Voronezh Railway Station.
वो कौन थी?..जी ये मनोज कुमार की एक फिल्म का नाम ही नहीं बल्कि मेरे जीवन से भी जुडी एक घटना है.
बात उन दिनों की है जब मैं १२ वीं के बाद उच्च शिक्षा के लिए रशिया रवाना हुई थी | वहां मास्को में बिताये कुछ दिन और वहां के किस्से तो आप ...अरे चाय दे दे मेरी माँ .........में पढ़ ही चुके हैं ,अब उससे आगे का एक किस्सा सुनाती हूँ ,जिसे याद करते हुए आज भी मेरे रौंगटे खड़े हो जाते हैं .
हुआ यूँ कि बाकी की पढाई से पहले १ साल का रूसी भाषा का फाउन्डेशन कोर्स करने के लिए हम सभी को अलग अलग यूनिवर्सिटी भेजने की व्यवस्था थी .उसी क्रम में मुझे "वेरोनिश भेजना तय हुआ .हालाँकि वहां भेजे जाने वालों में मैं अकेली नहीं थी ..फिर भी हालात ऐसे बने और न जाने क्यों बने कि मुझे कहा गया कि फिलहाल एक ही टिकेट का इंतजाम हो पाया है तो तुम्हें अकेले ही जाना होगा.. .ज्यादा दूर नहीं है... ट्रेन शाम ७ बजे चल कर सुबह ७-८ बजे तक पहुँच जाएगी. ये सुनते ही हमारी जान निकलने को हो आई ...एक तो पहली बार एक छोटे से शहर से अकेले निकले थे जहाँ सारा शहर हमें साहब की बेटी के नाम से जनता था ,और स्कूल में पढाई में अच्छे थे और बाकी एक्टिविटीज में भी, तो वहां भी रौब था तो कभी इस तरह की समस्या का मुंह नहीं देखा था , १६ साल की कमसिन उम्र और उसपर एकदम अनजान देश और भाषा का एक शब्द भी नहीं मालूम . पर कर क्या सकते थे ? अपना डर उन ऑर्गनाईजेशन वालों को दिखाना अपने अहम् को गवारा नहीं था सो डरते डरते चल पड़े . (हमारे २ दिन बाद पहुंचे कुछ लोगों ने बताया कि सबसे बड़ी बेबकूफ मैं ही निकली थी मुझसे पहले और मेरे बाद सभी ने अकेले जाने से साफ़ मना कर दिया था इसलिए उन्हें ग्रुप में भेजा गया था ) स्टेशन तक एक दुभाषिया हमें छोड़ने आया ,ट्रेन में बिठाया, हमें बताया कि गार्ड को बता दिया गया है कि तुम्हें कहाँ उतरना है ,वेरोनिश आने पर वो तुम्हें बता देगा .और वहीँ स्टेशन पर एक शाशा नाम का दुभाषिया मिलेगा जो तुम्हें यूनिवर्सिटी के हॉस्टल तक ले जायेगा बाकी का काम तो आसान था .और उसने हमें एक रुसी- इंग्लिश की वाक्य डिक्शनरी पकड़ाई और चला गया.
अब हमने अपना सामान रखा और एक बार पूरे कूपे को निहारा और दाद दी उस देश की क्यों कि यहाँ की ट्रेन के साधारण डिब्बे भी हमारी ट्रेन के AC 2nd टायर जैसे होते हैं . सारे कागजात एक बार चैक किये और अपना शब्द कोष लेकर बैठ गए पढने | वहीँ साथ वाले कूपे में एक रुसी महिला और एक पुरुष बैठे थे ...दोनों खिड़की से निहार रहे थे ,थोड़ी देर बाद दोनों में परिचय आरम्भ हुआ ,और १० मिनट . बाद ही रोमांटिक फिल्म शुरू हो गई शायद क्लाइमैक्स ही बाकी था ..हमसे देखा न गया और हम झट अपनी सीट पर मुंह ढक कर सो गए कि सुबह तो गार्ड आकर उठा ही देगा.पर नई जगह और अनजान होने की घबराहट.... नींद कहाँ आनी थी ?सो किसी तरह अध् सोये पड़े रहे सुबह के इंतज़ार में ..इसी बीच देखा कि वो रुसी महिला बाय कहकर बीच में ही एक स्टेशन पर उतर गई थी और वो महाशय फिर लम्बी तान कर सो गए थे.वाह कितने कैजुअल रिश्ते होते हैं यहाँ ..कोई टेंशन ही नहीं..
खैर किसी तरह सुबह हुई ,चाय आई ,हमने पी और इंतज़ार करने लगे कि अब गार्ड आएगा और बताएगा कि तुम्हारा स्टेशन आने वाला है.तभी ट्रेन एक स्टेशन पर रुकी और लोग अपना सामान उठाकर उतरने लगे | लगभग सभी यात्रियों को उतरते देख हमें थोडा अजीब सा लगा तो हमने अपना शब्दकोष निकला और उसमें से एक वाक्य पास खड़ी एक रुसी लड़की को दिखाया " ये स्टेशन कौन सा है ? " वहां से जबाब आया " वेरोनिज़े" ...अब हम फिर परेशान कि क्या करें लग तो रहा है वही कह रही है जहाँ हमें जाना है पर वो गार्ड तो आया नहीं और हमें तो वरोनिश कहा गया है ...पर हो सकता है कि एक्सेंट का फर्क हो ..हमें परेशान देख वो लड़की हमसे न जाने क्या पूछने लगी रुसी में और हम उसकी शक्ल देख बडबडाने लगे " रुस्की नियत "( नो रुसी ) अब उसने भी किसी तरह हमारे शब्द कोष में से ढूँढ ढूँढ कर हमसे पूछा कि कहाँ जाना है ..हमने बताया ..अब उसे भी हमारे उच्चारण पर शक हुआ ..इसी तरह कुछ देर शब्दकोष के साथ हम दोनों कुश्ती करते रहे अंत में हमारा दिमाग चला और हमने फटाक से अपना यूनिवर्सिटी का ऐपौइन्टमेंट लैटर उसे दिखाया ..उसने देखा और फट हमारा एक बैग हमारे हाथ में थमाया और हमारा सूटकेस अपने हाथ में पकड़ा और झट से हमें स्टेशन पर उतार लिया ...हम हक्के - बक्के हैरान परेशान ..जान हलक में अटकी हुई थी .रशियन माफिया और वहां विदेशी लोगों को लूटने के चर्चे भी सुने हुए थे. बस राम राम जपते हम उसकी अगली गतिविधि का इंतज़ार करते रहे..वो थोड़ी देर हमारे उस कागज को देख हमें कुछ समझाने की कोशिश करती रही .फिर उसने हमें शब्दकोष में दिखाया कि आओ मेरे साथ. मरता क्या न करता ?हमें आधा घंटा से ज्यादा हो गया था वहां मगज़ मारते पर उस दुभाषिये शाशा का कोई अता पाता न था ,तो ये सोच कि भागते भूत की लंगोटी भली ,ये लड़की शक्ल से चोर तो नहीं लगती ,बाकी भगवान की मर्जी सोच. हम उसके साथ चल दिए .अब हमारे एक कंधे पर १५ किलो का बैग और एक हाथ में ३५ किलो का सूटकेस (दाल चावल सब बाँध दिया था मम्मी ने कि वहां न जाने क्या मिलता होगा क्या नहीं ).
तो हम चल रहे थे अपनी चाल से ठुमक ठुमक और उसके पास था बस एक पिठ्ठू तो वो तो.शताब्दी एक्सप्रेस हुई जा रही थी ...वैसे भी इन यूरोपियन को बहुत पैदल चलने का शौक होता है ..न जाने कितनी दूर पैदल ले गई वो ( वो हमें बाद में पाता चला कि स्टेशन से बस भी मिलती है यूनिवर्सिटी तक )फिर उसने हमारी चाल देखी और अपनी घड़ी और झट से हमारा सूटकेस ले लिया और बोली फास्ट...अब वो चलने लगी और हम उसके पीछे- पीछे दौडने लगे. आखिरकार २० मिनट चलने के बाद एक इमारत नजर आई और उसकी चाल थोड़ी धीमी हुई तो हमारी सांस भी थोडा नॉर्मल हुई खैर पहुंचे अन्दर, वहां जाकर उसने एक आदमी से न जाने क्या कहा ..उसे हमारा लैटर पकडाया .और हमें बाय कहकर एक पुच्ची गाल पर देकर चली गई .और तब हमें समझ आया कि हम ठीक जगह पर पहुंचे हैं और इस समय अपनी यूनिवर्सिटी के डीन के आगे खड़े हैं जो अंग्रेजी में हमारा स्वागत कर रहा है..... .तभी पीछे से एक मोटे से चश्में वाला अजीब नमूना सा ,सीकड़ा सा रूसी आदमी भागता हुआ आया और आते ही अपनी रूसी टोन की इंग्लिश में हमसे माफ़ी मांगने लगा ...सॉरी कहते कहते उसकी ज़ुबान नहीं थक रही थी ..तब जाकर हमें सारा माजरा समझ आया कि वो वहां देरी से पहुंचा था और वो ट्रेन का गार्ड वोदका पीकर टुन्न था और वोरोनिश उस ट्रेन का आखिरी स्टेशन था.अब हमें होश आया तो अब तक की चुप्पी कहर बन बरस पड़ी उस डीन के सामने... बरस ही तो पड़े हम, कि ये कौन सा तरीका है ? अगर वो लड़की नहीं मिलती तो क्या होता हमारा ? कौन जिम्मेदार होता? हम बडबडाते रहे और वो शाशा सॉरी सॉरी करता हमारे दोनों बैग उठाकर हमारे हॉस्टल के कमरे में पहुंचा गया और फिर हमें लेकर सीधा वहां की कैंटीन ..वहां जाकर एक बढ़िया सी आइसक्रीम हमारे लिए मंगाई और हाथ जोड़कर हमारे सामने बैठ गया ..कि अगर हमने उसकी शिकायत कर दी तो उसकी नौकरी चली जाएगी फॉरेन स्टुडेंट का मामला है . खैर उस आइसक्रीम से हमारा दिमाग थोडा ठंडा हुआ और हमने उसे माफ़ कर दिया.ये सोच कर कि वो फ़रिश्ता जो हमें यहाँ तक छोड़ गई वो भी हमें इसी की वजह से मिली थी .और उस दिन से रूसी लोगों के लिए हमारे मन में जगह बन गई.उस लड़की ने अपना नाम "लेना" बताया था और वो भी एक स्टुडेंट ही थी पर शायद किसी और फैकल्टी की ... उसके बाद उसे हमने ढूंढ़ने की बहुत कोशिश की क्योंकि शुक्रिया तक नहीं कह पाए थे उसे हम ..पर वहां "लेना, ओल्गा ,जैसे नाम हर दूसरी लड़की के होते हैं ..तो वो हमें फिर कभी नहीं मिली .शायद मेरे माता -पिता की दुआओं के चलते भगवान ने ही उसे हमारे लिए भेजा था.
तो ये था हमारी जिन्दगी का वो पहला और सबसे खतरनाक वाकया जिससे हम पता नहीं कैसे उबार पाए... पर इस घटना ने पूरे हॉस्टल में हमारी धाक जमा दी और हमें "बोल्ड गर्ल" का ख़िताब अनचाहे ,अनजाने ही दे दिया गया.जो बाद में हमारे बहुत काम आया ..... कैसे .? ये आपको फिर कभी बताउंगी .फिलहाल तो इन पंक्तियों के साथ इस पोस्ट को ख़तम करती हूँ
नहीं आता था ऊबड़ खाबड़ रास्तों पर चलना भी
जिन्दगी सिखा ही देती है गिरना भी संभलना भी.
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Voronezh state University.
इससे आगे यहाँ .http://shikhakriti.blogspot.com/2010/08/blog-post_18.html
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" Ye hui na Diosa Wali bat, kahte hain na himmat karke dekhain to har rah aasan hai, baki rah gaya woh koun thi, to diosa ham sab jante hain ki bhagwan kab kis bhesh main mil jayain koi nahi janta, its one of good experience of life so nice of u"
ReplyDeleteमिलते हैं राह में ऐसे लोग कभी कभी
ReplyDeleteजो मंजिल का पता देकर चले जाते हैं।
अच्छा स्मरण शिखा जी
खूबसूरत। बल्कि बहुत ही खूबसूरत। क्या कहने। मैं तो पूरी कहानी में सीधा प्रसारण होते देख रहा था। पर एक बात कहना चाहूंगा हो सकता है आपको अच्छी न लगे। क्या आपको नहीं लगता की रचना कुछ ज्यादा लम्बी हो गई थी। लेकिन फिर भी प्रवाह में पढ़ी जा रही थी। आपको बधाई।
ReplyDeletehttp://udbhavna.blogspot.com/
bahut badhiya sasmarn .sach hi to nam diya hai bold girl .
ReplyDeleteshubhkamnaye
BAHUT KHOOB
ReplyDeleteशिखा जी
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर यादे.........अब जब याद आती होगी तो कैसा लगता है.
मैं तो कुछ और ही समझ रहा था.. भूतिया सा.. हा हा हा.
ReplyDeleteआपका प्रसंग पढ़कर भरोसा बढ़ गया कि अच्छे लोग हर जगह हैं.. सुनाया भी अपने बहुत रोचक तरीके से है.. मैं सोचता रहा कि वो लड़की भूत थी क्या???
बहुत रोचक घटना , मन रोमांचित हो उठा
ReplyDeletekehte hain na na jaane kis roop me narayan mil jaayein...ishwar hamesha hamari madada karta hai...
ReplyDeleteमज़ा आ गया आपका रोमांचक संस्मरण पढ के. अजनबी देश, अनजान लोग और सोलह साल की उमर!!!!! लेकिन आपने भी जिस साहस का परिचय दिया, वो काबिले-तारीफ़ है. उस अनजान लड़की के रूप में तो सचमुच ही भगवान ने आपकी मदद की थी. बस ईश्वर के यही तो रूप हैं और हम कहां-कहां उसे ढूंढते फिरते हैं...बहुत अच्छी पोस्ट.
ReplyDeleteAapka aatm-bal aur aapke antarman se se prasfutit prarthnao ne ishwar ko aapki sahayata hetu (wo kaun thi) ko bhejne ke lie majboor kr dia.
ReplyDeleteबहुत ही रोचक संस्मरण....अपने ऊपर भरोसा रखना ही चाहिए...कभी कभी ज़िंदगी में ऐसे लोग मिल जाते हैं जिन्हें हम कभी नहीं भूल पाते...काश ये संस्मरण वो लडकी भी कहीं पढ़ ले...पर हिंदी तो आती नहीं होगी ना.. :):)
ReplyDeleteइस संस्मरण के साथ ही मुझे एक बचपन में पढ़ी कविता याद आ गयी...
ज्यों निकल कर बादलों की गोद से
थी एक बूँद आगे बढ़ी ....
बहुत रोचक संस्मरण रहा...उस वक्त क्या हालत रही होगी, इसका बस अंदाजा ही लगाया जा सकता है.
ReplyDeleteसंगीता दी ! क्या पंक्तियाँ याद करा दीं..मेरी पसंदीदा कविता है ये :) शुक्रिया
ReplyDeleteHi..
ReplyDeleteKahte hain..
Girte hain shahsawar hi, maidane jung main,
wo shaks kya girenge jo, ghutnon ke bal chalen..
So jo etni door videsh jaane ka sahas kar paya ho uske liye Moscow kya, Varanesh kya.. Jo ye ladki Bold na hoti to Russia pahunchne ka sahas hi kahan kar paati..hai na.. Are hum to aaj bhi ghar ke bahar nikalne main ghabdate hain.. Par kya kar roti ke jugad main nikalna hi padta hai..
Desh ho ya Videsh, har kadam, har din sabko hi naye anubhav hote rahte hain jo aagpko aur paripakva banate rahte hain..
Jeena jise kahte hain, aasan nahi hota,
kanton se guzarna hai..
Daaman bhi bachana hai..
Rochak sansmaran..
DEEPAK..
www.deepakjyoti.blogspot.com
बड़ा सस्पेंस्फुल और रोचक संस्मरण रहा शिखा जी ।
ReplyDeleteभाषा की वज़ह से कभी कभी अजीबो गरीब हालात पैदा हो जाते हैं ।
लेकिन अंत भला सो सब भला ।
मैं भी कुछ भूतिया सा ही सोच रहा था...:)
ReplyDeleteलेकिन बड़ा खूबसूरत कहानी लगा शिखा जी..
कहानी के बीच ३-४ बार मोबाइल मेसेज भी बजा लेकिन हम तो कहानी पढ़ने के मोड में थे सो पढ़ लिए :)
और वो पहली वाली कहानी भी हम नहीं पढ़े थे..तो आज दो दो कहानी पढ़ें...
मस्त लगा :)
यादों के झरोखों से निकले सुंदर संस्मरण....प्रस्तुति बढ़िया लगी..धन्यवाद
ReplyDeleteयह हुआ कोई संस्मरण, बोल्ड और बिंदास! शुक्रिया !
ReplyDeleteमैंने दो तीन दिन पहले फ्लैशबैक - राइटिंग की
ReplyDeleteचर्चा की है , उसकी एक अच्छी झलक आज भी
दिखी !
शाशा से निराशा हुई पर लेना ने अमिट छाप
छोड़ी आपके मनोमस्तिष्क पर !
आपको 'बोल्डनेस' का दर्जा मिला तो इतनी कम
उम्र को देखते हुए , सही ही है !
हर जगह अच्छे लोग मिल जाते है !
आगे इन्तजार है आपके फ्लैशबैक लेखन का ! आभार !
मै पहले ही समझ गया था, कि यह होने वाला है लेकिन आप हिम्मती थी, ओर किस्मत ने भी साथ दिया, हमारे साथ भी कुछ ऎसा ही कभी हुआ था लेकिन इतना ज्यादा भी नही, बहुत अच्छा लगा धन्यवाद
ReplyDeleteअरे..... मैं कबसे परेशां हूँ.... कमेन्ट ही नहीं पोस्ट हो रहा है..... अब जाकर ऑप्शन आया है..... और रश्मि जी पर तो जा ही नहीं रहा है...... अब पोस्ट पढ़ लूं.... फिर आता हूँ....
ReplyDeleteसांस रोके पढ़ गयी ,जब तक तुम यूनिवर्सिटी नहीं पहुँच गयी...जैसे ही जिक्र किया कि अकेले सफ़र पर निकल पड़ी...लगा कुछ ना कुछ गड़बड़ तो होने वाली है,तभी तो वो यात्रा संस्मरण लायक बनी...पर अंत में सब कुछ सही हुआ होगा..ये विश्वास भी था...
ReplyDeleteसब कुछ आँखों के आगे चलचित्र सा साकार हो गया...वो हाथों में डिक्शनरी थामे ,छोटी सी सोलह साल की किशोरी...वो रशियन कपल,..साफ़ सुथरी ट्रेन और वो एंजेल 'लेना'..और हाँ दुबल पतला खींसे निपोरता' शाशा' भी :)
प्रवाह बहुत ही अच्छा था...कब शुरू, कब ख़त्म...पता ही नहीं चला...
वाह मज़ा आया ये जांबाजी देख .....
ReplyDeleteतभी तो आप आज ब्लोगर हैं .....!!
गर्व है आप पर ......!!
शिखा जी,
ReplyDeleteएक शेर देखिये...अपना ही है....
सफ़र ये आसमानों का बहुत दुश्वार है लेकिन,
हमारे हौसले पर बनके खुद परवाज़ करते हैं.
रोचक संस्मरण ,,,बीच में कुछ रहस्यपूर्ण था ...पर अंत भला तो सब भला
ReplyDeleteनहीं आता था ऊबड़ खाबड़ रास्तों पर चलना भी
ReplyDeleteजिन्दगी सिखा ही देती है गिरना भी संभलना भी...
वाह ...
रोचक संस्मरण ...!!
...प्रसंशनीय पोस्ट !!!
ReplyDeleteWelcome Bold Girl..:P
ReplyDeleteagar dil ke andar ek ikshha ho, to aadmi kahin bhi, kisi bhi jagah apne ko jeeta hua dekh sakta hai........aur fir wo upar wala bhi to hai......ek guardian!!
waise aapke smaran-katha se hame kya, lekin itni umda kahani ke sakal me aapne likhi.......ki puri padhnee pari.........:D
best wishes!!
वाह! क्या बहादुर लड़की हो? लेकिन जिन दिशा में चल निकले राहें खुद बा खुद बन जाती हैं. कुछ श्रेय ऐसे होते हैं कि जिन्हें हम दे कर भी दे नहीं पाते हैं.
ReplyDeleteऐसे वाकये वाकई किसी ईश्वर के भेजे दूत की तरह से होते हैं.
वो ख़िताब तो मिलना ही था
ReplyDeleteआपने जो सजीव चित्रण किया
एक बार लगा ki राज कपूर कि फिल्म देख रहे हैं
जैसा कि सभी जानते हैं कि राजकपूर साहब ने भी
बहुत ही डिसेंट वे में हर चीज दिखाई, लेकिन दिसेंसी नही खोई
इसमें एक समानता और हे , राजकपूर साहब भी रूस में फेमस हैं,
और आपने भी वही ka उसी अंदाज में चित्रण किया
बधाई हो
bold to waqt ne bana hi diya...
ReplyDeletekya baat hai di ...abde dhaansu andaz me aapne post khatm ki ... aur han mummiyan to aisi hi hotio hain ,... chawal daal sab baandhne wali...hehehe..khair shuqar hai ki lena mil gayi ... warna ye bold girl waheen do char ghante bhatki hoti ..hehe padh ke maza aayaa...sansmaran mast ban pada hai aap ka...
ReplyDeleteGod helps those , who help themselves !
ReplyDeleteरामसे ब्रदर्स के लिए एक अच्छा प्लाट।
ReplyDelete--------
क्या आप जवान रहना चाहते हैं?
ढ़ाक कहो टेसू कहो या फिर कहो पलाश...
आज रात पढि़ए ब्लोग जगत के महारथी महामानव फुरसतिया सर को समर्पित कविता। दोबारा याद नहीं कराऊंगी। खुद ही आ जाना अगर मौज लेनी हो, अब तक तो वे ही लेते रहेंगे, देखिएगा कि देते हुए कैसे लगते हैं फुरसतिया सर।
ReplyDeleteबहुत रोचक संस्मरण है!
ReplyDeleteआता था ऊबड़ खाबड़ रास्तों पर चलना भी
ReplyDeleteजिन्दगी सिखा ही देती है गिरना भी संभलना भी.
आपने इतना अच्छा दर्शन पकड़ रखा है कि बड़ी मुश्किलें भी आपके सामने आसान हो जाएंगी। बहुत बहादुर हैं आप। सैल्यूट करता हूँ आपको...।
अत्यंत भावपूर्ण नाम है आपके ब्लॉग का.... "स्पंदन"
ReplyDeleteपुरानी यादें सहारा होती हैं जीवन का ... बहुत सुन्दर शब्दों से लिखी हई अभिव्यक्ति.....
सादर वा साभार ....
शलभ गुप्ता
www.shalabhguptapoems.blogspot.com
रोचक संस्मरण ।
ReplyDeleteसुन्दर संस्मरण . वोल्गा के देश में लेना की सहयोगात्मक प्रवृति मुझे अच्छी लगी , वैसे बाकी बाते तो ऊपर कही जा चुकी है, देर से आने के कुछ फायदे होते है . वैसे आपकी कलम में जादू है , वो लेना थी जिसका आपको अभी भी इंतजार है, उसे धन्यवाद बोलने के लिए,
ReplyDeleteसुंदर किस्सा...यात्रा वृत्तांत ...बहुत बढ़िया !!! अआज बहुत दिनों के बाद आप को पढ़ रहा हूँ ...पढ़कर निराश नहीं हुआ...खुशी हुई ...आजकल ब्लाग पर बहुत फूहड़ लिखा देख कर निराशा ही हाथ लगती है...ऐसे में कुछ आप जैसे अच्छे रचनाकारों को पढ़कर दिल खुश हो जाता है ...धन्यवाद !!!
ReplyDeleteरोचक संस्मरण.......... खूब सामना किया कठनाईयों का।
ReplyDeleteitna kyu likhte ho ki pada bhi na jaye
ReplyDeleteबहुत रोचक संस्मरण है...विदेशों में ऐसे वाकये होते ही रहते हैं...फ़्रांस में जहाँ जान बूझ कर लोग इंग्लिश ना समझने का नाटक करते हैं हमें रेलवे स्टेशन से निकने में दो घंटे लग गए...कोई रास्ता बताने को तैयार ही नहीं...या हम क्या पूछ रहे हैं जानने को उत्सुक ही नहीं था...भला हो दो पाकिस्तानी युवकों का जिन्होंने हमारी दशा पर तरस खाया और बहार छोड़ गए...आप का संस्मरण पढ़ कर हमें भी वो दो घंटे याद आ गए...
ReplyDeleteनीरज
mai bus bold girl ke khitab par itna hi kahunga ki jindgi me bahut kuch hume vo mil jata hai jisko hum nahi chahte khair ho sakta hai ye khitab aapne chaha ho
ReplyDeleteआपका संस्मरण अच्छा लगा...
ReplyDeletebahut hi prasangik aur rochak sansmaran...aur ant ke wo do line bahut pasand aaya.
ReplyDeleteहम्मम्मम्म............. इस संस्मरण ने बहुत मज़ा दिला दिया...... सबसे मजेदार इनसिडेंट तो ट्रेन में वो रोमांटिक पलों का रहा .... काश! इंडिया में भी ऐसा होता तो मैं तो रोज़ ही ट्रेन में सफ़र करता करता...... मज़ा आ गया इस संस्मरण में......
ReplyDeletebaap re...tumharee himmat yaar....gazab kee hai...maan gae ustaad..maan gae
ReplyDeleteबहुत अच्छा लगा आपका यह संसमरणात्मक लेख ... अमरेन्द्र ने नाम भी सुन्दर सी विधा का दे दिया फ्लैशबैक लेखन ...
ReplyDeleteDi,,,.
ReplyDeleteek co incidence hi hua...kal hi ek mitr se isi baat par lambi behas hui...aaj aapka yeh sansmaran padhne ko mila...:):)
bahut achha likha hai Di..ek ek scene ankhon k aage ghoom gaya...ecen Lena ka hulia aapne bataya nahin..magar maine uska bhi ek clone taiyyar kar liya ankhon k aage......
bahut achha hunar hai Di aapki shabdon mein...paathak ko aisa lagta hai jaise sab uske sath hi ho raha ho.....
aur haan ...
'' पुच्ची '' ....humare college terminology mein bhi yahi shabd use hota tha........Di..aapne kitni yaadein yaad dilayin ek shabd se....meri sab dost aaj apni apni sasuraal mein hain..aur ek ek baby se bhagwaan ne unhe nawaaza hain..aajkal saari puchhiyaan unhi bachchon ki proerty bani huin hain..:P :D
:):)
Bless You Di...
यात्रा वृत्तांत की भाषा में इतनी लयात्मकता है कि इसे कहानी भी कहें तो गलत नहीं है. दिल के अन्दर तक आपके सन्देश जाते प्रतीत हुए
ReplyDelete- विजय