Monday, 9 November 2009

दो पाटों के बीच में ......



कितना आसान होता था ना

जिन्दगी को जीना

जब जन्म लेती थी कन्या

लक्ष्मी बन कर

होता था बस कुछ सजना संवारना

सखियों संग खिलखिलाना,

कुछ पकवान बनाना और

डोली चढ़ ससुराल चले जाना

बस सीधी सच्ची सी थी जिन्दगी

अब बदल क्या गया परिवेश

बोझिल होता जा रहा है जीवन

जो था दाइत्व वो तो रहा ही

बहुत कुछ जुड़ गया है उसपर

अब लक्ष्मी ही नहीं

सरस्वती भी बनना है ,

पाक कला छोडो

विज्ञान , अर्थशास्त्र भी पढना है।

अब पैसा संभालना ही नही

उसे कमाना भी है

और तो और उसे भुनाना भी है

हर तरफ उम्मीदें

हर तरफ अरमान

कहाँ जाये वो

कैसे बनाये अपना मुकाम

एक तरफ समाज ,

एक तरफ घर संसार

पति मांगे भार्या, बंदनी

मालिक चाहे समर्पित गुलाम

न छूटे उससे मायका

ना अपनाए उसे ससुराल

अपना ही मन जाने ना

ढूंढे खुद को यहाँ वहां

दो पाटों के बीच में

ये कोमल कली पिस गई है

आज की लड़की

बहुत असमंजस में पड़ गई है.


Wednesday, 28 October 2009

कुछ रंग बिरंगी फुआरें



सपनो को बंद करके पलक पर थे हम चले।

शब्दों के कुछ फूल मन बगिया में जो खिले

समेट कर आज इन्हें बिखरा दिया है इसकदर

तमन्ना है की आपकी पलकों पर ये सजें

************************

बड़ी शिद्दत से बिछाये बैठे थे

प्यार के गलीचे को

खबर क्या थी उसमें

खटमल भी आ जाया करते हैं

*************

आज इस बारिश की

बोछार देख याद आया

तेरा प्यार भी कभी

यूँ ही बरसा करता था.

****************

आसमां आज कुछ

झुका झुका सा लगता है

शायद ऊपर आज

डांस प्रोग्राम् है

***********

पहले हम कहते थे

ये धरती चपटी है

अब कहते हैं कि

पृथ्वी गोल है

पर कब समझेंगे की

ये प्रकृति अनमोल है.

***************

आज भी जब दिल करता है

की हंसें हम

तो खुद ही हो जाती हैं

ये आँखें नम

***************

यूँ तो रोज़ आते हैं,

सेंकडों परिंदे मेरी मुडेर पर।

पर किसी के भी पंजों में,

तेरी चिठ्ठी कहाँ होती है.

*****************

जैसे आये थे हम

उल्टे पैर लौट जायेंगे

तेरी गली में अब

शाम कहाँ होती है ।

**************







Friday, 23 October 2009

ऐ सुनो !


सुनो! पहले जब तुम रूठ जाया करते थे न,
यूँ ही किसी बेकार सी बात पर
मैं भी बेहाल हो जाया करती थी
चैन ही नहीं आता था
मनाती फिरती थी तुम्हें
नए नए तरीके खोज के
कभी वेवजह करवट बदल कर
कभी भूख नहीं है, ये कह कर
अंत में राम बाण था मेरे पास।
अचानक हाथ कट जाने का नाटक ...
तब तुम झट से मेरी उंगली
रख लेते थे अपने मुहँ में,
और खिलखिला कर हंस पड़ती थी मैं....
फिर तुम भी झूठ मूठ का गुस्सा कर
ठहाका लगा दिया करते थे।
पर अब न जाने क्यों .....
न तुम रुठते हो
न मैं मनाती हूँ
दोनों उलझे हैं
अपनी अपनी दिनचर्या में
शायद रिश्ते अब
परिपक्व हो गए हैं हमारे
आज फिर सब्जी काटते वक़्त
हाथ कट गया है
ऐ सुनो! तुम आज फिर रूठ जाओ न
एक बार फिर मनाने को जी करता है


Tuesday, 20 October 2009

रुकते थमते से ये कदम




रुकते थमते से ये कदम


अनकही कहानी कहते हैं


यूँ ही मन में जो उमड़ रहीं


ख्यालों की रवानी कहते हैं


रुकते थमते.....


सीने में थी जो चाह दबी


होटों पे थी जो प्यास छुपी


स्नेह तरसती पलकों की


दिलकश कहानी कहते हैं


रुकते थमते....


धड़कन स्वतः जो तेज हुई


अधखिले लव जो मुस्काये


माथे पर इठलाती लट की


नटखट नादानी कहते हैं।


रुकते थमते....


सघन अंधेरी रातों में


ज्यों हाथ लिए हो हाथों में


दो जुगनू सी जो चमक रही


आँखों की सलामी कहते हैं


रुकते थमते...


लावण्या अपार ललाटो पर


सिंदूरी रंग यूँ गालों पर


मद्धम -मद्धम सी साँसों की


मदमस्त खुमारी कहते हैं


रुकते थमते......

Tuesday, 13 October 2009

लो फ़िर आ गई दिवाली


लो फिर आ गई दिवाली...

हम फिर करेंगे घर साफ़ मगर

मन तो मेले ही रह जायेंगे .

दिल पर चडी रहेगी स्वार्थ की परत

पर दीवारों पे रंग नए पुतवायेंगे .

फिर सजेंगे बाज़ार मगर

जेबें खाली ही रह जाएँगी .

जगमगायेंगी रौशनी की लडियां

पर इंसानियत अँधेरा ही पायेगी .

आस्था से क्या लेना-देना हमें

पर लक्ष्मी पूजन हम कराएँगे

दिल में द्वेष भावः हो तो क्या,

हम मिठाई बांटने जायेंगे .

क्यों न इन रिवाजों से हटकर ,

इस बार कुछ प्यार बाँटें

कुछ मन चमकाएं

दिवाली तो हर साल मानते हैं

चलो इस साल दीये दिल में जलाएं

Thursday, 8 October 2009

मैं हिंदी हूँ.













देवनागरी लिपि है मेरी
संस्कृत के गर्भ से आई हूँ
प्राकृत, अपभ्रंश हो कर मैं
देववाणी कहलाई हूँ ..

शब्दों का सागर है मुझमें
झरने का सा प्रभाव है
है माधुर्य गीतों सा भी
अखंडता का भी रुआब है.

ऋषियों ने अपनाया मुझको
शास्त्रों ने मुझे संवारा है
कविता ने फिर सराहा मुझको
गीतों ने पनपाया है.

हूँ गौरव आर्यों का मैं तो
मुझसे भारत की पहचान
भारत माँ के माथे की बिंदी
है हिंदी मेरा नाम







Friday, 25 September 2009

करवा चौथ बदलते परिवेश में


करवा चौथ - ये त्योहार उत्तर भारत में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है.और भई मनाया भी क्यों न जाये आखिर एक महिने पहले से तैयारियाँ जो शुरु हो जाती हैं..शुरुआत होती है धर्मपत्नी के तानो से, कि, देखो जी mrs शर्मा १०,००० कि साड़ी लाई हैं इस बार, सुनो जी पड़ोसन को उसके पति ने नये झुम्के दिलाये हैं ,पर यहाँ तो किसी को कदर ही नहीं है, कोइ जिये मरे इन्हें क्या.......और इस तरह रो धो कर एक नई साड़ी तो आ ही जाती है।

फ़िर शुरु होता है सिलसिला पार्लर का, अरे शादियों के मौसम में भी ऐसी रंगत कहाँ देखने को मिलती है यहाँ, जितनी इस दिन होती है। अब भाई वो भी तो अपनी दूकान खोल कर बैठे हैं न अब व्रत के दिन हम उनका ख्याल नहीं रखेंगे तो कौन रखेगा? और होता है नख से शिख तक का श्रृंगार, गोया करवा चौथ न हुई सुहागरात हो गई। हाँ आखिर शाम की पूजा के वक़्त सौन्दर्य प्रीतियोगिता जो होनी है॥खैर बन- संवर कर पूरे तन- मन से होती है पूजा।

और इंतज़ार शुरू होता है चाँद का तो वो महाशय भी पूरे भाव में होते हैं उस दिन। अब समय से निकले तो निकले और जो बादलों ने ढक लिया तो इन्टरनेट है ही वहीँ दर्शन करके अर्क दे देंगे, नहीं तो शादी के बाद पति देव का सर क्या किसी चाँद से कम हो जाता है? उसी को देख व्रत तोड़ लेंगे,आखिर रखा तो उन्हीं के लिए है न। संम्पन्न होगी पूजा और चरण स्पर्श होगा पति परमेश्वर का.आखिर हर गधे का दिन आता है,तो जी कुछ भोले भाले मनुष्य तो फूल कर कुप्पा, गाल लाल हो जायेंगे कान कि बेक ग्राउंड में गाना बजने लगेगा "पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले झूठा ही सही"और बीबी बुदबुदा रही होगी "अब आगे भी आओ या वहीँ खड़े रहोगे ,एक काम ढंग से नहीं कर सकते".और कुछ पति देव मन ही मन बुदबुदायेंगे " हाँ हाँ ठीक है जल्दी ख़तम करो अपना ये सब, खाना खाएं फिर कल काम पर भी जाना है"(आज तो जल्दी मिल गई छुट्टी मजाल किसी बॉस कि जो मना कर दे आखिर उसे भी तो अपने घर जाना है.)

और बारी आती है खाने की . तो जी आजकल कुछ पति- गण भी पत्निव्रता होने कि इच्छा रखते ,हैं वो भी अपनी अर्धांगिनी के साथ व्रत रखते हैं, ....हाँ जी ! क्या बुरा है? वेसे भी कौन तीनो टाइम ठीक से खाना मिलता है?सो एक वक़्त भूखे रह कर पत्नी प्रेम जाहिर हो जाये तो कौन बुरा सौदा है।और फिर सारे साल के ताने से भी निजात कि "तुम्हारे लिए पूरे दिन निर्जल व्रत करते हैं ,तुम क्या करते हो हमारे लिए? "सो भैया अब ये सुकून तो रहेगा।

खैर अब जब दोनों ने व्रत रख लिया तो खाना कौन पकायेगा?ये मरी बाइयां भी छुट्टी ले लेती हैं।सो जी भला हो इन हल्दीराम सरीखे लोगों का।बहुत पुण्य मिलेगा इन्हें. पर रेस्टोरेंट में पैर रखने कि जगह शायद न मिले पर जैसे भी हो घुसघुसा कर कुछ ले ही आयेंगे पति -देव अपनी प्रिया के लिए.और इस तरह करवा चौथ की कथा में जेसे सांतवी बहन अपने पति को सकुशल लौटा लाई थी ,उसी तरह आज कि पतिव्रता पत्नी भी खिला पिला कर पतिदेव को सकुशल घर ले आती है.और संपन्न होता है ये पवित्र त्यौहार.बोलो करवा चौथ माता कि जय...................
Related Posts with Thumbnails