Thursday, 8 December 2016

हाय दिसंबर तुम बहुत प्यारे हो...

सुबह की धुंध में 
उनीदीं आँखों से 
देखने की कोशिश में 
सिहराती हवा में,
शीत में बरसते हो,
बर्फीली ज्यूँ घटा से. 
लिहाफों में जा दुबकी है 
मूंगफली की खुशबू. 
आलू के परांठे पे 
गुड़ मिर्ची करते गुफ्तगू. 
लेकर अंगडाई क्या मस्ताते हो 
हाय दिसंबर तुम बहुत प्यारे हो.  

Tuesday, 22 November 2016

बेहतरीन इंसान की मिसाल भी थे डॉ विवेकी राय (एक श्रद्धांजलि)

एक बेहद दुखद सूचना अभी अभी मिली है कि प्रख्यात हिंदी साहित्यकार डॉ. विवेकी राय का आज सुबह पौने पांच बजे वाराणसी में निधन हो गया है। बीते 19 नवंबर को ही उन्होंने अपना 93वां जन्मदिन मनाया था. 
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा यश भारती से भी सम्मानित विवेकी राय जी ने हिंदी में ललित निबंध, कथा साहित्य, उपन्यास के साथ साथ भोजपुरी साहित्य में भी एक आंचलिक उपन्यासकार के रूप में खूब ख्याति अर्जित की थी और उनकी रचनाएं मैंने ब्लॉग्स पर पढ़ीं थी.

यूँ मैं विवेकी राय जी से कभी मिल नहीं पाई, परंतु मेरे जीवन में उनका एक विशेष स्थान है - मेरी पहली पुस्तक (समृतियों में रूस)पर पहली टिप्पणी स्वरुप उनके ही आशीर्वचन हैं. 
असल में मैंने अपने ब्लॉगर साथियों के उत्साह वर्धन पर पुस्तक लिख तो ली थी परंतु उसे प्रकाशित करवाने के लिए सशंकित थी. मुझे एक ईमानदार सलाह की जरुरत थी. तब मैंने एक मित्र के द्वारा पुस्तक की पाण्डुलिपि उन्हें भिजवाई कि यदि हो सके तो कुछ पन्ने पढ़कर ही सही वह यह बता सकें कि वह एक यात्रासंस्मरण के रूप में छपवाने लायक है भी या नहीं.
वे अस्वस्थ थे, उनकी आँखों में तकलीफ रहती थी, ज्यादा पढ़ नहीं पाते थे. परन्तु मुझे सुखद आश्चर्य हुआ जब उन्होंने थोड़ा -थोड़ा करके पूरी किताब पढ़ी और मेरे जीवन की सबसे अनमोल और खूबसूरत टिप्पणी मुझे दी. 
मेरे मित्र के यह पूछने पर कि "किताब कैसी लगी ?" उन्होंने दो शब्द कहे " लेडी सांकृत्यायन" यह सुनकर मित्र हँसे और पूछा "कुछ ज्यादा नहीं हो गया ?" वे बोले "बिलकुल नहीं, बस भाषा पर थोड़ा सा और कमांड आ जाये और वह समय के साथ आ जायेगा" और इसके बाद किताब पर आशीर्वचन स्वरुप उन्होंने कुछ पंक्तियाँ भी लिखकर भेजीं.
मेरे लिए उनके ये शब्द एक ऐसी जड़ी बूटी की तरह थे जिसने मेरे मन के न सिर्फ सब संशय दूर कर दिए बल्कि आगे चलने का सही मार्ग भी मुझे दिखाया. 
एक सशक्त, वरिष्ठ साहित्यकार का एक एकदम नए रचनाकार के प्रति यह विनीत व्यवहार न सिर्फ मुझे उनके प्रति आदर और श्रद्धा से भर गया बल्कि अब तक वरिष्ठ और स्थापित साहित्यकारों के गुरूर पूर्ण व्यवहार के बारे में सुनी हुई बातों को भी धूमिल कर गया था. 
एक ऐसे बेहतरीन रचनाकार से न मिल पाने का अफ़सोस मुझे आजीवन रहेगा और उनके शब्द मुझे हमेशा प्रेरणा देते रहेंगे 
हिन्दी साहित्य के इस पुरोधा को शत शत नमन .

Tuesday, 27 September 2016

लन्दन में रथयात्रा ... एक चित्रमाला.

यूँ मैं बहुत धार्मिक नहीं और पूजा पाठ में तो यकीन न के बराबर है. पर मैं नास्तिक भी नहीं और उत्सवों में त्योहारों में बहुत दिलचस्पी है. उनमें यथासंभव भाग लेने की कोशिश भी हमेशा रहा करती है.
ऐसे में जब पता चले कि अपने ही इलाके में जगन्नाथ भगवान की रथयात्रा का आयोजन है तो जाए बिना रहा नहीं जाता. भारत में, पुरी में तो इस तरह के आयोजन देखने का न कभी संयोग हुआ न ही कभी हिम्मत, परन्तु लन्दन में इन आयोजनों के साथ अनुशासन और सुरक्षा के ऐसे इंतजाम होते हैं कि इनमें शामिल होने के लिए सिर्फ मन होने से काम चल जाता है हिम्मत जुटाने की जरुरत नहीं पड़ती.
तो इस रथयात्रा की आँखों देखी झलकियां हाज़िर हैं - हालाँकि आयोजन करने वाले हरे राम हरे कृष्ण वाले थे यानि कि इस्कॉन ने आयोजन किया था परन्तु जो भी था दर्शनीय तो अवश्य ही था.
कार्यक्रम के मुताबिक रथयात्रा - इल्फोर्ड टाउन हॉल से ठीक दोपहर बारह बजे शुरू होकर करीब एक मील चलती हुई वेलेंटाइन पार्क में ठीक १ बजे पहुंची. समय का अनुशासान आवश्यक था क्योंकि इस दौरान इस मुख्य सड़क पर वाहनों का आवागमन बंद किया हुआ था.
पार्क में एक छोटा सा मेला लगा हुआ था, वहीँ भगवान जगन्नाथ के विश्राम और भंडारे की व्यवस्था थी.
तो चलिए चलते हैं - कदम दर कदम, तस्वीरों के ज़रिये, इस यात्रा के साथ -
 भगवान के लिए सड़क बुहारती एक भक्तिन 


सड़क बंद का आधिकारिक नोटिस  


 प्रसाद बांटती एक स्वयंसेवी 



 रथ खींचते भक्त 


नाचते गाते लोग  





ये बच्चियां पूरी तरह तैयार थी उत्सव के लिए. बीच वाली पूरे रास्ते अपने साथियों को जगन्नाथ भगवान और उनके परिवार की कहानी सुनाती आ रही थी.

 पार्क में लगा हुआ छोटा सा मेला 



 भगवान का अस्थाई मंदिर और पूजा की थालियाँ









नाश्ता और केक 

 भंडारा 



Saturday, 24 September 2016

जियो जी भर...

अमरीका के एक प्रसिद्ध लेखक रे ब्रैडबेरि का कहना है कि अपनी आँखों को अचंभों से भर लोजियो ऐसे कि जैसे अभी दस सेकेण्ड में गिर कर मरने वाले होदुनिया देखो, यह कारखानों में बनाए गए या खरीदे गए किसी भी सपने से ज्यादा शानदार है. 

वाकई घुमक्कड़ीयायावरी या पर्यटन ऐसी संपदा है जो आपके व्यक्तित्व को अमीर बनाती है और शायद इसलिए आजकल यह दिनों दिन बेहद लोकप्रिय होती जा रही है. 
देशोंस्थानों की खोज से शुरू हुई यात्राएं, धार्मिक तीर्थ यात्राओं से होती हुई आज - स्वास्थ्यज्ञानव्यापार और सबसे अधिक मनोरंजन तक पहुँच गईं हैं और आलम यह है कि अब फुर्सत के कम से कम पलों में भी हम छोटी ही सही किसी यात्रा पर निकल जाने के लिए लालायित और बेचैन रहते हैं. शायद यही वजह है कि कुछ देश तो सिर्फ पर्यटन से ही विकसित हुए हैं और आज भी मुख्यत: उसी पर निर्भर हैं.

जहाँ फ़्रांस दुनिया का ऐसा देश है जहाँ सबसे अधिक पर्यटक जाते हैं वहीँ स्विट्जरलैंडस्पेनग्रीस आदि ऐसे देश हैं जहाँ की लगभग पूरी अर्थव्यवस्था ही पर्यटन पर चलती है. स्विट्जरलैंड ने अपने खूबसूरत पहाड़ों और प्रकृति को इतनी खूबसूरती से सहेजा है कि यात्री उसकी ओर खिचे चले जाते हैं वहीँ स्पेन ने अपने समुद्री तटों को पर्यटन का मुख्य आकर्षण बनाया है. अमरीका अपने वैभवपूर्ण लॉस वेगास के लिए प्रसिद्द है तो भारत में गोवा के तटराजस्थान की एतिहासिक इमारतें और दक्षिण के अद्दभुत मंदिर पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र हैं.

कहने का तात्पर्य यह कि प्रत्येक देश या स्थान की अपनी विशेषताएं होती हैं परन्तु उन्हें पर्यटन के लिए आकर्षक बनाने के लिए सबसे ज्यादा आवश्यक होता है उन्हें यात्रियों के लिए सुरक्षितसुलभ और सुविधाजनक बनाना. और यहीं पर कुछ स्थान दूसरे कुछ स्थानों से बाजी मार ले जाते हैं.
यूँ दुनिया का हर देश क्या हर स्थान किसी न किसी मायने में एक दूसरे से भिन्न होते हैं. आपको यदि यात्रा करनी ही है तो यह बिलकुल जरुरी नहीं कि आप कोसों दूर किसी मशहूर विदेशी जगह पर जाएँ. अपने आसपास ही, कहीं, कुछ दूरी पर जाकर देखियेमन की आँखें खोलिए तो आप पायेंगे वहाँ भी बहुत कुछ ऐसा है दूसरों से जुदा है.

इंग्लैंड में लन्दन से सिर्फ दो घंटे की ड्राइव परदक्षिण पश्चिमी और मध्य इंग्लैण्ड में स्थितप्राकृतिक सुन्दरता से परिपूर्ण एक इलाका है "कोट्स वोल्ड" करीब पच्चीस मील में फैले हुए इस क्षेत्र में छोटे छोटे कई एतिहासिक और पुरातन गाँव हैंगाँवों के बीच से बहती हुई नदियाँ हैंछोटे छोटे टीले से पहाड़ हैं. एक महानगर और दुनिया की आर्थिक राजधानी के इतने करीब होने पर भी एक बिलकुल नया परिवेश और वातावरण वहाँ देखने को मिलता है. सडकों से लेकर घरों तक और दुकानों से लेकर वहाँ के निवासियों तक में एक स्पष्ट भिन्नता दिखाई पड़ती है.
पर्यटन हमारे लिए ऐसी ही नई दुनिया के दरवाजे खोलता है. अपनी सिमटी हुई दुनिया से निकाल कर अलग संस्कृतिपरिवेशखानपान आदि से हमें अवगत कराता है और हमें बताता है कि तुम जहाँ जीते हो वह इस क़ायनात का एक बेहद छोटा सा टुकड़ा है. अपने कुएँ से बाहर निकलो और देखो कि यह संसार कितना बड़ा और विविध है. 

एक रोमन स्टोइक दार्शनिक सेनेका के अनुसार यात्रा और स्थान में बदलाव मन में नई शक्ति का संचार करते हैं. तो यदि आपको भी चाहिए यह मन की शक्ति तो निकलिए अपने खोल सेबंद कीजिये अपने कमरे में लगे टेलीविजन को और निकल पढ़िये जहाँ भी डगर ले चले. 
वैसे भी किसी शायर ने क्या खूब कहा है –
मस्तूल तन चुके हैं बहती बयार में,
बाहें फैलाए दुनिया तेरे इंतज़ार में.




Tuesday, 28 June 2016

अब आगे क्या ? (UK's EU referendum, 2016)

वह बृहस्पतिवार का दिन था - तारीख 23 जून 2016  - जब एक जनमत संग्रह के लिए मतदान किया जाने वाला था. इसमें वोटिंग के लिए सही उम्र के लगभग सभी लोग वोट कर सकते थे वे फैसला लेने वाले थे कि यूके को  योरोपीय संघ का सदस्य बना रहना चाहिए या उसे छोड़ देना चाहिए. 
इस जनमत संग्रह में  30 मिलियन से अधिक लोगों ने मतदान किया। यह 1992 के आम चुनाव के बाद से ब्रिटेन के मतदान में सबसे अधिक संख्या थी। सभी यूके के भविष्य निर्धारण करने में अपना योगदान देने के इच्छुक थे. 
24 जून की सुबह यूके  निवासियों को नाश्ते की मेज पर इस जनमत संग्रह का फैसला भी मिला. जिसने जहाँ खासकर अधिकाँश लन्दन वासियों को शॉक में डाला वहीं बहुत लोग इससे बेहद खुश हुए.  इस रेफेरेंडोम के अनुसार 52 प्रतिशत मतदाताओं ने यूरोपीय संघ से बाहर होने के पक्ष में अपना वोट दिया. यूके की जनता ने यूरोपीय संघ छोड़ने का निर्णय किया था. वह अलग होकर अपने फैसले खुद लेना चाहते हैं. अपने पैसे, कानून और व्यवस्था का इस्तेमाल स्वयं अपने मूल्यों पर करना चाहते हैं.  यह एक एतिहासिक दिन बन गया और इस फैसले के बाद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने अपने पद से इस्तीफ़ा देने की घोषणा कर दी.
अभी लगभग 2 साल पहले की ही बात है जब यूके के ही एक हिस्से स्कॉटलैंड में भी इसी तरह का एक जनमत संग्रह हुआ था जहाँ स्कॉटलैंड वासियों को यूके में बने रहने और यूके से अलग होने के लिए अपना वोट देना था. तब इंग्लैंड सहित पूरे देश ने "एकता में ही शक्ति है" जैसा नारा दिया था तब स्कॉटलैंड वासियों ने इसका मान रखते हुए यूके  साथ रहने के पक्ष में अपने वोट दिए थे. और अब उसी ग्रेट ब्रिटेन ने स्वयं ईयू से अलग होने का निर्णय किया है. 
गौरतलब है कि पूर्वोत्तर इंग्लैंड, वेल्स और मिडलैंड्स में अधिकतर मतदाताओं ने यूरोपीय संघ से अलग होना पसंद किया है जबकि लंदन, स्कॉटलैंड और नॉर्दन आयरलैंड के ज्यादातर मतदाता यूरोपीय संघ के साथ ही रहना चाहते थे. और अब सम्भावनाएं जताई जा रही हैं कि अब कम से कम स्कॉटलैंड और नॉर्दन आयरलैंड यूके से अलग होकर यूरोपीय संघ में शामिल होना चाहेंगे. और युनाईटेड किंगडम शायद इतना युनाईटेड नहीं रह जाएगा. 
ज़ाहिर है कि EU छोड़ने के पक्ष में जिन्होंने अपना मत दिया उनमें लन्दन से बाहर के बुजुर्गों की संख्या सर्वाधिक थी जो पिछले दस साल में दूसरे देशों से ब्रिटेन में आकर बसने वालों की बढ़ती संख्या से बहुत प्रसन्न नहीं हैं और उन्हें लगता है कि इनके आने से उन्हें मिलने वाले बेनेफिट्स और नौकरियों में कटौती हुई है. देश में बढ़ते रोड साइड अपराध, चोरियां और बिगड़ती व्यवस्थाओं की वजह भी अप्रवासियों को माना जाता रहा है. 
ईयू से अलग होने की एक मजबूत वजह यह भी बताई जाती रही कि अगर ब्रिटेन ईयू से हटता है तो देश की सरकारी स्वास्थ्य  संस्था NHS अपनी जर्जर स्थिति से उबर जायेगी क्योंकि ईयू को हर हफ्ते दी जाने वाली राशि ब्रिटेन अपनी इस स्वास्थ्य योजना पर इस्तेमाल कर सकेगा.

पिछले 20 वर्षों से यूके  में रह रही एक गृहणी संगीता शाह का कहना है कि उन्होंने देखा है कि कैसे पिछले सालों में ईयू इमिग्रेशन का कानून बदला गया है और कैसे हाल में हुए बदलावों का ब्रिटेन पर एक नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, उनका कहना है कि हमारे जीवन के विभिन्न पहलुओं जैसे -: स्कूल प्रवेश, आवास और साथ ही अपराध दर पर बहुत असर पड़ रहा है । उनका  मानना है कि ये अप्रवासी बेनेफिट्स का अतिरिक्त लाभ लेते हैं, जो उन्हें ब्रिटेन करदाताओं के मेहनत से कमाए पैसे का दुरुपयोग लगता है । उनका कहना है कि वे अपने बच्चों और भावी पीढ़ियों के लिए ऐसा जीवन नहीं चाहती इसलिए उन्होंने जीवन यापन के लिए बढ़ने वाली कीमतों के खतरे के वावजूद ईयू के निकलने के पक्ष में अपना वोट दिया. 

वहीं एक जर्मन ट्रेड फेयर कंपनी में एक हेड , लन्दन निवासी बिंदिया वर्मा इस फैसले से आहत हैं.उनके लिए यह फैसला पूरी तरह अनपेक्षित था और एक बहुत बड़े आघात के रूप में आया है. उनके अनुसार इस फैसले का बड़ा प्रभाव उन जैसी कंपनी पर पड़ेगा क्योंकि कंपनियां अब अपना निवेश रोक सकती हैं जब तक कि ईयू और दुनिया के बाकि देशों से अधिक भरोसे वाली ताज़ा डील सामने न आये. वे अपने उन युरोपीय दोस्तों के लिए भी दुखी हैं जिन्होंने ब्रिटेन को अपना घर बना लिया है और अब वे खुद को यहाँ अप्रिय और अवांछित महसूस करेंगे. बिंदिया कहती हैं कि यही नहीं बल्कि शायद इस फैसले से हमने अपने बच्चों एवं भावी पीढी से बिना सीमा बंदी के यूरोप यात्रा और काम करने के अवसरों को भी छीन लिया है. 

आंकड़ों के अनुसार ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से बाहर होने के फ़ैसले के बाद दुनिया भर में बाज़ार में गिरावट देखने को मिल रही है.अकेले ब्रिटेन के स्टॉक मार्किट में ही एक सौ पच्चीस बिलियन का नुक्सान हुआ है. 
इस फैसले से अधिकाँश युवा वर्ग अधिक निराश दिखाई देता है. खासकर लन्दन जैसे बहु संस्कृति वाले शहर के लिए तो यह फैसला दुखद नहीं तो थोड़ा निराशाजनक अवश्य दिखाई पड़ता है. 

लन्दन में इकोनिमिक्स की एक छात्रा सोम्या के अनुसार भी यह फैसला ठीक नहीं है वह कहती है कि हम पहले से ही माइनस -3294 मिलियन पाउंड्स के क़र्ज़ में हैं अब व्यापार में नुक्सान और अधिक हो सकता है. 

जो भी हो, यह कहा जा सकता है कि यह हो सकता है कि इस फैसले के कुछ दूरगामी फायदे निकल कर आयें. हो सकता है कि ईयू की सरपरस्ती से निकल कर यूके अपना अलग दृण निर्माण करे. ईयू से निकल कर बाकि दुनिया के देशों से व्यापारिक रिश्तों में बढ़ोतरी की संभावनाएं जताई जा रही हैं परन्तु यह भी ज़ाहिर है कि फिलहाल यूके की अर्थव्यवस्था पर इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा और जीवन यापन की कीमत बढ़ेगी. इसमें कोई संदेह नहीं अपने पैरों पर खड़े होकर सफलता तक तक पहुँचने के लिए यूके को एक लंबा और कठिनाई से भरा रास्ता पार करना होगा. 

इस एतिहासिक फैसले से यूके, कठिनाई की आग में तप कर, निखर कर निकलेगा या टूट कर बिखर जाएगा- यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा.



Wednesday, 22 June 2016

आर या पार ...

बस एक दिन बचा है. EU के साथ या EU के बाहर. मैं अब तक कंफ्यूज हूँ. दिल कुछ कहता है और दिमाग कुछ और

दिल कहता है, बंटवारे से किसका भला हुआ है आजतक. मनुष्य एक सामाजिक- पारिवारिक प्राणी है. एक हद तक सीमाएं ठीक हैं. परन्तु एकदम अलग- थलग हो जाना पता नहीं कहाँ तक अच्छा होगा. इस छोटे से देश में ऐसी बहुत सी जरूरतें हैं जिसे बाहर वाले पूरा करते हैं, यह आसान होता है क्योंकि सीमाओं में कानूनी बंदिशें नहीं हैं. मिल -बाँट कर काम करना और आना- जाना सुविधाजनक है. 

परन्तु सुविधाओं के साथ परेशानियां भी आती हैं. बढ़ते हुए अपराध, सड़कों पर घूमते ओफेंन्डर्स, बिगड़ती अर्थव्यवस्था, रोजगार कुछ ऐसी समस्याएं हैं जिनका निदान, सीमाएं अलग कर देने में ही दिखाई पड़ता है. खुले आम होते खून, दिन दहाड़े बढ़ती चोरियां, सड़कों पर खराब होता ट्रैफिक, स्कूलों, अस्पतालों में घटती जगह एवं उनका स्तर और पढ़े लिखों के बीच बढ़ती बेरोजगारी हर रोज डराती हैं  और दिमाग कहता है कि अलग हो जाना और फिर से अपनी मुद्रा, अपने खर्च, अपनी व्यवस्थाएं और कानून लागू करना ही एक मात्र रास्ता है.

वहीं एक डर अलग - थलग पड़ जाने का भी सालता है. एक छोटे से टुकड़े में एक आदमी के भरोसे फंस जाने का डर. इतिहास गवाह है जब सीमित संसाधनों से जरूरतें पूरी नहीं होती तो मंशा छीनने की हो आती है. दूसरों पर कब्जा करना, लूट पाट, और अनियंत्रित व्यवहार. 

एक हद्द तक अच्छा होता है किसी का अपने सिर पर नियंत्रण, कुछ सामान अधिकार, जिम्मेदारी और कानून जिसका पालन हर कोई करे. पूरी तरह से आजादी अनियंत्रण और स्वछंदता भी लेकर आ सकती है. 

फिलहाल स्थिति असमंजस की है. मेरी खासकर इसलिए कि बाहर आये तो इतना प्यारा यूरोप इतने आराम से घूमना बंद हो जायेगा  और फिर सुना है डैरी मिल्क चॉकलेट भी तो यूरोप से बाहर अच्छी नहीं मिलती .... 樂



Wednesday, 18 May 2016

ये न थी हमारी किस्मत....

हम जब बचपन में घर में आने वाली पत्रिकाएं पढ़ते तो अक्सर मम्मी से पूछा करते थे कि गर्मियों की छुट्टियां क्या होती हैं. क्योंकि पत्रिकाएं, गर्मियों में कहाँ जाएँ? कैसे छुट्टियां बिताएं, गर्मियों की छुट्टियों में क्या क्या करें और गर्मियों की छुट्टियों में क्या क्या सावधानी रखें, जैसे लेखों से भरी रहतीं। हमें समझ में नहीं आता था कि जिन गर्मियों की छुट्टी का इतना हो- हल्ला होता है वे गर्मी की छुट्टियां हमारी क्यों नहीं होतीं। जब सब बच्चे इन छुट्टियों में नानी - दादी के यहाँ जाते हैं या पहाड़ों की सैर पर निकल जाते हैं तो हम क्यों नहीं कहीं जाते? हमें क्यों स्कूल जाना पड़ता है ?तब मम्मी हमें समझातीं कि अभी वे लोग (रिश्तेदार, परिचित) हमारे यहाँ आ रहे हैं न, तो हम जाड़ों में वहां चलेंगे। गर्मियों में वहां बहुत गर्मी होती है, लू चलतीं हैं. अब हमारे सामने एक और दिलचस्प प्रश्न होता कि ये लू क्या चीज़ होती है और कैसे चलती है. 
असल माजरा यह था कि हम एक पहाड़ी शहर में रहा करते थे जहाँ स्कूल की छुट्टियां गर्मियों में नहीं, जाड़ों में हुआ करती थीं और इसलिए जब बाकि सब गर्मियों की छुट्टियों में हमारे यहाँ घूमने और आराम करने आते तब हम उनकी खातिरदारी करने में, पेड़ों से आड़ू, प्लम तोड़ कर खाने में और अपने स्कूल के रूटीन में व्यस्त होते। गर्मियों की छुट्टी मनाते बच्चों की किस्मत पर रश्क करते और अपनी पर लानत भेजते रहते।


हालाँकि इन सारे सवालों के उत्तर धीरे धीरे हमें समझ में आने लगे, लू - गर्म हवा के थपेड़ों को कहते हैं यह भी पता चल गया और बाकी बच्चों से छुट्टी की प्रतियोगिता भी समय के साथ समाप्त हो गईं. परन्तु गर्मियों की छुट्टियां हमारे लिए फिर भी एक पहेली ही बनी रहीं. वक़्त ने करवट ली, समय ने भारत से उठाकर हमें यूरोप में ले जा छोड़ा, जहाँ गर्मियों की छुट्टियां तो होती थी पर भारत जैसी न होती थीं. यूरोपवासी यूँ भी बेहद छुट्टी पसंद माने जाते हैं. कभी कभी तो लगता है कि छुट्टियां ही उनकी जिंदगी का मकसद है और बाकी का सारा काम वह इन छुट्टियों का आनंद उठाने की खातिर ही करते हैं. उसपर गर्मियों की छुट्टियां उनके लिए सबसे अहम होती हैं क्योंकि इन दिनों उन्हें भीषण ठण्ड, बोरिंग ओवरकोट और भारी जूतों से निजात मिलती है, मौसम बदलता है और वे प्रकृति के इस रूप का आनंद लेने के लिए बेताब हुए जाते हैं.  पूरा साल काम करते हैं, कमाते हैं, और सारा इन छुट्टियों में खर्च कर देते हैं.

भारत में जो गर्मियों की छुट्टियां भीषण गर्मी से राहत के लिए दी जातीं हैं वही यूरोप एवं पश्चिमी देशों में इससे इतर गर्मियों की छुट्टियां इस गर्मी का आनंद लेने के लिए दी जाती हैं. जहाँ गर्मियों की छुट्टी के नाम पर भारत में खस, शरबत, कूलर, शिकंजी, तरबूज, पहाड़ी स्थानों की सैर, स्कूल से मिला गृहकार्य और प्रोजेक्ट्स, और बड़ों की - "धूप में बाहर मत जाओ, तबियत खराब हो जाएगी, लू लग जाएगी " जैसी तक़रीर याद आती, वहीं यूरोप में इसके विपरीत लोग गरम देशों में, समुन्द्र के किनारे धूप में घंटों पड़े रहकर धूप सेकने को बेताब रहते हैं। तरबूज की जगह स्ट्रॉबेरी और चेरी इकठ्ठा करने खेतों पर जाते हैं, वहां कोई गृहकार्य गर्मियों की छुट्टियों के लिए नहीं दिया जाता, कोई बच्चा पहाड़ों पर या ठंडी जगह पर जाने की जिद नहीं करता. यहाँ तक कि हम, आदत से मजबूर हो कभी टीचर से कहते भी कि कुछ काम दे दीजिये, हम गर्मियों की छुट्टियों में कर लेंगे तो जबाब आता "गर्मियां काम करने के लिए नहीं होतीं, गर्मियां एन्जॉय करने के लिए होती हैं। गो एंड एन्जॉय द सन". और हमारे लिए यह सन (सूरज ) और गर्मी की छुट्टियां फिर से एक प्रश्न बन जाते, क्योंकि हमें तब उन छुट्टियों में कहीं घूमने नहीं बल्कि अपने घर (भारत) जाना होता जहाँ सूरज के साथ एन्जॉय करने बाहर नहीं निकला जाता, बल्कि उससे बचने के उपाय और साधन ढूंढें जाते हैं. अधिकाँश वक़्त घर के अंदर, कमरे में अँधेरा कर कूलर पंखे चला कर बैठने या पूरी दोपहर सोने में बीत जाता। 

वक़्त ने फिर करवट पलटी. अब छुट्टियां हमारी न होकर बच्चों की हो गईं. गर्मी भी समय के साथ बढ़ चली और उससे निबटने के तरीके भी बदल गए. गर्मियों की छुट्टियों के मायने भी बदल गए परन्तु हमारे लिए कुछ न बदला. हमारे लिए गर्मियों की छुट्टियां अब भी वही पहेली थीं. अब बहुत सी और छुट्टियाँ मिलती हैं, जब जी चाहे ली जा सकती हैं, जहाँ मन चाहे घूमने जाया जा सकता है, उनका खूब आनंद भी लिया जाता है. परन्तु यह "गर्मियों की छुट्टियाँ" आज भी हमारे लिए एक प्रश्न चिन्ह हैं. अब भी गर्मियों की छुट्टियां - अवकाश नहीं, बल्कि काम से अलग मिलने वाला वह समय था जिसमें हमें घर जाना था और दूसरे काम निबटाने थे. यूरोप में इसी समय स्कूल में सबसे अधिक छुट्टियां होती हैं तो यही समय होता है जो भारत जाकर इन छुट्टियों का सदुपयोग कर आयें.

यूँ कि - 
ये न थी हमारी किस्मत के गर्मी की छुट्टियां मिलतीं ... 
हम भी सूर्य स्नान करते या पहाड़ों की सैर होती ... 


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