जिन्दगी कब किस मोड़ से गुजरेगी ,या किस राह पर छोड़ेगी काश देख पाते हम. जिन्दगी को बहुत सी उपमाएं दी जाती हैं मसलन - जिन्दगी एक जुआ है , जिन्दगी एक सफ़र है , जिन्दगी भूलभुलैया है आदि आदि .पर पिछले दिनों एक मेट्रो में सफ़र करते हुए सामने की सीट पर कुछ अलग -अलग रूप में नजर आई जिन्दगी मुझे....
एक लबादा सा
ऊपर से नीचे तक
न जाने क्या क्या .
खुद में समाये हुए
कुछ सुन्दर सा या
असुंदर भी शायद
कुछ भी नजर नहीं आता
लगाते रहो अटकलें बस
जाने क्या है उस पार.
दिखने में सीधा सरल
अन्दर वक्र ढेरों लिए
ये जिन्दगी एक बुर्का ही तो है .
********
पेट भर गया है उसका
पेट भर गया है उसका
फिर भी लगाये है मुँह में
तृप्ति नहीं हुई उसकी
या भ्रम में है शायद
हटाया पल भर को
तो अशांत हो गया
फिर लगा दिया खाली ही
शांति मिल गई उसे.
ये जिन्दगी भी तो
जीते रहते हैं हम
यूँ ही
बालक के मुँह में पड़ी
खाली चूसनी की तरह.
*************
आज नहीं मिली
जगह उसे बैठने की
खडी है
जाना तो है ही
लडखडाती है झटको से
थामती है हथ्था एक हाथ से
सम्भल जाती है.
फिर डगमगाती है
गति पकड़ने पर
तो थाम लेती है दोनों हाथों से.
थोडा स्थिर होते ही
फिर छोड़ देती है पकड़न
जिन्दगी में हम भी बस
उतना ही प्रयास करते हैं
जितनी जरुरत है
उस मौजूदा वक़्त की.
(तस्वीरें गूगल से साभार)
वाह वाह वाह
ReplyDeleteबहुत ही अच्छा लिखा है शिखा जी आप ने बिलकुल जिंदगी ऐसी ही होती है | खास कर तीसरा पैरा तो बहुत ही अच्छा लगा |
सोच ही रहा था की पोस्ट अब तक नहीं आई...इसी का तो इन्तेज़ार था :)
ReplyDeleteतारीफ़ तो कर ही चूका हूँ मैं :)
आपने तो वैसे दो सुनाये थे...पहला वाला तो याद है, दूसरा वाला कौन था?
शिखा जी
ReplyDeleteबहुत ख़ूब...अब मेट्रो का सफ़र करते वक़्त आपकी यह पोस्ट ज़रूर याद आएगी...
वाह, आज तो पूरा जीवन दर्शन ही दिख गया आपकी कविता में . जिंदगी दिखती कुछ और होती कुछ और, अतृप्त प्यास है जिंदगी. मृग मरीचिका के पीछे भागता इन्सान ना जाने कितने भंवरो में हिचकोले खाता है फिर भी प्रयासरत होता है जिंदगी के रफ़्तार के साथ कदम ताल मिलाने को . आभार इस सुन्दर और भाव प्रवण कविता के लिए .
ReplyDeleteजिन्दगी में हम भी बस
ReplyDeleteउतना ही प्रयास करते हैं
जितनी जरुरत है
उस मौजूदा वक़्त की.
Kitni gahan baat kah dee....wo bhi itni sahajta se!
आदरणीय शिखा जी
ReplyDeleteनमस्कार !
बहुत ही अच्छा लिखा है
ऐसी कवितायें रोज रोज पढने को नहीं मिलती...इतनी भावपूर्ण कवितायें लिखने के लिए आप को बधाई......शब्द शब्द दिल में उतर गयी.
perfectly define JIndgi
ReplyDeleteexcellent creation!
congrate Shikha ji
आप का ह्र्दय से बहुत बहुत आभार इस सुन्दर और भाव प्रवण कविता के लिए ......धन्यवाद
ReplyDeleteशिखा ,
ReplyDeleteआज तो ज़िंदगी का पाठ पढ़ा दिया ..
अच्छे बिम्ब और बिलकुल नए बिम्ब प्रयोग किये हैं ...ज़िंदगी बुर्का ही तो है ...अंदर कुछ और बाहर दिखता ही नहीं ...
ज़िंदगी चुसनी की तरह , बेमतलब की सी ज़िंदगी ....
और अंतिम तो कमाल ही है ...हम केवल इतना ही प्रयास करते हैं जितनी ज़रूरत हो ...
बहुत सुन्दर भावों में समेट दी है ज़िंदगी ...
ज़िंदगी
गुलाब का पौधा है
जिसकी हर शाखा
काँटों से भरी हुई है
फिर भी
एक गुलाब की खुशबू
हर टहनी में बसी हुयी है ...
जिन्दगी का एक शब्द कैनवास/कोलाज दिखाया है आपने
ReplyDeleteज़िन्दगी की परिभाषा गढ दी है सुन्दर बिम्ब प्रयोग के साथ्…………बहुत अच्छा लिखा है।
ReplyDeleteसच में यह ज़िन्दगी बुरका ही तो है... ज़िन्दगी को बहुत ट्रांस्पैरेंसी से दिखाया है आपने तो.... बहुत ही सुंदर कविता...
ReplyDelete.
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.
आपकी तरह...
jindagi ke bhinn rupon ko kavi hriday ne sundar abhivyakti di hai!
ReplyDeleteआपकी नज़र की बारीकियों में एक संवेदनशील हृदय नज़र आ रहा है ।
ReplyDeleteसुन्दर प्रस्तुति ।
क्या बात है..
ReplyDeleteसच है शिखाजी,
ReplyDeleteजिन्दगी एक बुर्के से कम नहीं है।
"जिन्दगी में हम भी बस
ReplyDeleteउतना ही प्रयास करते हैं
जितनी जरुरत है"
सुन्दर रचना.
एक सुस्पष्ठ सा नज़रिया जिंदगी को देखने का!!
ReplyDeleteसार्थक काव्य!!
तेवर तो वहीं है जो एक संवेदनशील और जिम्मेदार लेखिका का होता है।
ReplyDeleteरचना काफी गंभीर है... कई सुगबुगाते सवाल छोड़ती है।
शिखा जी! क्या कमाल का ऑब्ज़र्वेशन है... दुनिया को देखने की एक नई नज़र या दुनिया की एक नई परिभाषा! बुर्क़ा या हिजाब छिपा देता है ज़िंदगी के कई रहस्य, या फिर चूसनी या पैसिफ़ायर, संतोष की चूसनी मुँह में डाले इंसान ज़िंदगी की तमाम मुश्किलें झेल जाता है... और फिर वक़्त का हत्था पकड़े अपने अप्ने हिस्से का लम्हा जीते लोग.
ReplyDeleteआख़िर में गुरु गुलज़ार साहब की बातः
ज़िंदगी फूलों की नहीं
फूलों की तरह महँकी रहे.
bhavuk karane vale vichaar. badhai....
ReplyDeleteआपकी यह रचना कल के ( 11-12-2010 ) चर्चा मंच पर है .. कृपया अपनी अमूल्य राय से अवगत कराएँ ...
ReplyDeletehttp://charchamanch.uchcharan.com
.
वास्तव में ही जीवन ऐसा ही है. यथार्थ.
ReplyDeleteजिंदगी को बड़ी कुशलता से परिभाषित कर दिया है..
ReplyDeleteसुन्दर अभिव्यक्ति
बहुत सुंदर लगी आप की यह कविता, एक सवाल छोडती हुयी.... जो अकसर हम सब सोचते हे, आखिर यह जिन्दगी हे क्या?
ReplyDeleteधन्यवाद
JEEWAN PAR AAPKEE LEKHNI KHOOB
ReplyDeleteCHALEE HAI ! KAVITA KAA EK -EK
SHABD PADH KAR BAHUT ACHCHHA LAGA
HAI . BADHAAEE AUR SHUBH KAMNA .
शिखा जी आज सिर्फ एक शब्द .. लाजबाब .......
ReplyDeleteबहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
ReplyDeleteविचार-मानवाधिकार, मस्तिष्क और शांति पुरस्कार
बहुत ही अच्छी कविताएँ हैं. जीवन दर्शन समाये हुए अपने में.
ReplyDeleteगति पकड़ने पर
ReplyDeleteतो थाम लेती है दोनों हाथों से.
थोडा स्थिर होते ही
फिर छोड़ देती है पकड़न
जिन्दगी की यही रीत है ..
बेहतरीन दृश्य दिखाया आपने जीवन दर्शन के साथ
जिंदगी एक बुर्का ही तो है ...
ReplyDeleteउत्सुकता , रहस्य लिए क्या छिपा है जाने इसमें....
खाली बोतल चूसने की तरह जिन्दगी यूँ ही खाली जीना ....गज़ब
जितनी जरुरत है मौजूदा वक़्त की ...नहीं ...लोंग कहाँ इतनी ही गुजरिश करते हैं ...सात पीढ़ियों तक की सोच लेते हैं ...यक्ष का आखिरी प्रश्न याद होगा ना !
शानदार !
पर्तों के अन्दर पता नहीं क्या क्या छिपा रहता है, जो व्यक्त है वह सत्य है।
ReplyDeleteजीवन के आस पास घट रही छोटी छोटी बातों का एहसास ही कविता है .बुरका, ट्रेन के हिचकोले और बच्चे की चुसनी तो हर किसी को नजर नहीं आती है , लेकिन हर चीज में छिपी संवेदनशीलता को शब्द देना ही काव्य कला है .मैं शिखाजी को बहुत बधाई देता हूँ , इतनी भावुक सी रचनाओं के लिए और उतने ही सुन्दर नाम वाले ब्लॉग "स्पंदन" के लिए .
ReplyDeleteअपने इस कविता में भारी-भारीकम कथ्य को नहीं उठाते हुए भी अपने काव्यलोक की यात्रा कराते हुए कुछ ऐसा अवश्य कह गई हैं, जिसे नया न कहते हुए भी हल्का नहीं कहा जा सकता। बिम्ब तो ऐसे हैं जिसे देखकर पढकर ऐसा लगता है कि कह तो ठीक ही रही है, पहले मुझे क्यों नहीं सूझा। ज़िन्दगी की जो कशमकश है, आवाजाही है, उसके अनेक मार्मिक शब्दचित्र इस कविता में है । इस कविता में भाषा की सादगी, सफाई, प्रसंगानुकूल शब्दों का खूबसूरत चयन, जिनमें सटीक शब्दो का प्राचुर्य है। कविता की भाषा सीधे-सीधे जीवन से उठाए गए शब्दों और व्यंजक मुहावरे से निर्मित हैं।
ReplyDeleteतीनों ही शब्द चित्र अच्छे हैं, बधाई।
ReplyDeleteवाह... जोंदगी के हर मोड़, हर सफ़र, हर हरकत को कितने अच्छे से बयान कर दिया आपने...
ReplyDeleteमुझे भी ज़िंदगी बुरखे सी लगने लगी..
बहुत सुन्दर उपमाओं से परिभाषित किया है आपने जिंदगी को !
ReplyDeleteशिखा जी,
ReplyDeleteआपने ज़िन्दगी को बड़ी सूक्ष्मता से देखा मगर आपकी कविता ने हमें उन्हीं बारीकियों को स्पर्श करती हुई जिंदगी की गहन संवेदना को दिखा दिया !
आपकी लेखनी की यही तो विशेषता है !
आभार के साथ ,
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ
बहुत सुन्दर
ReplyDeleteबहुत ही अच्छा.....मेरा ब्लागः-"काव्य-कल्पना" at http://satyamshivam95.blogspot.com/ ....आप आये और मेरा मार्गदर्शन करे...धन्यवाद
ReplyDeleteवाह वाह ....शिखा जी ......जिन्दगी की तस्वीर बखूबी बयां की है आपने......
ReplyDeleteज़िन्दगी के कुछ रूप बहुत प्रभावशाली तरीके से पेश किए हैं शिखा जी.
ReplyDeletewah....shikha ji...kya khoob nazar se dekha hai zindagi ko...bohot hi khoobsurat andaaz hai
ReplyDeleteजिन्दगी में हम भी बस
ReplyDeleteउतना ही प्रयास करते हैं
जितनी जरुरत है
उस मौजूदा वक़्त की.
bilkul sahi kaha
बहुत सुंदर लिखा है ! ज़िन्दगी यही है एक लोल्य्पोप की तरह ! मेरे ब्लोग पर भी आएं व फ़ोलो करें !
ReplyDeleteबहुत बारीकी से और अद्भुत बिम्बो से सजाया है अपने स्पंदन को. सच को उकेर कर सुंदर रूप दिया है रचना को. प्रशंसनीय प्रयास.
ReplyDeleteज़िंदगी तेरे रूप अनेक
ReplyDeleteएक से बढ़कर एक
अच्छी तस्वीर उतारी है आपने।
शुक्रिया।
बहुत ही अच्छा.....लाजबाब.
ReplyDeleteबहुत दिनो बाद आपके ब्लोग पर आना हुआ, नये कलेवर के साथ लाजवाब रचना बहुत अच्छी लगी ।
ReplyDeleteशिखा जी
ReplyDeleteइतनी सुन्दर पंक्तिया अलग अलग आयाम लिए .. टिप्पणियों का अर्ध शतक ..पूरा a
....थोडा स्थिर होते ही फिर छोड़ देती है पकड़न
ReplyDeleteजिन्दगी में हम भी बस उतना ही प्रयास करते हैं जितनी जरुरत है उस मौजूदा वक़्त की।
शुरू से आखिर तक परफेक्ट। भावों को शब्दों में बेहद सजीव प्रस्तुत किया है आपने।
zindgi ek anjana safar hai hi...
ReplyDeletezindgi ek atript pyas hai......
bahut sunder bhavchitran!
जिंदगी के रास्ते यूँ ही हिचकोलेन लेते रहते हैं ... अलग अलग रूप में बदलते रहते हैं ... अपने मायने बदलते रहते हैं ... बहुत ड्डोर की बात लिखी है इस सफ़र में आपने ...
ReplyDeleteजिन्दगी के दर्शन को जितनी सहज तरीके से व्यक्त किया है , जो हम देखते हैं उसके साधारण से रूप ka गहन चित्रण और उसके गर्भ में छुपे पर्याय को समझ कर लग रहा है कि जिन्दगी के लिए कितना जरूरी है ? बहुत लाजवाब रचना.
ReplyDeleteजिन्दगी में हम भी बस
ReplyDeleteउतना ही प्रयास करते हैं
जितनी जरुरत है
उस मौजूदा वक़्त की
sahi kaha shikha ji, bas aise hin beet jati hai zindgi...sundar prastuti, shubhkaamnaayen.
आदरणीय शिखा जी
ReplyDeleteआपका ब्लॉग बहुत पसंद आया है ! वास्तव में
चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना कल मंगलवार 14 -12 -2010
ReplyDeleteको ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..
http://charchamanch.uchcharan.com/
ज़िंदगी की सबसे अच्छी बात ये है कि य़े चलती रहती है.....और शायद सबसे बुरी बात भी यही है....behtreen abhivyakti...khoobsoorat!!!
ReplyDeleteज़िन्दगी की अनगिनत परिभाषाओं मे एक और नई परिभाषा की वृद्धि और ज़िन्दगी के अद्भुत चित्र आपकी कलम से साकार हुए ।
ReplyDeleteबहुत सुन्दर पोस्ट है। बधाई।
ReplyDeleteबहुत अच्छा अंदाज़ रहा अभिव्यक्ति प्रदर्शन का ...शुभकामनायें शिखा !
ReplyDeleteजिंदगी के विभिन्न रूपों का बहुत शिद्दत से चित्रण किया है...बहुत सुन्दर प्रस्तुति
ReplyDeletenice poem,
ReplyDeletelovely blog.
जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालती एक बेहतरीन प्रस्तुति.
ReplyDeleteजिंदगी को स्पर्श करती हुई जिंदगी...सार्थक कविता.
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ReplyDelete@Thakur M.Islam Vinay आपकी टिपण्णी हटा रही हूँ कृपया अपने ब्लॉग और धर्म का प्रचार आप अपने ही ब्लॉग पर करें.
ReplyDeleteआंच पर आपकी कविता की समीक्षा पढ़ यहाँ तक पहुँची हूँ ...और पढ़कर यही लगा रहा है कि समीक्षा में जो भी कहा गया है,एक भी शब्द अतिशयोक्ति नहीं है..
ReplyDeleteअब अलग से प्रशंशा को शब्द कहाँ से लाऊं,वहां उधृत बातों को शब्दशः मेरे भी समझे जायं.
सचमुच ,मन मोह लिया आपकी इस रचना ने...
शिखा जी, आपने इस कविता में जैसे जिंदगी की जीवंतता को चुरा सा लिया है। सचमुच दिल को छू गयी। बहुत बहुत बधाई।
ReplyDelete---------
प्रेत साधने वाले।
रेसट्रेक मेमोरी रखना चाहेंगे क्या?
आपकी इस रचना को पढ़ कर
ReplyDeleteअपनी एक गजल का मतला
याद आ गया।
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सदा इल्म की सरपरस्ती में चलिए।
हथेली की अपनी इबारत बदलिए॥
सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी
sab kuchh sahi hai..........aur pathniya bhi.......
ReplyDeletelekin ye sahi nahi
ki ham utna hi paryas karte hain
jitni ki jarurat hai
agar aisa hota to kya baat thi......:)