मन के किसी कोने में झिलमिलाते हैं
सुबह होते ही वे पल ,
कहीं खो से जाते हैं
कभी लिहाफ के अन्दर ,
कभी बाजू के तकिये पर
कभी चादर की सिलवट पर
वो पल सिकुड़े मिलते हैं.
भर अंजुली में उनको ,
रख देती हूँ सिरहाने की दराजों में
कल जो न समेट पाई तो ,
निकाल इन्हें ही तक लूंगी
बड़ी आशाओं से जब उनको
जाती हूँ निकालने
उस बंद दराज में मेरे सब पल
मुरझाये मिलते हैं .
सहलाती हूँ वे पल ,
काश पा हथेली की गर्माहट.
जीवन पा सकें या
शायद फिर से खिल जाये.
पर पेड से गिरे पत्ते ,
कहाँ फिर पेड पर लगते.
वो सूखे लम्हे भी
यहाँ वहां बिखरे ही दिखते हैं.
पलों की यही कहानी है …………बहुत सुन्दर भावो को संजोया है।
ReplyDeleteबिखरे पलों को समेटती सुन्दर अभिव्यक्ति!
ReplyDeleteVah Vah, behatarin kavita
ReplyDeleteabhar
सुन्दर भाव!
ReplyDeleteबहुत कोमल अहसास ।
ReplyDeleteye palon ko ahsaas ke roop men sahej liya aur phir se jeene chale to phir ve simat chuke the apane men. bahut sundar abhivyakti.
ReplyDeletehameshaa ki tarah pyari kavitaa. chitr ne aur adhik prabhavee bana diyaa.
ReplyDeleteपेड से गिरे पत्ते ,
ReplyDeleteकहाँ फिर पेड पर लगते.
वो सूखे लम्हे भी
यहाँ वहां बिखरे ही दिखते हैं।
वाह!!!....गहरे भाव लिए जीवन के अहसासों से परीपूर्ण पल-पल की कहानी को ब्यान करती सुंदर अभिवयक्ति
सहलाती हूँ वे पल ,
ReplyDeleteकाश पा हथेली की गर्माहट.
जीवन पा सकें या
शायद फिर से खिल जाये.
पर पेड से गिरे पत्ते ,
कहाँ फिर पेड पर लगते.
वो सूखे लम्हे भी
यहाँ वहां बिखरे ही दिखते हैं.
bahut hi sunder hain lamhe yadon ke hi sada jivit rahte hain
bhavon ki gahrai hai .
sunder hai
rachana
yadain kuch aisi hi hoti hain!
ReplyDeletesudar prastuti! shandar bhav!
badhai kabule!
पल पल बदलते अहसास , उनको समेटने की पुरजोर कोशिश . भावनाओ को शब्दों में पिरो लेना वो भी इतनी कोमलता से . अति सुँदर .
ReplyDeleteसमय को स्मृतियों में संजोने के प्रयास में लगे हम सब।
ReplyDeleteगहरी संवेदना/अहसास सूक्ष्म अनुभूति का प्रगटन -खूबसूरत!
ReplyDeleteगुज़रा हुआ ज़माना ...आता नहीं दोबारा ....
ReplyDeleteस्मृतियाँ ही समेटने की कोशिश कर सकते हैं हम सब ....
सुंदर कोमल भाव मन के ...
सहलाती हूँ वे पल ,
ReplyDeleteकाश पा हथेली की गर्माहट.
जीवन पा सकें या
शायद फिर से खिल जाये.
पर पेड से गिरे पत्ते ,
कहाँ फिर पेड पर लगते.
वो सूखे लम्हे भी
यहाँ वहां बिखरे ही दिखते हैं.
yahi to khasiyat hai palon mein
मन के कोने में झिलमिलाती यादें ..सहेजने की कोशिश ...और फिर उसे जीवन्तता प्रदान करने का प्रयास ... पर जो पल बीत जाता है बस बीत जाता है .. बहुत कोमल भावों को संजो कर लिखी है यह रचना ... सुन्दर प्रस्तुति
ReplyDeleteपर पेड से गिरे पत्ते ,
ReplyDeleteकहाँ फिर पेड पर लगते.
वो सूखे लम्हे भी
यहाँ वहां बिखरे ही दिखते हैं.
....कितने कोमल अहसास...बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति..
पर पेड से गिरे पत्ते ,
ReplyDeleteकहाँ फिर पेड पर लगते.
वो सूखे लम्हे भी
यहाँ वहां बिखरे ही दिखते हैं.
बहुत गहन बात, हकीकत यही है.
रामराम.
अहसासों की अनुभूतियों को समेटे सुन्दर भावप्रणव रचना!
ReplyDeleteशिखा जी, बीते हुए लमहों की कसक सबको उसी तरह से प्रभावित कर जाती हैं जैसे आपको । हमें इन लमहों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए जो कभी -कभी मन को असीम सुख प्रदान करने में अपनी अहम भूमिका का निर्वाह कर जाते हैं । बहुत ही सुंदर भावों के मिश्रण से लिखी गयी कविता हृदयस्पर्शी लगी । धन्यवाद । समय इजाजत दे तो मेरे पोस्ट पर भी आकर मेरा मनोबल बढाएं ।
ReplyDeleteवे पल दराज में रखने के लिए नहीं होते, उन्हें जीना पडता है भरपूर और बन करना पडता है ह्रदय के दराज में, पलकों के दराज में...
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर और कोमल नज़्म है शिखा जी!!आभार आपका!
सुबह होते ही वे पल ,
ReplyDeleteकहीं खो से जाते हैं
कभी लिहाफ के अन्दर ,
कभी बाजू के तकिये पर
कभी चादर की सिलवट पर
वो पल सिकुड़े मिलते हैं.
बहुत बारीक-सी कहन...मन को छूने वाली...
हवा से उलझे कभी सायों से लड़े हैं लोग
ReplyDeleteबहुत अज़ीम हैं यारों बहुत बड़े हैं लोग
इसी तरह से बुझे जिस्म जल उठें शायद
सुलगती रेत पे ये सोच कर पड़े हैं लोग
Bahut bhavuk kar gayee ye rachana....
ReplyDeleteशिखा जी,सब कुछ सोच पर निर्भर करता है.
ReplyDeleteआप अच्छी कविता करतीं है,आपको भी मानना पड़ेगा अब.
लगता है मेरा ब्लॉग अब भूली बिसरी याद
का ही कोई खोया पल है.
जो डाल से छूटा
ReplyDeleteसाथ उसका छूटा
अब तो बस यादें ही शेष हैं, हम उन्हें ही समेट लें अपने मन में, दिल में।
अच्छी रचना। आभार।
ReplyDeleteबहुत सुंदर अभिव्यक्ति...
ReplyDeletebahut achchi rachnaa...!!! magar
ReplyDeletekuchh pal aise bhi hote hain
jo kabhi murjhaaate nahin,
chaahe rakh do daraazon men
yaa ki potli banaa kahin kone men
wo kabhi kumhlaate nahin...
सुन्दर है, लेकिन इतनी उदासी??
ReplyDeleteबहुत सुन्दर प्रस्तुति...वाह!
ReplyDeleteसुन्दर कविता शिखा जी बहुत -बहुत बधाई और शुभकामनाएं
ReplyDeleteसुन्दर कविता शिखा जी बहुत -बहुत बधाई और शुभकामनाएं
ReplyDeleteकभी बाजू के तकिये पर
ReplyDeleteकभी चादर की सिलवट पर
वो पल सिकुड़े मिलते हैं
ये पंक्तियाँ मुझे बहुत पसंद आई ...
पेड से टूटे पत्ते कहाँ जुड़ते हैं दुबारा ...ऐसी ही बिखरी पड़ी सुखी यादें !
ReplyDeleteवाह ...बेहतरीन!
संवेदनशील ...भावपूर्ण रचना!!
ReplyDeleteसंवेदनशील ...भावपूर्ण रचना!!
ReplyDeleteबढिया है। मेहनती कविता!
ReplyDeleteकाश पलों को फ़्रिज में रखने का जुगाड़ होता। वे मुरझाने से बच जाते।
यही पल अपनी सम्पति है संभल कर रखें सुंदर भावपूर्ण रचना
ReplyDeleteबीते पल मुरझा ना जाए इन्हें डायरी के पन्नो में सहेज ले यकीन मानिए जब भी पन्ने पलटेंगी अपनी खुशबू और रंग से तारो ताजा कर देंगे
ReplyDeleteबहुत सुन्दर रचना. maple के पत्ते बड़े खूबसूरत लग रहे हैं.
ReplyDeleteबीते हुए पल कब अपने हुए हैं? लेकिन उनका अहसास हमेशा जीवित रहता है। बहुत अच्छी रचना, बधाई।
ReplyDeleteवाह... कितने सुन्दर,मनमोहक ढंग से भावों को अभिव्यक्त किया है आपने...
ReplyDeleteसच है...पेड़ से झड गए पत्ते फिर दुबारा कहाँ लहक पाते हैं,चाहे कितनी भी प्राण वायु उनमे फूंकी जाय.
आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 22 -09 - 2011 को यहाँ भी है
ReplyDelete...नयी पुरानी हलचल में ...हर किसी के लिए ही दुआ मैं करूँ
बेहतरीन प्रस्तुति,आभार.
ReplyDeleteniceeeeeeeeee kavita
ReplyDeleteवाह जी बहुत सुंदर.
ReplyDeleteओहो :) :)
ReplyDeleteबड़ी सुन्दर कविता है दीदी :)
ऐसे पलों में पूरा जीवन सिमिट के आ जाता है ... कमाल के भाव छिपे हैं इन नाजुक पलों में ..
ReplyDelete''जो बीत गया वो पल लौट कर नहीं आता''
ReplyDeleteसुंदर तरीके से इस सच्चाई को बयां किया आपने।
शुभकामनाएं............
bahut hi sunder prastuti...
ReplyDeleteबहुत उम्दा अभिव्यक्ति....वाह!!
ReplyDeletebhut hi khubsura shabdo ka istemal kiya he aap ne
ReplyDeleteआपको मेरी तरफ से नवरात्री की ढेरों शुभकामनाएं.. माता सबों को खुश और आबाद रखे..
ReplyDeleteजय माता दी..
बहुत अच्छा।बिखरे पलों को समेटना
ReplyDeleteकितना मुश्किल होता है।
सहलाती हूँ वे पल ,
ReplyDeleteकाश पा हथेली की गर्माहट.
जीवन पा सकें या
शायद फिर से खिल जाये.
पर पेड से गिरे पत्ते ,
कहाँ फिर पेड पर लगते.
वो सूखे लम्हे भी
यहाँ वहां बिखरे ही दिखते हैं.
..गिरकर फिर न उससे जुड़ पाना यही नियति है ..
बहुत ही बढ़िया भावपूर्ण रचना ....