Monday, 14 June 2010
एक बुत मैडम तुसाद में .
बैठ कुनकुनी धूप में
निहार गुलाब की पंखुड़ी
बुनती हूँ धागे ख्वाब के
अरमानो की सलाई पर.
एक फंदा चाँद की चांदनी
दूजा बूँद बरसात की
कुछ पलटे फंदे तरूणाई के
कुछ अगले बुने जज़्बात के ....
सलाई दर सलाई बढ चली
कल्पना की ऊंगलियाँ थाम के
बुन गया फिर से एक ख्वाब
मन की किसी खाली कोने में
जिस दिन कल्पना से निकल
ये मन
जीवन के धरातल पर आएगा
उस दिन मैडम तुसाद में एक बुत
इस नाचीज़ का भी लग जायेगा.
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Kitna sundar buna hai yah khwab!Na,na,ise to aapke man me hee rahna chahiye..
ReplyDeleteये क्या कह रहीं हैं आप.. मैडम तुसाद में जाने के लिए 'नाचीज़' नहीं 'चीज़' होना पड़ता है... :P
ReplyDeleteखैर आप जरूर वहाँ पहुंचेंगी ये मुझे पता है.. पर उसके बाद टिकेट फ्री हो जायेगा ना???? २००० रुपये बचेंगे.. staff ke honge sare blogger then no ticket
wah wah wah.....another gem from you shikha ji...
ReplyDeleteवैसे एक गाना मैं भी खूब गाता हूँ -
ReplyDelete''एक्टिंग का ऑस्कर मीले
राइटिंग का बुकर मिले
शांति का नोबल मिले..
मैं ज्यादा नहीं मांगता..
सुन भी ले.. सुन भी ले..
सुन भी ले ऐ खुदा...........'' :)
दीपक जो चीज़ होते हैं ना वही खुद को नाचीज़ कहते हैं.. :):)
ReplyDeleteबहुत खूबसूरत रचना
कुछ पलटे फंदे तरूणाई के
कुछ अगले बुने जज़्बात के ....
सलाई दर सलाई बढ चली
कल्पना की ऊंगलियाँ थाम के
बुन गया फिर से एक ख्वाब
एक एक पंक्ति..ख्वाब बुन रही है...
अरे दीपक ! एकदम सही जा रहे हो ..जरुर सुनेगा खुदा :) और टिकेट ? अरे फ्री क्या VIP Treatment मिलेगा जी मजाक बात है क्या ...:)
ReplyDeleteइतनी सुंदर अभिव्यकित की बहुत बहुत बधाई
ReplyDeleteकुछ पलटे फंदे तरूणाई के
कुछ अगले बुने जज़्बात के ....
सलाई दर सलाई बढ चली
कल्पना की ऊंगलियाँ थाम के
बुन गया फिर से एक ख्वाब
जिंदगीभर ढूंढता रहा,
ReplyDeleteतलाश मेरी ख़त्म न हुई।
जिंदगीभर क्या ढूंढता रहा,
यही मुझको खबर न हुई।
thanx for visiting my Son;s Blog
http://madhavrai.blogspot.com/
bahut sundar buna
ReplyDeletebut ka taana baana
http://sanjaykuamr.blogspot.com/
कल्पना की ऊंगलियाँ थाम के
ReplyDeleteबुन गया फिर से एक ख्वाब
यूँ ही नये ख्वाब सजते रहें। सुन्दर भाव।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
बैठ कुनकुनी धूप में
ReplyDeleteनिहार गुलाब की पंखुड़ी
बुनती हूँ धागे ख्वाब के
अरमानो की सलाई पर.
एक फंदा चाँद की चांदनी
दूजा बूँद बरसात की
कुछ पलटे फंदे तरूणाई के
कुछ अगले बुने जज़्बात के ....
मन को छू लेने वाली रचना...
वाह...स्वप्निल ख्वाबों की कितनी खूबसूरत दुनिया बुनी है अपने...
ReplyDeleteनीरज
सपनों के ताने बाने पर बुनी जीबन की खूबसूरत कहानी......बेहतरीन प्रस्तुति..बधाई।
ReplyDeleteसुन्दर प्रस्तुति.
ReplyDeleteखूबसूरत ख्वाबो की नीड़. वैसे मैडम तुसाद क्या चीज है , वहा तो केवल मोम की प्रतिकृतिया सजाई जाती है , आप तो खुद कला की चलती फिरती संग्रहालय हो. जहा कलाए आपने आप को पाकर आपने भाग्य पर इठलाती है. मैंने कुछ भी तो अतिरंजित नहीं कहा.??
ReplyDeleteachcha socha ...hamein bhi VIP treatment dila dijiyega....bahut sundar rachna...
ReplyDeleteमंगलवार 15- 06- 2010 को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है
ReplyDeletehttp://charchamanch.blogspot.com/
अद्भुत शिल्प और सोच की कविता!
ReplyDeleteआप सोचेंगी...ये नाशुक्रा है...बदमाश है...दुआ करने की जगह बद्दुआ कर रहा है...पर अल्लाह मेरी माने, तो उससे यही कहूंगा...ये गुलाब की पंखुड़ी महकती रहे, बुनती रहे धागे ख्वाब के, अरमानो की सलाई सधी रहे, एक फंदा चाँद की चांदनी बुनती रहे...बूँद बरसात की चेहरे पर ओढ़े गुनगुनाती रहे...चमकती रहे. बात जज़्बात की होती रहे...ये कली महकती रहे...बुत ना बने...पत्थर की हो जाएगी अपनी शिखा...यूं ही ब्लॉग उपवन में महकती रहे...तुसाद से दूर ही रहे...
ReplyDeleteजिस दिन कल्पना से निकल ये मन
ReplyDeleteजीवन के धरातल पर आएगा
उस दिन मैडम तुसाद में एक बुत
इस नाचीज़ का भी लग जायेगा.
कल्पनाओं की उड़ान ने
रचना को बहुत जानदार बना दिया है!
बुनती हूँ धागे ख्वाब के
ReplyDeleteअरमानो की सलाई पर.
ख्वाबो के धागे से बुनी एहसास की गर्माहट की आहट है ये रचना
सुन्दर
:)
ReplyDeleteशिखाजी , आपकी सारी बातें अच्छी लगी लेकिन ' मन के किसी खाली कोने में जिस दिन कल्पना से निकल ये मन जीवन के धरातल पर आएगा ' उस दिन जीवंत हो जाने की जगह एक निर्जीव बुत हो जाने का खयाल ...........चाहे वो किसी मैडम तुसाद में ही क्यों न हो .......कुछ और सोचिये :-)
ReplyDeleteबैठ कुनकुनी धूप में
ReplyDeleteनिहार गुलाब की पंखुड़ी
बुनती हूँ धागे ख्वाब के
अरमानो की सलाई पर.--------------------------ख्वाबों के धागे---अरमानों की सलाई--सुन्दर बिम्बों क प्रयोग्। बेहतरीन अभिव्यक्ति।
वाह!! क्या कल्पना है!! बहुत खूब.
ReplyDeleteआप तो दिलों में बैठी हैं बुत बनकर, आप की जगह मैडम तुसाद में नहीं हमारे दिलों में है!
ReplyDeleteएक एक शब्द को आपने कितनी खूबसूरती से बुना है....शब्दों के फंदे से कविता की बुनाई बहुत अच्छी लगी......
ReplyDeleteतुसाद के बुतखाने में नहीं
ReplyDeleteहम सब के मन में आप आदरणीया सदा थीं हैं और रहेंगी
रत्नाकर जी ने ये टिप्पणी गलती से दूसरी पोस्ट पर दी है मैं इसे यहाँ पेस्ट कर रही हूँ .
ReplyDeletemain... ratnakar said...
जिस दिन कल्पना से निकल
ये मन
जीवन के धरातल पर आएगा
उस दिन मैडम तुसाद में एक बुत
इस नाचीज़ का भी लग जायेगा.
ghazab kar diya aapne, jitanee khubsoorat lekhani hai utana hee khubsoorat blog bhee. v indian r proud of people like you. pls do write more and more. got any time pls visit my blog www.mainratnakar.blogspot.com
आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।
ReplyDeleteकब लग रहा है बुत? अब तो हम तभी लंदन की यात्रा करेंगे।
ReplyDeleteबहुत सटीक...इस अन्तर्द्वन्द से मैं भी गुजरा...
ReplyDeleteअरे वाह...जरूर लगेगा और जल्दी ही लगेगा
ReplyDeleteहिंदी ब्लॉग्गिंग की तरफ से भी तो कोई होना चाहिए
क्या संयोग है...इधर आपकी ये पोस्ट पढ़ रहा हूं, उधर गोल्ड एफएम पर गाना आ रहा है...
ReplyDeleteकिसी पत्थर की मूरत से...
परस्तिश की तमन्ना है,
इबादत का इरादा है,
किसी पत्थर की मूरत से...
जय हिंद...
sundar kavita ....badhai
ReplyDeleteItni sundar abhivyakti......itni khubsurat soch......:)
ReplyDeletechha gayee aap!!
sach me sapne dekho to aisee......Seedha Madam Tussad Meauseum ke darwaje ko dastak de gayee!!
Lekin hame lagta hai, aap me hai wo dummmm...:D
Hai na Sikha jee!!
Waise saare Bloggers ki blessings to rahegi hi!!:D
sundar rachna
ReplyDeleteसुन्दर रचना ...
ReplyDeleteमन बस इतना हीं चाहता है
खुदा आपकी मुराद पूरी करे...
बड़े सुन्दर शब्दों में अपने ख़्वाब को बुनने की प्रक्रिया बयां की है . बुत क्यों लगा रही हो , तुम सजीव ही काफी हो आओ हम माला पहना कर तुम्हारा अभिनन्दन करेंगे . इतनी सजीव कविता के लिए .
ReplyDeleteshikha ji,
ReplyDeletekalpana ki salaai par bade sunahre khwaab bune aapne...
सलाई दर सलाई बढ चली
कल्पना की ऊंगलियाँ थाम के
बुन गया फिर से एक ख्वाब
मन की किसी खाली कोने में
जिस दिन कल्पना से निकल
ये मन
जीवन के धरातल पर आएगा
उस दिन मैडम तुसाद में एक बुत
इस नाचीज़ का भी लग जायेगा.
jab aapka but madam tusaad mein lag jayega to aap to naacheez se cheez ban jayengi, par afsos aapke but ke sath main tasweer na khichaa paaungi. maine apni salaai ke fande se khwaab to zarur bune par us khwaab mein amrit na pee saki, to meri rooh wahan zarur pahuchegi aur beticket darshan karegi.
maza aa gaya padhkar, khwaahish se hin to sambhaawna janm leti hai aur sapne pure hote...shubhkaamnayen.
रचना अतिसुन्दर ।
ReplyDeleteबहुत खूब मैडम, वैंसे मुझ जैंसे छोटे ब्यक्ति की प्रशंसा से आपकी अभिब्यक्ति को कोई फर्क नहीं पड़ता.लेकिन मैडम भगवान् से प्राथना है की आप जैंसे महान लोग जो, हम जैंसे लोगो की साहित्य की तृष्णा को बुझाते है, उन सबका बुत, मैडम तुसाद में लगे.
ReplyDeleteवाह्………………अकल्पनीय कल्पना साकार हो।
ReplyDeletebahut bahut sundar lagi ye kavita...
ReplyDeletekalpana ki udaan aur shbdon ke gathan main taal mel dekhne yogy hai..
khoobsurat..
जिस दिन कल्पना से निकल
ReplyDeleteये मन
जीवन के धरातल पर आएगा
उस दिन मैडम तुसाद में एक बुत
इस नाचीज़ का भी लग जायेगा.
आमीन ... ख्वाबों से निकल कर हक़ीकत की दुनिया में जल्दी ही आएँ .... भगवान आपको इतनी उँचाई दे की आपकी पहचान दुनिया में हो ...
कल्पनाएँ तो मन की सीमा तोड़ धरातल पर ब्लॉग के अवतरित होती ही जा रही हैं...और हम सब उसके रसास्वादन में आलिप्त हैं....यह यात्रा जारी रहें और कामयाबी वह दिन भी दिखाए कि राजनेताओं,और फिल्म अभिनेताओं के बाद किसी ब्लॉगर का बुत भी मैडम तुसाद की गैलरी में लग जाए...
ReplyDeleteशुभकामनाएं एक करोड़ दस लाख :)
ब्लागर का बुत-हा हा हा
ReplyDeleteबेनामी का अवश्य ही लगना चाहिए
अगर नामी का न लग पाए तो।:)
bahut sundar tana bana buna hai..
ReplyDeletekhoobsurat dhage, koobsurat bunai, koobsurat khwab..... khobsurat kalpana, khoobsurat kavita, koobsurat kaviyitri.....wah! didi....behad sundar rachanaa hai....shubhkaamnaa.....
ReplyDeleteबहुत सुन्दर प्रस्तुति बधाई
ReplyDeleteबहुत सुन्दर प्रस्तुति बधाई
ReplyDelete. भगवान आपको इतनी उँचाई दे की आपकी पहचान दुनिया में हो ...
ReplyDeleteसार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।
ReplyDeleteएक फंदा चाँद की चांदनी
ReplyDeleteदूजा बूँद बरसात की
ye to ek dum katilon ke katil type ka misra hai ...zabardast ek dum ... :)
जिस दिन कल्पना से निकल
ये मन
जीवन के धरातल पर आएगा
उस दिन मैडम तुसाद में एक बुत
इस नाचीज़ का भी लग जायेगा.
heheh..aaameeeeeeeeeennnnnnn...aameeeeeeennnnnn
bahut achhi nazm hai di ,...
par uske bad to aap bloggiong chhod dengi... akhir badei hasti ho jayengi...
ReplyDeleteगुमशुदा कविता की तलाश
ReplyDeleteखो गई है
मेरी कविता
पिछले दो दशको से.
वह देखने में, जनपक्षीय है
कंटीला चेहरा है उसका
जो चुभता है,
शोषको को.
गठीला बदन,
हैसियत रखता है
प्रतिरोध की.
उसका रंग लाल है
वह गई थी मांगने हक़,
गरीबों का.
फिर वापस नहीं लौटी,
आज तक.
मुझे शक है प्रकाशकों के ऊपर,
शायद,
हत्या करवाया गया है
सुपारी देकर.
या फिर पूंजीपतियो द्वारा
सामूहिक वलात्कार कर,
झोक दी गई है
लोहा गलाने की
भट्ठी में.
कहाँ-कहाँ नहीं ढूंढा उसे
शहर में....
गावों में...
खेतों में..
और वादिओं में.....
ऐसा लगता है मुझे
मिटा दिया गया है,
उसका बजूद
समाज के ठीकेदारों द्वारा
अपने हित में.
फिर भी विश्वास है
लौटेगी एक दिन
मेरी खोई हुई
कविता.
क्योंकि नहीं मिला है
हक़.....
गरीबों का.
हाँ देखना तुम
वह लौटेगी वापस एक दिन,
लाल झंडे के निचे
संगठित मजदूरों के बिच,
दिलाने के लिए
उनका हक़.