

शिखा के रचना संसार में सबकुछ मौजूद है.इसे गजल, मुक्तक, या फिर कोई नाम देना बेईमानी होगा. अगर आप सिर्फ कविता को महसूस करना चाहते हैं तो यहाँ आयें. आवेश (Journalist) www.katrane.blogspot.com




आज कुछ पल सुकून के मिले थे शुक्रवार था .सप्ताहांत शुरू हो चुका था ,फुर्सत के क्षण थे तो यादों के झरोखे खुल गए और कुछ खट्टे मीठे पल याद आते ही जहाँ होठों पर मुस्कराहट आई वहीँ मन में एक सवाल हिल्लोरे लेने लगा... सोचा आपलोगों से बाँट लूं शायद जबाब मिल जाये.हुआ यूँ कि एक बार एक जबर्दस्त बीमारी ने हमें आ घेरा तकलीफ कुछ ज्यादा ही बढ गई थी जब सहा ना गया तो २-४ आंसूं भी लुढ़क पड़े थे .....मेरी ८ साल की बेटी और ६ साल का बेटा भी पास ही बैठे थे और व्याकुल थे माँ की हालत देख कर . हमारी आँखे गीली देख बिटिया की आँखें भी भर आयीं , उससे रहा न गया तो हमें आराम पहुँचने की गरज से कहने लगी "मम्मा ! नानी को फ़ोन लगाऊं ? उनसे बात कर लो आपको अच्छा लगेगा ...दर्द कम हो जायेगा "बेचारी छोटी सी बच्ची को लगा जैसे उसकी तकलीफ माँ की गोद में आकर कम हो जाती है वैसे ही मेरी भी अपनी माँ से बात कर के कम हो जायेगी.वहीँ मेरा ६ वर्षीय बेटा था वो भी व्याकुल था छूटते ही उसने अपना कंसर्न दिखाया और बड़े रोबीले अंदाज में अपने पापा को बोला " डैड! अब आप बस कल ही किसी काम वाली का इंतजाम करो मम्मी की तबियत ठीक नहीं है फिर खाना कौन बनाएगा?" इतनी तकलीफ के वावजूद एक हलकी सी हंसी हमारे होठों पर आ गई और ये सोच भी .....कि दोनों बच्चों की परवरिश एक ही जैसी कर रहे हैं हम, दोनों बच्चे प्यार भी बराबर करते हैं, पर कितना फर्क है दोनों के प्यार जताने में जहाँ बेटी ने तकलीफ का इलाज़ भावुकता और भावनाओं से निकाला ,वहीँ बेटे ने व्यावहारिकता से ...ये सोच इतनी परिपक्व नहीं थी कि हम कह सके कि माहौल या शिक्षा से मिली थी ..ये एक प्राकृतिक सोच थी जो प्रकृति से ही मिली थी
अचानक ही हमें जोन ग्रे कि पुस्तक "Men are from Mars Women are from Venus कि कुछ पंक्तियाँ याद आ गईं जहाँ उन्होंने कहा है कि "सोचिये एक बार बहुत पहले मार्स वालों (मंगल गृह ) ने वीनस (शुक्र गृह ) का पता लगाया और उन्हें उन खुबसूरत प्यारे लोगों से प्यार हो गया ..वीनस वालों ने भी खुली बाहों से उनका स्वागत किया और वे खुश रहने लगे उसी तरह अलग- अलग प्लानेट के वासी बनकर. फिर एक बार वे प्रथ्वी पर आये और वहां के माहौल के असर से धीरे धीरे भूल गए कि वो अलग- अलग प्लानेट के वासी हैं, और एक दूसरे से स्वाभाव और गुणों में भिन्न हैं "...बस तब से ये होड़ जारी है."तो जब प्रकृति ने ही स्त्री और पुरुष को अलग -अलग गुण और सोच से नवाजा है तो हम क्यों उन्हें समान बनाने पर तुले हुए हैं ?
जहाँ उसने स्त्री को प्रेम, भावनाएं ,भावुकता , कोमलता ,त्याग जैसे गुणों की अधिकता दी है ,वहीँ पुरुषों में जोश, व्यावहारिकता ,ताक़त और नापतोल जैसे गुण अधिक पाए जाते हैं .और फिर दोनों के मिलन से बनता है एक संतुलित समाज ...फिर क्यों हम एक समान बनने की होड़ में प्रकृति के संतुलन में बाधा पहुंचा रहे हैं?
क्या हम अपने स्वाभाविक गुणों के साथ एक दूसरे को सम्मान नहीं दे सकते ?
जरा गौर कीजिये आप भी.



सपनो को बंद करके पलक पर थे हम चले।
शब्दों के कुछ फूल मन बगिया में जो खिले
समेट कर आज इन्हें बिखरा दिया है इसकदर
तमन्ना है की आपकी पलकों पर ये सजें
बड़ी शिद्दत से बिछाये बैठे थे
प्यार के गलीचे को
खबर क्या थी उसमें
खटमल भी आ जाया करते हैं
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आज इस बारिश की
बोछार देख याद आया
तेरा प्यार भी कभी
यूँ ही बरसा करता था.
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आसमां आज कुछ
झुका झुका सा लगता है
शायद ऊपर आज
डांस प्रोग्राम् है
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पहले हम कहते थे
ये धरती चपटी है
अब कहते हैं कि
पृथ्वी गोल है
पर कब समझेंगे की
ये प्रकृति अनमोल है.
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आज भी जब दिल करता है
की हंसें हम
तो खुद ही हो जाती हैं
ये आँखें नम
यूँ तो रोज़ आते हैं,
सेंकडों परिंदे मेरी मुडेर पर।
पर किसी के भी पंजों में,
तेरी चिठ्ठी कहाँ होती है.
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जैसे आये थे हम
उल्टे पैर लौट जायेंगे
तेरी गली में अब
शाम कहाँ होती है ।
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