Tuesday, 20 September 2011

कुछ पल.


रात के साये में कुछ पल
मन के किसी कोने में झिलमिलाते हैं
सुबह होते ही वे पल ,
कहीं खो से जाते हैं 
कभी लिहाफ के अन्दर ,
कभी बाजू के तकिये पर
कभी चादर की सिलवट पर 
वो पल सिकुड़े मिलते हैं.
भर अंजुली में उनको ,
रख देती हूँ सिरहाने की दराजों में 
कल जो न समेट पाई तो ,
निकाल इन्हें ही तक लूंगी 
बड़ी आशाओं से जब उनको 
जाती हूँ निकालने 
उस बंद दराज में मेरे सब पल 
मुरझाये मिलते हैं .

सहलाती हूँ वे पल ,
काश पा हथेली की गर्माहट.
जीवन पा सकें या 
शायद  फिर से खिल जाये.
पर पेड  से गिरे पत्ते ,
कहाँ फिर पेड पर लगते.
वो सूखे लम्हे भी 
यहाँ वहां बिखरे ही दिखते हैं.

56 comments:

  1. पलों की यही कहानी है …………बहुत सुन्दर भावो को संजोया है।

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  2. बिखरे पलों को समेटती सुन्दर अभिव्यक्ति!

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  3. बहुत कोमल अहसास ।

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  4. ye palon ko ahsaas ke roop men sahej liya aur phir se jeene chale to phir ve simat chuke the apane men. bahut sundar abhivyakti.

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  5. hameshaa ki tarah pyari kavitaa. chitr ne aur adhik prabhavee bana diyaa.

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  6. पेड से गिरे पत्ते ,
    कहाँ फिर पेड पर लगते.
    वो सूखे लम्हे भी
    यहाँ वहां बिखरे ही दिखते हैं।
    वाह!!!....गहरे भाव लिए जीवन के अहसासों से परीपूर्ण पल-पल की कहानी को ब्यान करती सुंदर अभिवयक्ति

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  7. सहलाती हूँ वे पल ,
    काश पा हथेली की गर्माहट.
    जीवन पा सकें या
    शायद फिर से खिल जाये.
    पर पेड से गिरे पत्ते ,
    कहाँ फिर पेड पर लगते.
    वो सूखे लम्हे भी
    यहाँ वहां बिखरे ही दिखते हैं.
    bahut hi sunder hain lamhe yadon ke hi sada jivit rahte hain
    bhavon ki gahrai hai .
    sunder hai
    rachana

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  8. yadain kuch aisi hi hoti hain!
    sudar prastuti! shandar bhav!

    badhai kabule!

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  9. पल पल बदलते अहसास , उनको समेटने की पुरजोर कोशिश . भावनाओ को शब्दों में पिरो लेना वो भी इतनी कोमलता से . अति सुँदर .

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  10. समय को स्मृतियों में संजोने के प्रयास में लगे हम सब।

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  11. गहरी संवेदना/अहसास सूक्ष्म अनुभूति का प्रगटन -खूबसूरत!

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  12. गुज़रा हुआ ज़माना ...आता नहीं दोबारा ....
    स्मृतियाँ ही समेटने की कोशिश कर सकते हैं हम सब ....
    सुंदर कोमल भाव मन के ...

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  13. सहलाती हूँ वे पल ,
    काश पा हथेली की गर्माहट.
    जीवन पा सकें या
    शायद फिर से खिल जाये.
    पर पेड से गिरे पत्ते ,
    कहाँ फिर पेड पर लगते.
    वो सूखे लम्हे भी
    यहाँ वहां बिखरे ही दिखते हैं.
    yahi to khasiyat hai palon mein

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  14. मन के कोने में झिलमिलाती यादें ..सहेजने की कोशिश ...और फिर उसे जीवन्तता प्रदान करने का प्रयास ... पर जो पल बीत जाता है बस बीत जाता है .. बहुत कोमल भावों को संजो कर लिखी है यह रचना ... सुन्दर प्रस्तुति

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  15. पर पेड से गिरे पत्ते ,
    कहाँ फिर पेड पर लगते.
    वो सूखे लम्हे भी
    यहाँ वहां बिखरे ही दिखते हैं.

    ....कितने कोमल अहसास...बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति..

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  16. पर पेड से गिरे पत्ते ,
    कहाँ फिर पेड पर लगते.
    वो सूखे लम्हे भी
    यहाँ वहां बिखरे ही दिखते हैं.

    बहुत गहन बात, हकीकत यही है.

    रामराम.

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  17. अहसासों की अनुभूतियों को समेटे सुन्दर भावप्रणव रचना!

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  18. शिखा जी, बीते हुए लमहों की कसक सबको उसी तरह से प्रभावित कर जाती हैं जैसे आपको । हमें इन लमहों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए जो कभी -कभी मन को असीम सुख प्रदान करने में अपनी अहम भूमिका का निर्वाह कर जाते हैं । बहुत ही सुंदर भावों के मिश्रण से लिखी गयी कविता हृदयस्पर्शी लगी । धन्यवाद । समय इजाजत दे तो मेरे पोस्ट पर भी आकर मेरा मनोबल बढाएं ।

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  19. वे पल दराज में रखने के लिए नहीं होते, उन्हें जीना पडता है भरपूर और बन करना पडता है ह्रदय के दराज में, पलकों के दराज में...
    बहुत ही सुन्दर और कोमल नज़्म है शिखा जी!!आभार आपका!

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  20. सुबह होते ही वे पल ,
    कहीं खो से जाते हैं
    कभी लिहाफ के अन्दर ,
    कभी बाजू के तकिये पर
    कभी चादर की सिलवट पर
    वो पल सिकुड़े मिलते हैं.


    बहुत बारीक-सी कहन...मन को छूने वाली...

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  21. हवा से उलझे कभी सायों से लड़े हैं लोग
    बहुत अज़ीम हैं यारों बहुत बड़े हैं लोग

    इसी तरह से बुझे जिस्म जल उठें शायद
    सुलगती रेत पे ये सोच कर पड़े हैं लोग

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  22. Bahut bhavuk kar gayee ye rachana....

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  23. शिखा जी,सब कुछ सोच पर निर्भर करता है.

    आप अच्छी कविता करतीं है,आपको भी मानना पड़ेगा अब.

    लगता है मेरा ब्लॉग अब भूली बिसरी याद
    का ही कोई खोया पल है.

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  24. जो डाल से छूटा
    साथ उसका छूटा
    अब तो बस यादें ही शेष हैं, हम उन्हें ही समेट लें अपने मन में, दिल में।

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  25. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति...

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  26. bahut achchi rachnaa...!!! magar

    kuchh pal aise bhi hote hain
    jo kabhi murjhaaate nahin,
    chaahe rakh do daraazon men
    yaa ki potli banaa kahin kone men
    wo kabhi kumhlaate nahin...

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  27. सुन्दर है, लेकिन इतनी उदासी??

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  28. सुन्दर कविता शिखा जी बहुत -बहुत बधाई और शुभकामनाएं

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  29. सुन्दर कविता शिखा जी बहुत -बहुत बधाई और शुभकामनाएं

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  30. कभी बाजू के तकिये पर
    कभी चादर की सिलवट पर
    वो पल सिकुड़े मिलते हैं

    ये पंक्तियाँ मुझे बहुत पसंद आई ...

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  31. पेड से टूटे पत्ते कहाँ जुड़ते हैं दुबारा ...ऐसी ही बिखरी पड़ी सुखी यादें !
    वाह ...बेहतरीन!

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  32. संवेदनशील ...भावपूर्ण रचना!!

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  33. संवेदनशील ...भावपूर्ण रचना!!

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  34. बढिया है। मेहनती कविता!
    काश पलों को फ़्रिज में रखने का जुगाड़ होता। वे मुरझाने से बच जाते।

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  35. यही पल अपनी सम्पति है संभल कर रखें सुंदर भावपूर्ण रचना

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  36. बीते पल मुरझा ना जाए इन्हें डायरी के पन्नो में सहेज ले यकीन मानिए जब भी पन्ने पलटेंगी अपनी खुशबू और रंग से तारो ताजा कर देंगे

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  37. बहुत सुन्दर रचना. maple के पत्ते बड़े खूबसूरत लग रहे हैं.

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  38. बीते ह‍ुए पल कब अपने हुए हैं? लेकिन उनका अहसास हमेशा जीवित रहता है। बहुत अच्‍छी रचना, बधाई।

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  39. वाह... कितने सुन्दर,मनमोहक ढंग से भावों को अभिव्यक्त किया है आपने...

    सच है...पेड़ से झड गए पत्ते फिर दुबारा कहाँ लहक पाते हैं,चाहे कितनी भी प्राण वायु उनमे फूंकी जाय.

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  40. बेहतरीन प्रस्तुति,आभार.

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  41. वाह जी बहुत सुंदर.

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  42. ओहो :) :)
    बड़ी सुन्दर कविता है दीदी :)

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  43. ऐसे पलों में पूरा जीवन सिमिट के आ जाता है ... कमाल के भाव छिपे हैं इन नाजुक पलों में ..

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  44. ''जो बीत गया वो पल लौट कर नहीं आता''
    सुंदर तरीके से इस सच्‍चाई को बयां किया आपने।
    शुभकामनाएं............

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  45. बहुत उम्दा अभिव्यक्ति....वाह!!

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  46. bhut hi khubsura shabdo ka istemal kiya he aap ne

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  47. आपको मेरी तरफ से नवरात्री की ढेरों शुभकामनाएं.. माता सबों को खुश और आबाद रखे..
    जय माता दी..

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  48. बहुत अच्छा।बिखरे पलों को समेटना
    कितना मुश्किल होता है।

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  49. सहलाती हूँ वे पल ,
    काश पा हथेली की गर्माहट.
    जीवन पा सकें या
    शायद फिर से खिल जाये.
    पर पेड से गिरे पत्ते ,
    कहाँ फिर पेड पर लगते.
    वो सूखे लम्हे भी
    यहाँ वहां बिखरे ही दिखते हैं.

    ..गिरकर फिर न उससे जुड़ पाना यही नियति है ..
    बहुत ही बढ़िया भावपूर्ण रचना ....

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