Sunday, 30 August 2009

सौदा

दूर क्षितिज पे सूरज ज्यूँ ही डूबने लगा
गहन निशब्द निशा के एहसासों ने
उसके जीवन के प्रकाश को ढांप दिया
हौले हौले अस्त होती किरणों की तरह
उसके मन की रौशनी भी डूब रही थी
इधर खाट पर माँ अधमरी पड़ी थी
और छोटी बहन के फटे फ्रॉक पर
जंगली चीलों की नज़र गड़ी थी।
उसी क्षण उसके अन्दर की बाला
एक ज्वाला का रूप ले रही थी।
रात भर लड़ती रही थी अपने ही आप से
तोलती रही थी समाज के ठेकेदरों को
उनके सफेदी से रंगे अपराधिक हाथों से
नही था उसे मंजूर भीख में इज़्ज़त लेना
झुका कर निर्दोष पलकें, भी क्या जीना?
और नम आँखों में आख़िर उसने
सूर्य की सारी रक्तिमा समेट ली थी
अपनी हाथ की कोमल रेखाएँ
अपनी ही मुठ्ठी में भींच लीं थीं
कर पूरे वजूद को इकठ्ठा
किया फिर उसने ये फ़ैसला
नापाक निगाहों का अब भय नही था
बेबसी के आँसू अब बहने नही थे
अपनी नज़रों में गुनहगार नही अब
अपनी ही अस्मत तो उसने बेची थी
किसी की बेबसी तो खरीदी न थी

Wednesday, 26 August 2009

हे स्त्री !




हो वेदकलीन तू मनस्वी या
राज्य स्वामिनी तू स्त्री

रही सदा ही पूजनीय  तू
बन करुणा त्याग की देवी 
सीता भी तू, अहिल्ल्या भी तू
रंभा भी तू, जगदंबा भी तू
है अगर गार्गी, मैत्रैई तो,
रानी झाँसी, संयोगिता  भी तू
फिर क्यों तू आज़ भटक रही?
पुरुष समकक्ष  होने को लड़ रही?
खो कर अस्तित्व ही अपना
अधिकार ये कैसा ढूँढ  रही?
क्यों सोच तेरी संकीर्ण हुई
क्यों खुद से ही तू जूझ रही
खोकर अपना स्त्रीत्व  भला
पाएगी क्या परम पद कोई 
सृजनकर्ता तू , ईश्वर की प्रीत,
सौन्दर्य तू इस जग की
फिर पाने को बस एक आडंबर
अपना पद ही क्यों भूल रही?
गरिमा अपनी ना छोड़ यूँ ही
ना कर प्रकृति का अनादर।
चल छोड़ बराबरी की ये ज़िद 
बस स्त्री बन पा ले तू आदर



Wednesday, 12 August 2009

रिक्तता

आत्मा से जहन तक का,
रास्ता नसाज है
या भावनाओं का ही कुछ,
पड़ गया आकाल है
दिल के सृजनात्मक भाग में
आज़कल हड़ताल है।
हाथ उठते हैं मगर
शब्द रचते ही नहीं
होंट फड़कते हैं मगर
बोल फूटते ही नहीं
पन्नों से अक्षर का रिश्ता
लग रहा दुश्वार है
दिल के सृजनात्मक भाग में
चल रही हड़ताल है
 चल रहीं साँसे मगर
रूह कहीं लुप्त हो गई
धड़क रहा है दिल तो
क्या रवानगी सुस्त पड़ गई
इस हृदय में चल रहा
एक हाहाकार है
दिल के सृजनात्मक भाग में
जो चल रही हड़ताल है
  बिन रंगो की तुलिका जैसे
खंडित मूरत की मुद्रा जैसे
बेनूर कोई अँखियाँ जैसे
बिन पानी नादिया जैसे
सृजन बिन कोरा ये जीवन ,
 बेनमक का सा आहार है
दिल के सृजनात्मक भाग में ,
गर जारी रही ये हड़ताल है……

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