Tuesday, 7 July 2009

अमृत रस


ताल तलैये सूख चले थे,
कली कली कुम्भ्लाई थी ।
धरती माँ के सीने में भी
एक दरार सी छाई थी।

बेबस किसान ताक़ रहा था,
चातक भांति निगाहों से,
घट का पट खोल जलबिंदु
कब धरा पर आएगी....

कब गीली मिटटी की खुशबू
बिखरेगी शीत हवाओं में,
कब बरसेगा झूम के सावन
ऋतू प्रीत सुधा बरसायेगी।

तभी श्याम घटा ने अपना
घूंघट तनिक सरकाया था
झम झम कर फिर बरसा पानी
तृण तृण धरा का मुस्काया था ।

नन्हें मुन्ने मचल रहे थे,
करने को तालों में छप-छप,
पा कर अमृत धार लबों पर,
कलियाँ खिल उठीं थीं बरबस।

कोमल देह पर पड़ती बूँदें,
हीरे सी झिलमिलाती थीं
पा नवजीवन होकर तृप्त
वसुंधरा इठलाती थी।

देख लहलहाती फसल का सपना,
आँखें किसान की भर आईं
इस बरस ब्याह देगा वो बिटिया,
वर्षा ये सन्देशा लाई थी.

7 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

शिखा जी!
सुन्दर कविता के माध्यम से
वर्षा के आने का सन्देश दिया।
बधाई।

VIJAY TIWARI " KISLAY " said...

वाह शिखा जी
वर्षा को आधार मान कर आपने जितनी सरलता से सकारात्मक अभिव्यक्ति दी है वह प्रसंशनीय है ...

देख लहलहाती फसल का सपना,
आँखें किसान की भर आईं
इस बरस ब्याह देगा वो बिटिया,
वर्षा ये सन्देशा लाई थी.
- विजय

Science Bloggers Association said...

सूखे जैसे हालात को आपने बहुत खूबसूरती से व्यक्त किया है।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

मुकेश कुमार तिवारी said...

शिखा जी,

......घट का पट खोल जलबिंदु
कब धरा पर आयेंगी

शायद यह प्रतीक्षा ही जीवन है। सुन्दर अभिव्यक्ती।

मुकेश कुमार तिवारी

Manish said...

bhigte lafzo... ki chhiten idhar bhi padi hain...

aaj to jamkar baarish bhi hui.. :) :)

अल्पना वर्मा said...

bahut hi achchee kavita hai .

aap ka blog bhi sundar hai.

header mein picture bhi unique hai.

anil ki rasoi said...

sachmuch atisundar.

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