड़ा हुआ ही महसूस करती हूँ . एक सुरक्षा कवच की तरह यह सहेजे रहता है मुझे। जब भी कभी जिन्दगी से निराशा सी हुई इसने ही संभाला है, फैला देता है ये अपनी अकपट सी बाहें और मैं अपनी सारी नश्वरता उसे सौंप देती हूँ , हो जाती हूँ हवा सी हलकी फिर से बहने को उसी दिशा में जिस में चलना चाहिए मुझे. इस शहर ने मुझे सपने नहीं दिए पर उन तक पहुंचने की राह दिखाईं और फिर उन्हें पूरा करना सिखाया. इस शहर ने मुझे मुझतक पहुंचाया.मुझसे मेरा परिचय कराया और खुद से दोस्ती करना भी सिखाया. 


कुछ भी अतिरेक नहीं होता इस शहर में . समय पर सब कुछ होता है , व्यवस्थित सा। यहाँ तक कि मौसम भी कहे अनुसार ही चलता है, अपने ही समय पर डेफोडेल आते हैं और अपने ही समय पर गुलाब। सर्दी और गर्मी की भी अपनी सीमायें हैं . वो भी एक दूसरे के क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करतीं फिर आदमी की तो विसात ही क्या। सब कुछ संतुलित. यहाँ जिन्दगी से डर नहीं लगता। कल ऐसा होगा तो क्या होगा ये खौफ नहीं होता। उसने देखा तो क्या सोचेगा यह ख़याल नहीं आता। सड़क पर अपने ही साए से भय नहीं लगता। नहीं होती लाठी हाथ में पर पीठ भी झुकी नहीं होती। बस जरा इसके स्वभाव में ढलने की बात है फिर कुछ भी तो असहज नहीं लगता।

 शायद इसलिए जब जब जिन्दगी की शीत लहर ने छुआ एक धूप की किरण इसने हमेशा पहुंचा दी सहलाने को। गरमाने को मन और देने को हौसला चलते जाने को। इस बेगानी धरती पर अब अपने ही बेगाने लगे तो लगें पर यह शहर अपना सा ही लगता है।आलम यह कि अपनों से दूरियों और यायावरी की आदत के वावजूद यह शहर अब घर लगता है। अब कहीं से भी आकर इसकी सरहद के अन्दर पहुंचना सुकून देता है .

ऐसा ही है यह शहर लन्दन  - कुछ कुछ बेगानों सा फिर भी अपना सा , जाना पहचाना सा। । ये एकदम रुई से बादल हाथों की पहुँच से बस थोडा सा ही दूर, एकदम अभी अभी धुल कर आया जैसे, नीला स्वच्छ आसमान, बादलों के बीच में से शरारती बच्ची की तरह झांकती यह धूप और नादान बच्चे की तरह कहीं भी, कभी भी टपक पड़ने वाली ये बूँदें , सब अपनी सहेलियां लगने लगीं हैं,जिनके आसपास रहने से उनकी महत्ता पता नहीं लगती पर दूर जाते ही फिर मिलने की तड़प सी हो आती है। 
ऐसे ही सुकून सा आ जाता है इस शहर से गले मिलकर .
हाँ यह शहर अब अपना अपना सा लगता है।


Monday, 15 April 2013

बड़ा हुआ बच्चा.



एक मित्र को परिस्थितियों से लड़ते देख, उपजी कुछ पंक्तियाँ 

पढ़ा था कहीं मैंने 
किसी का लिखा हुआ कि
 "शादी में मिलता है 
गोद में एक बच्चा 
एक बहुत बड़ा  बच्चा".
अक्षम हो जाते हैं जब 
उसे और पालने में 
उसके माता पिता,
तो सौंप देते हैं 
एक पत्नी रुपी जीव को. 
जिसे देख भाल कर ले आते हैं वे 
किसी दूसरे के घर से .
फिर वह पत्नी पालती है, 
उस बड़े हो गए बच्चे को.
झेलती है उसकी सारी नादानियां 
भूल कर खुद को .
लगा देती है सारा जीवन 
उसे संवारने में फिर से. 
खो देती है अपना अस्तित्व 
बचाने के लिए उस बड़े बच्चे का अहम्. 
खुद बन जाती है छोटी 
और होने देती है उसे बड़ा.
वो बड़ा बच्चा होता रहता है बड़ा 
और नकार देता है उसका योगदान 
क्योंकि वो तो छोटी है.फिर 
उसे कैसे बड़ा कर सकती थी वो भला.

Tuesday, 9 April 2013

सुकून के वास्ते, ये गाँव के रास्ते...(कोट्स वोल्ड)



मेरे ख़याल से घुमक्कड़ी शौक या आदत नहीं बल्कि एक रोग है। एक ऐसा रोग जो लग गया तो लग गया फिर इससे छुटकारा नामुमकिन सा है। वक़्त के साथ इसकी गंभीरता कम बेशक हो जाये , या हो सकता है बाहर से यह रोग नजर न आये परन्तु अन्दर ही अन्दर सालता जरूर रहता है। अब इसे अपना सौभाग्य कहूँ या अपने - अपनों का दुर्भाग्य कि यह रोग मुझे बचपन से लगा हुआ है और इन तानो के वावजूद कि " घूमने का नाम लो तो यह चिता से भी उठ खड़ी हो "  इस रोग के निदान के लिए हर दूसरे - तीसरे महीने तो मुझे अपने शहर से दूर किसी जगह की डोज लेनी आवश्यक हो जाती है। 


अब ब्रिटेन में मौसम पर इतने चुटकुले ऐसे ही नहीं सुनाये जाते। "मौसम " यहाँ का राष्ट्रीय मजाक है। और इस बार इंग्लैण्ड में मौसम का मजाक कुछ ज्यादा ही हो जाने के कारण कहीं दूर जाने की योजना तो बन नहीं पाई अंत में तय हुआ कि सप्ताहांत में कहीं आसपास ही टहल आया जाये। 

लन्दन की चलती पुर्जे सी जिन्दगी से दूर कहीं सुकून में कुछ घंटे बिताने के उद्देश्य से सोचा गया कि " "कोट्स वोल्ड"  की सैर कर आया जाये।"कोट्स वोल्ड" ,  - लन्दन से करीब दो घंटे की ड्राइव पर, दक्षिण पश्चिमी और मध्य इंग्लैण्ड में स्थित, प्राकृतिक सुन्दरता से परिपूर्ण एक पहाड़ी इलाका है . करीब पच्चीस माइल में फैला हुआ और करीब नब्बे माइल लंबा यह पूरा क्षेत्र, ऑक्सफोर्ड शायर एवं ग्लुस्टर शायर समेत सात काउंटी से घिरा हुआ है। और इसमें छोटे छोटे कई एतिहासिक और पुरातन गाँव हैं, गाँवों के बीच से बहती हुई नदियाँ हैं, छोटे छोटे टीले से पहाड़ हैं जिन्हें काफी हद तक उसी रूप में संरक्षित करके रखा गया है।इनमें से  "ब्रौटन ऑन द वाटर"  और स्टरडफोर्ड  अपोन एवोन की सैर मैं आपको करवा चुकी हूँ अत: अब बाकी बचे गांवों में - बिबरी, चेल्तेंनहम, बरफोर्ड और उनके बीच रास्ते में जो भी मिले, उन गाँवों में घूम आने का प्लान बनाया गया। 

योजना तो हमने बना ली,मगर अभी एक बाधा बाकी थी। गाँव के नाम से बच्चों की ना - नुकर शुरू हो गई थी। माथे पर हाथ रखकर वो बुदबुदाने लगे थे कि पूरा एक दिन हम वहां करने क्या जा रहे हैं। आखिर कितनी देर प्राकृतिक सुन्दरता निहारेंगे। उनकी आँखें तो अभी ठीक हैं, ज्यादा बिटामिन "G" (ग्रीनरी) की उन्हें जरूरत नहीं है। अब उनके सड़े हुए बूथों के साथ जाना तो संभव नहीं था अत: समझौता किया गया कि पहले एक दिन वे हमारे साथ गाँव घूमेंगे और दुसरे दिन हम उनके साथ उनके पसंद की जगह। तब जाकर बात बनी। अब बच्चों की पसंद की जगह क्या थी वह सब बाद में, पहले बात गाँव की।

हालाँकि इन गाँवों में ऐसा कुछ भी नहीं जो भारतीय दृष्टि से गाँव की परिभाषा पर ठीक बैठता हो। (यह भी मैं सुनी सुनाई बातों और टी वी फिल्मो में देखे गाँवों के आधार पर कह रही हूँ, क्योंकि आजतक मैंने  कोई भी भारतीय गाँव नहीं देखा है, और इसी को मैं अपने गाँव के प्रति अपार आकर्षण का कारण मान लेती हूँ ) न गोबर से लिपे पुते घर, न बुनियादी सुविधाओं की कमी और न ही सडकों पर घूमती या घरों में पाली गईं गाय, भैंसे। परन्तु फिर भी बहुत कुछ ऐसा है जो लन्दन जैसे शहर से इन्हें अलग करता है। मकानों की पुरातन वास्तुकला, खाने पीने के लिए मैकडोनल्स या के ऍफ़ सी जैसी चेन्स के बदले पुराने तरह के कैफे और उनमें परोसे जाने वाले परंपरागत फिश एंड चिप्स जैसे अंग्रेजी पकवान. शांत, सुन्दर , छोटी छोटी सड़कें, सभ्य सरल मित्रवत नागरिक और सबसे बड़ी बात शहरों से इतर वाहन पार्किंग की कोई समस्या नहीं, कोई यमराज रुपी पार्किंग हवलदार यहाँ वहां घूमता / घूरता नजर नहीं आता और आप, इस खौफ से बेखबर कि जाने कब कहाँ जुर्माना लग जाए मुक्त हवा से बिचरते रहते हैं.
कुल मिलाकर छोटे छोटे से ये गाँव एक विकसित देश का हिस्सा होने के साथ साथ इस बात का भी एहसास कराते रहते हैं कि बेशक मानव चाँद पर पहुँच जाए और क्यूँ न वह हो जाए पूरी तरह मशीनों पर आश्रित। परन्तु प्रकृति की महत्ता और उसका सुकून आज भी उसके लिए संजीवनी की तरह है जो उसे संरक्षण ही नहीं देती बल्कि उसकी चलती साँसों का शुद्धिकरण भी कर देती है।

इन गाँवों में आज भी दिखती है वो अंग्रेजी संस्कृति जो शहरों में पूरी तरह नदारद है। "बिबरी " की संकरी सडकों पर चलती पुरानी मॉडल की महंगी कारें, उनमें सजे धजे बैठे वृद्ध जोड़े और यहाँ तक कि पालतू कुत्तों को घुमाने के लिए भी सूट , बूट और टाई लगाकर बेहद कायदे से निकले वहां के नागरिक, जो कुत्तों द्वारा त्याग किया गया मल साथ लाये प्लास्टिक के थेली में उठा रहे थे और जिसे बाद में वह निर्धारित जगह पर फेंकेंगे, इस बात का संकेत दे रहे थे कि दुनिया में कहीं अगर डिप्लोमेसी और सफैस्टीकेशन की परिभाषा पूछी जाए तो अंग्रेजों का आज भी कोई सानी नहीं। यह और बात है कि अब इनकी भी यह संस्कृति सिर्फ इन गाँवों में ही देखने को मिलती है, शहर तथाकथित रूप से मॉडर्न या कहूँ कि गंदे हो चले हैं। 

खैर जो भी हो एक दिन में सारी प्रकृति आँखों में भरकर हम चल पड़े। कंट्री साईट में यूरोप का कोई मुकाबला नहीं। अब तक के रास्तों में ही शहरी थकावट उतर चुकी थी, मन और दिमाग ताज़ा हो चुका था और हम तैयार थे अपनी दूसरी मंजिल के लिए - जो था लॉन्ग लीट . इसकी बातें अगली पोस्ट में ...अगर लिख गईं तो :). 
तब तक आप निहारिये इन तस्वीरों को. 

















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