हथेली की रेखाओं में
कभी सीधी कभी आड़ी सी
पगडंडी पर लुढ़कती कभी
बगीचों में टहलती
बारिश बन बरसती
कभी धूप में तपती
नर्म ओस सी बिछती तो
कभी शूल बन चुभती
झरने सी झरती कभी
नदिया सी बहती रहती
मेज पे रखे प्याले से
कभी चाय सी छलकती.
ग़ज़ल सी कहती कभी
कभी गीतों पे थिरकती .
रातों के गहरे साये में
परछाई सी चलती
कोयले सी जलती कभी
तो कभी राख बन उड़ती
हर पल निगाहों पे पर्दा डाले
धुआं धुआं सी जिन्दगी.
हथेली की रेखाओं में
ReplyDeleteकभी सीधी कभी आड़ी सी
हर पल ये आगे पीछे ... ऊपर नीचे होती धुंआ-धुंआ सी जिन्दगी ... वाह बहुत खूब ।
बहुत खूब ..बहुत सही कहा आपने ...
ReplyDeleteबहुत खूब ...
ReplyDeleteVery picturesque and tellingly graphic depiction of the ephemeral nature of life...
ReplyDeleteवाह! कितना सही कहा धुआँ धुआँ सी ज़िंदगी।
ReplyDeleteबेहतरीन कविता।
सादर
धुआं धुआं सी जिन्दगी.... सबकुछ धुंआ धुंआ ... कुछ नहीं दिखता यहाँ ...
ReplyDeleteरातों के गहरे साये में परछाई सी चलती
रातों के गहरे साये में परछाई सी चलती कोयले सी जलती कभी तो कभी राख बन उड़ती हर पल निगाहों पे पर्दा डालेधुआं धुआं सी जिन्दगी.
ReplyDelete.....सुंदर अभिव्यक्ति...बेहतरीन पंक्तियाँ
बेहतरीन सम्वेदनशील रचना के लिए बधाई
संजय भास्कर
आदत...मुस्कुराने की
http://sanjaybhaskar.blogspot.com
हर पल निगाहों पे पर्दा डाले
ReplyDeleteधुआं धुआं सी जिन्दगी.... jindgi ki behtreen prstuti.....
जिंदगी की सच्चाई तो यही है ....
ReplyDeleteशुभकामनायें आपको !
जिंदगी के अनेक रूप दर्शा दिए रचना में । बहुत सुन्दर ।
ReplyDeleteऐसी ही तो है... ज़िंदगी!
ReplyDeletezindagi hain ek
ReplyDeletepar iske rup hain anek
zindagi ke baare main
badi khubsurati se varnan
kiya hain.
हर पल निगाहों पे पर्दा डाले
ReplyDeleteधुआं धुआं सी जिन्दगी.
हाँ शिखा जी
ऐसी ही है ज़िन्दगी ...
कभी निगाहों पे पर्दा डालती है ,
कभी बंद आँखों से सब दिखाती है .....
ऐसी ही है ज़िन्दगी ...
बहुत खूबसूरत रचना ...
Wah! Kya kalpana kee hai zindagee kee!
ReplyDelete"बगीचों में टहलती/ बारिश बन बरसती/ कभी धूप में तपती/ नर्म ओस सी बिछती तो/ कभी शूल बन चुभती/ कभी झरने सी झरती/ कभी नदिया सी बहती रहती..." मुक्त छन्द कविता में यह कशिश लिए भावनाओं की तरन्नुम बहुत कम ही मिलती है । बहुत सुन्दर ! प्रेम प्रकृति नियति ...सब के संकेतों को सुनती गुनती बूझती, कभी फिक्रमंद तो कभी बेपरवाह, अपनी सीमाओं का गहन बोध होने की सच्चाई में भी निस्सीमता के पर्वपल जीती ज़िन्दगी के विभिन्न आयामों का अतिशय कुशल उद्घाटन हुआ है कविता में ! अभिनन्दन शिखा जी !
ReplyDeleteकल धुँआ बन उड़ गया, कल धुंध सा अस्पष्ट है।
ReplyDeleteकविता में जीवन के तमाम सोपानो के दर्शन हुए , असंख्य पर्श्नो से हमने मुह चुराया , इस आपाधापी वाले जीवन से सुख के कुछ पल चुराने को ही जीवन दर्शन का मूल मानते है हम . वैसे ये सूफियाना मूड काहे है जी ? कविता तो निर्गुण ब्रम्ह जैसी लगी .
ReplyDeleteपता नहीं गूगल और ब्लॉग आजकल क्या खेल खेल रहे हैं.कुछ टिप्पणियाँ मेरे मैल में तो आई हैं पर ब्लॉग पर नहीं प्रकाशित हुईं. उन्हें मैं यहाँ पोस्ट कर रही हूँ.
ReplyDeletePallavi has left a new comment on your post "धुंआ धुंआ जिंदगी...":
इसी का नाम ज़िंदगी है....
Arvind Mishra has left a new comment on your post "धुंआ धुंआ जिंदगी...":
ReplyDeleteएक पूरी ज़िंदगी के कितने ही शेड्स मगर फिर भी शो चालू आहे ....यही ज़िंदगी है -बढियां भावाभिव्यक्ति
वन्दना has left a new comment on your post "धुंआ धुंआ जिंदगी...":
ReplyDeleteबस यही तो है ज़िन्दगी…………धुंआ कब हवा मे विलीन हो जाता है पता ही नही चलता।
वाह! बहुत सुन्दर प्रस्तुति है आपकी.
ReplyDeleteपढकर धुँआ धुँआ सा हो गया है मन.
धुआं धुआं सी जिन्दगी.
ReplyDeletebahot sunder......
जीवन के निष्कर्ष में भले ही नैराश्य का पलड़ा भारी हो, लेकिन उसमें तमाम छोटी-बड़ी सुखद और आत्मीय स्मृतियाँ अपना घर बनाए होती हैं।
ReplyDeleteज़िन्दगी की यही तो खासियत है कि यह कई रूपों में कई रंगों में बिखरी रहती है हमारे आसपास और हम उसे सहेजते समेटते रहते हैं उम्र भर।
ReplyDeleteHi..
ReplyDeleteJeevan darshan main 'SPANDAN' ka..
Ek alag hai rang..
Kavita kahne ka bhi tera..
Dekha alag hai dhang..
Kabhi barf main thithure kavita..
Kabhi dhoop main pighle kavita..
Kabhi pawan ke sang dole..
Kabhi maun bhi rahkar bole..
Kabhi pyaar ke ras main gholi..
Kabhi rang sang khele holi..
Kabhi shabd se deep jalaye..
Kabhi laut sajan ghar aaye..
Kabhi ban gaye prem ke geet..
Kabhi gazal se liye dil jeet..
Kabhi door ke kissee laaye..
Kabhi yatra vrtant sunaye..
Kabhi janm din yahan manaye..
Kabhi sang sabke muskaaye..
Yun hi kavita, geet, nazm tum..
Likhna aise hi aalekh..
SPANDAN se har lena, sabke..
Man main jiske, jo chhal dwesh..
Shubhkamnaon sahit..
Deepak Shukla..
ज़िंदगी के इतने सारे रंग ...
ReplyDeleteज़िंदगी
कभी दिन का
शोर है तो
कभी
छलकता जाम
कभी
प्रखर ताप है
तो कभी
सिन्दूरी शाम .
ये धुंआं धुंआं सी ज़िंदगी गहन अभिव्यक्ति को कहती है ..सुन्दर रचना
कविता में दृश्य, दृश्य में कविता..
ReplyDeleteबहुत बढ़िया प्रस्तुति
ReplyDeleteGyan Darpan
Matrimonial Site
धुंआ-धुंआ सी .. खूबसूरती से लिखा है आपने.अच्छी लगी.
ReplyDeleteकितने कितने मोडों से गुज़ारा है आपने ज़िंदगी को.. या फिर कितने-कितने मोडों से गुजारी है ज़िंदगी!! बहुत खूब!!
ReplyDeleteहर पल निगाहों पर पर्दा डाले ...
ReplyDeleteधुआं - धुआं सी जिंदगी ...
हथेली की रेखाओं पर नाच रही है जिंदगी !
बहुत सुन्दर !
धुंआ धुंआ सी जिन्दगी? या खिली खिली सी जिन्दगी।
ReplyDeleteजिंदगी के कई रूप होते हैं... हम जिस रूप में इसे जीते हैं इसका वही रूप हमें दिखता है...
ReplyDeleteसुंदर प्रस्तुति।
शब्दों को बहुत चुन के और भावों को खुलके सप्रेषित करती हुई रचना ।
ReplyDeleteसुन्दर प्रस्तुति
ReplyDeleteसंगीता स्वरुप ( गीत ) has left a new comment on your post "धुंआ धुंआ जिंदगी...":
ReplyDeleteज़िंदगी के इतने सारे रंग ...
ज़िंदगी
कभी दिन का
शोर है तो
कभी
छलकता जाम
कभी
प्रखर ताप है
तो कभी
सिन्दूरी शाम .
ये धुंआं धुंआं सी ज़िंदगी गहन अभिव्यक्ति को कहती है ..सुन्दर रचना
धुन्धल्की जिन्दगी से निकले कुछ खुबसूरत शब्द दिख रहे हैं..........:)
ReplyDeleteप्यारी सी रचना....!!
बहुत सुन्दर कविता |
ReplyDeleteबहुत सुन्दर कविता |
ReplyDeleteशिखा जी मुझे क्षमा करें मगर मुझे यह कविता कम अच्छी लगी ...बस लगा कि ये आपकी लिखी नहीं है ..बस ऐसे ही लिख दिया आपने !!!
ReplyDeleteपुनः क्षमा प्रार्थी हूँ
सुन्दर प्रस्तुति ||
ReplyDeleteबधाई ||
dcgpthravikar.blogspot.com
और शायद इस धुंध में ही कही खो जाएगी अपनी जिन्दगी|
ReplyDeleteफुर्सत में कभी इस ब्लॉग पर भी तशरीफ़ ले आइयेगा.. आप का मार्गदर्शन मेरे लिए महत्वपूर्ण है..|
पता है...
http://teraintajar.blogspot.com/
शिखा जी नमस्कार, बहुत सुन्दर मेरे ब्लाग पर आपका स्वागत है।
ReplyDeleteएकदम सही रेखांकन किया है.... बहुत बढ़िया रचना
ReplyDeleteहथेलियों की रेखाओं से अक्सर जीवन फिसल जाता है और धुंवा हो जाता है ... ये जीवन हमेशा उलझा रहता है इन रखाओं की तरह ... संजीदा रचना है ...
ReplyDeleteयही है जिंदगी...सुन्दर रचना...
ReplyDeleteकविता में आवश्यक Punctuation के अभाव में कविता दुरूह हो गयी है। "उसे रोको मत जाने दो" वाक्य अल्पविराम के अभाव में निरर्थक सिद्ध हो जाता है। अल्प विराम के प्रयोग से इसी वाक्य के दो विरुद्ध अर्थ निकलते हैं- "उसे रोको, मत जाने दो" और "उसे रोको मत, जाने दो।" इनकी महत्ता कविता में और बढ़ जाती है।
ReplyDeleteक्षमा-याचना के साथ आशा करता हूँ कि उक्त प्रतिक्रिया को आप अन्यथा नहीं लेंगी।
नर्म ओस सी बिछती तो
ReplyDeleteकभी शूल बन चुभती
झरने सी झरती कभी
नदिया सी बहती रहती
बस...
यही तो है जिन्दगी....!!
आह!!! वाह!!
ReplyDeleteधुंआ धुंआ जिंदगी...
-क्या बात है!!
बहुत खूब ।
ReplyDeleteजिंदगी के कितने रूप और हर रूप में लाजवाब ज़िन्दगी.
ReplyDeleteसही में :):):)
ReplyDeleteसंसार की हर शह का,
ReplyDeleteइतना ही फ़साना है,
इक धुंध से आना है,
इक धुंध में जाना है...
ये पोस्ट मेरे से कैसे छूट गई थी...
जय हिंद...
फिर पढ़ा -मन के अंतर्द्वंद्वों और गहन भावों को अभिव्यक्त करती लगी यह कविता
ReplyDeletebahuaayami zindagi ko bahut hi khoobsurti se chitrit kiya hai.sadar badhayee ke sath
ReplyDeleteदेर से पहुँचने का गम है. जो कुछ कहा जा सकता था दूसरों ने कह दिया. बहुत सुन्दर. कोच्ची से...
ReplyDeleteबहुत सुन्दर प्रस्तुति
ReplyDeleteसुन्दर प्रस्तुति |मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वगत है । कृपया निमंत्रण स्वीकार करें । धन्यवाद ।
ReplyDeletebahut sundar rachna, badhai.
ReplyDelete