एक खिड़की से झाँक रहा था
साथ थाल में पड़ी थी रोटी
चाँद अस्मां का मांग रहा था
माँ ले कर एक कौर रोटी का
उसकी मिन्नत करती थी
लाके देंगे पापा शाम को
उससे वादा करती थी
पास खड़ा एक मासूम सा बच्चा
उसको जाने कब से निहार रहा था.
हैरान था उनकी बातों पर वो
बालक जाने क्या मांग रहा था.
उसकी माँ तो रोज़ रात को
जब काम से आया करती है
इस थाली में ही छोटा सा
चाँद दिखाया करती है


बहुत खूबसूरती से अमीर और गरीब बच्चे के मनोविज्ञान को दर्शाया है....
ReplyDeleteउसकी माँ तो रोज़ रात को
जब काम से आया करती है
इस थाली में ही छोटा सा
चाँद दिखाया करती है
इन पंक्तियों को पढ़ कर वाह के साथ एक आह भी निकल गयी...खूबसूरत प्रस्तुति...
उसकी माँ तो रोज़ रात को
ReplyDeleteजब काम से आया करती है
इस थाली में ही छोटा सा
चाँद दिखाया करती है
बहुत सुन्दर और मार्मिक भी
शब्दों का बंधन बखुबी किया है आपने।
ReplyDeleteथाली में चांद गरीबी देखा ही करती है।
आभार शिखा जी
रोटी और चांद...
ReplyDeleteसही बात है एक गरीब के बच्चे के लिए रोटी को पा लेने का मतलब शायद चांद को पा लेना ही है।
आपने शानदार लिखा है।
रचना बताती है कि आप दूसरों के जीवन का भी ख्याल रखना जानती है। दूसरों की सुख-सुविधा और दुख के बारे में लिखना ही शायद सच्ची रचनाशीलता है। अपने सुख के लिए लिखने वाले मुझे हर रोज ब्लाग में नजर आते ही हैं।
आपको बधाई।
अरे हां... एक गीत भी याद आ रहा है-
किसी की मुस्कुराहटों पर हो निसार
किसी का दर्द मिल सकें तो ले उधार
किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार
जीना इसी का नाम है.
Kaisi vidambana hai yah!
ReplyDeleteOh ye aapki kavita thi keya, dil ko khu lene wali hai yeh, even i voated it invisibly.
ReplyDeleteचाँद और रोटी - बहुत कुछ कह गयीं आप शिखा जी। वाह - संवेदित कर गयी ये रचना।
ReplyDeleteमुझे लगता है कि टंकण के चलते पहली ही पंक्ति में नौनिहाल, नौ निहाल लिखा गया है। हो सके तो उचित सुधार कर दें। उम्मीद है अन्यथा नहीं लेंगी।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
@Sant sharma !जी यह मेरी ही कविता थी १ वोट से रह गई .2nd आई है :)
ReplyDeleteसुन्दर शब्द-चित्र है!
ReplyDeleteउसकी माँ तो रोज़ रात को
ReplyDeleteजब काम से आया करती है
इस थाली में ही छोटा सा
चाँद दिखाया करती है
बहुत ही भावपूर्ण रचना....समाज की विसंगतियों को उकेरती हुई...एक शेर भी कुछ ऐसा ही था, शब्द याद नहीं आ रहें...भाव याद हैं..."जिसमे अमावस के दिन एक दुखिया माँ से उसकी बेटी पूछती है...मेरी रोटी कहाँ गयी??"...आखिर बड़े शायर लोग एक जैसा ही सोचते हैं.
vehatareen tulanaa hai
ReplyDeleteअद्भुत-मार्मिक-यथार्थ..."
ReplyDeleteBahut sundar..
ReplyDeleteaasmaan ka chaand aur thaali ka chand...!!
Achha sochti hain aap............
ReplyDeletepar kya sahi mein aisa hai ya phir tareef or inaam pane ki ichha rahti hai......main chahunga ki meri soch galat ho aur aap sahi .
Aisay hi achha sochein aur jiwan mein utaarein.
bahut santusht rahiye.
" संजय जी ! मैं न तो कोई स्थापित लेखिका हूँ न कोई महान इंसान ..बस कुछ भावनाएं हैं जिन्हें शब्द रूप दे देती हूँ ..अब उसपर कोई इनाम दे दे तो इनकार भी नहीं आखिर ये भी होस्लाफ्जाई का एक माध्यम ही है .
ReplyDeleteबहुत शुक्रिया आपकी प्रतिक्रिया का..
वाह बहुत भाव पुर्ण मार्मिक कविता,
ReplyDeleteधन्यवाद
waah ek maarmik nadi baha di aapne thaali se aasmaan tak...bahut sundar...shikha ji maan gaye aapko...waise ek rachna maine bhi likhi thi...ae chanda tu mere bada kaam aaya....kabhi padhiyega....abhaar is sundar rachna ke liye...
ReplyDeletechand aur roti, KAFI purana sambandh he
ReplyDeletegaribi aur amiri ka anutha sambandh
achchi prastuti
ज्यादा तो नही जानता हूं कविता के बारे में लेकिन इतना ही कहूंगा कि अगर किसी भूखे बच्चे को रोटी मिल जाए तो वो उसके लिए पूर्णिमा के चांद से भी सुंदर होती है ...काश कि हम इन चीजों में वो खुशियां ढूंढ लेते जो ये बच्चे ढूंढ लेते है बच्चे होकर भी हमसे बडे है ...और उसका एहसास करने वाले भी कम नही ...कम से मरती हुई दुनिया में अभी सेवदनशीलता तो बची है ..
ReplyDeleteहर किसी को कुछ न कुछ चाहिए "एक वस्तु जो एक के लिए सहज है वही दुसरे के लिए दुर्लभ "
ReplyDeleteबहुत बढ़िया
देखा.. अब ऐसे ही थोड़े ना किसी रचना पर पुरस्कार मिल जाता है.. पढ़कर लगा कि सच में संवेदना को कुरेदने का काम करती है ये कविता..
ReplyDeleteबेहद संवेदनशील रचना.. दिल तक उतर गई..सच में.. साधुवाद इस रचना के लिए !! आभार !
ReplyDeleteबढिया रचना।
ReplyDeleteरोटी और चाँद ,याद आये मुक्तिबोध!
ReplyDeleteबहुत मार्मिक चित्रण के साथ दिल को छू लेने वाली संवेदनशील कविता....
ReplyDelete(यह कमेन्ट लिखते वक़्त मैं सोच रहा हूँ कि....'बेटा ....तू अब बहुत मार खाने वाला है....")
संवेनशील रचना ...किसी का चाँद आसमां में है तो किसी का चाँद थाली में ...एक का पेट भरा है दूसरे का खाली है ...कैसी विडम्बना है यह अनंतकाल से ।
ReplyDeleteHi..
ReplyDeleteAlag alag duniya hai sabki..
Jeevan ke apne hain rang..
Jitni hai samarthya kisi ki..
Bahlane ka vaisa dhang..
Kavita bahut hi sundar ahsaas liye hai jiski rachna ke liye aap badhai ki patr hain..
DEEPAK..
बहुत सुन्दर और मार्मिक
ReplyDeleteकितना जुदा है ना
ReplyDeleteउसका चाँद
इसका चाँद ...
बच्चे की मनोव्यथा को अच्छी तरह अभिव्यक्त किया ..!!
चाँद को हर सख्स एक अलग ही उपमा देता है.. आज आपका लिखा पढ़कर गुलज़ार साहब की लिखी त्रिवेणी याद आयी..
ReplyDeleteमां ने जिस चांद सी दुल्हन की दुआ दी थी मुझे
आज की रात वह फ़ुटपाथ से देखा मैंने
रात भर रोटी नज़र आया है वो चांद मुझे
मैं क्या कहूँ शिखा जी..
ReplyDeleteबहुत बहुत ज्यादा पसंद आई ये कविता..बहुत ज्यादा...दिल खुश हो गया :)
थी मेरे भी घर जब कली एक आई...
ReplyDeleteदी खुशियों की हल्की सी लौ तब दिखाई...
मगर दर्द की तब चली तेज आँधी...
वो रोटी बिलखकर जो उसने थी माँगी...
तो थाली मे पानी से तुझको दिखाया...
ऐ चंदा! तू मेरे बड़ा काम आया…
maa ne ik chand si dulhan ki dua di thi
ReplyDeleteaaj ki raat jo footpath se dekha maine
raat bhar roti nazar aaya hai chaand mujhe
-gulzar
behad achhi nazm aap ki didi.... :) ek bachha ek mazdoor ..lekin chand aur roti..:(
क्या ब्लोग्वानी ऐसे ब्लोगों को रख कर खुश होता है या यह उसकी मजबूरी है
ReplyDeleteदेख लीजिये खुद ही ब्लोग्वानी को जहां मां बहन की हद दर्जे की अश्लील गालियाँ खुले आम दिखाई जाती हैं आगे पढ़ें और देखें
shikha ji aapki kavita bahut acchhi lagi...aur hamare ek sahitykaar Aachary Raam Chandr Shukl ji kahte hain ki kavita vahi mani jati hai jo aam jan jivan par aur samaj ki soch par likhi jati hai. yahi jhalak apki kavita me mili. aabhar.
ReplyDeleteआईये जानें .... मैं कौन हूं!
ReplyDeleteआचार्य जी
सबके लिए चाँद के अलग अलग मायने हैं, पर सभी के लिए चाँद खुश्नुमा ही होता है। सुन्दर रचना।
ReplyDelete--------
रूपसियों सजना संवरना छोड़ दो?
मंत्रो के द्वारा क्या-क्या चीज़ नहीं पैदा की जा सकती?
शिखा दीदी,
ReplyDeleteकमाल की रचना मन को अन्दर तक छू गयी
भावनाओं को बखूबी शब्दों में डाला है आपने.
यही सोंच रहा हूँ कैसे ख़याल आ रहें होंगे जब आप ये रचना गढ़ रहीं होंगी ...उम्दा काम
vaakai....bahut khoobsurat kavita...
ReplyDeletesundar rachna.
ReplyDeleteभौतिकवाद के परिणाम और भी भयानक हो सकते हैं।
ReplyDeleteकल से जो शेर याद करने की कोशिश कर रही थी...अब जाकर याद आया सोचा..लिख ही दूँ...
ReplyDeleteअमावस का मतलब बिटिया को, दुखिया माँ ने , ये समझाया
भूख की मारी रात अभागन,आज चाँद निगल गयी है.
अच्छा लिखा।
ReplyDeleteबहुत भावपूर्ण!!
ReplyDeleteबहुत प्यारी कविता है.
ReplyDeletebahut khub
ReplyDeleteफिर से प्रशंसनीय रचना - बधाई
उसकी माँ तो रोज़ रात को
ReplyDeleteजब काम से आया करती है
इस थाली में ही छोटा सा
चाँद दिखाया करती है ..
कहीं एक शेर पढ़ा था ...
एक भूखे की कला का रूप तो देखो
चाँद में भी उसने रोटी तलाशी है ...
बहुत ही लाजवाब रचना है आपकी ....
बड़ी खूबसूरती से अंतर दर्शाया है.बहुत सुंदर. आभार.
ReplyDeleteगुमशुदा कविता की तलाश
ReplyDeleteखो गई है
मेरी कविता
पिछले दो दशको से.
वह देखने में, जनपक्षीय है
कंटीला चेहरा है उसका
जो चुभता है,
शोषको को.
गठीला बदन,
हैसियत रखता है
प्रतिरोध की.
उसका रंग लाल है
वह गई थी मांगने हक़,
गरीबों का.
फिर वापस नहीं लौटी,
आज तक.
मुझे शक है प्रकाशकों के ऊपर,
शायद,
हत्या करवाया गया है
सुपारी देकर.
या फिर पूंजीपतियो द्वारा
सामूहिक वलात्कार कर,
झोक दी गई है
लोहा गलाने की
भट्ठी में.
कहाँ-कहाँ नहीं ढूंढा उसे
शहर में....
गावों में...
खेतों में..
और वादिओं में.....
ऐसा लगता है मुझे
मिटा दिया गया है,
उसका बजूद
समाज के ठीकेदारों द्वारा
अपने हित में.
फिर भी विश्वास है
लौटेगी एक दिन
मेरी खोई हुई
कविता.
क्योंकि नहीं मिला है
हक़.....
गरीबों का.
हाँ देखना तुम
वह लौटेगी वापस एक दिन,
लाल झंडे के निचे
संगठित मजदूरों के बिच,
दिलाने के लिए
उनका हक़.
कुछ अछि रचनायें आपके ब्लॉग पर मिली ....पढ़ कर काफी अच्छा लगा....
ReplyDeleteअभी आपका पूरा ब्लॉग तो छाना नहीं है पर जल्द ही वो भी करूंगा.....धन्यबाद
superb shikha superb
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