क्रिसमस का समय है. बाजारों में ओवर टाइम हो रहा है और स्कूलों में छुट्टी है .तो जाहिर है की घर में भी हमारा ओवर टाइम होने लगा है.ऐसे में कुछ लिखने का मूड बने भी तो अचानक " भूख लगी है ........या .."तू स्टुपिड , नहीं तू स्टुपिड"की आवाजों में ख़याल यूँ गडमड हो जाते हैं जैसे मसालदानी के गिर जाने से सारे मसाले... अत: हमने भी सोचा चलो ख्यालों को भी थोड़ी देर पीछे वाली सीट दे दें .और आगे वाली सीट दे दें सांता को .क्या पता कोई सीक्रेट संता हमारे लिए भी कुछ उपहार ले ही आये.आप भी मनाइए क्रिसमस और फिर नया साल और झेल लीजिये ये रचना भी.
अपनी तो जिन्दगी का बस इतना सा फ़साना है
जिस धुंध से आये थे बस उससे गुज़र जाना है
क्यों बैठकर सोचूं और क्यों करूँ किसी से शिकवा
क्या लेकर हम आये थे , क्या लेकर हमें जाना है
इस जिन्दगी से बस इतनी सी गुजारिश है
दो लम्हे अता कर दे जिन्हें जीते चले जाना है.
रुख यूँ तो हवा का हरदम ही रहा तिरछा
दिशा अपनी बदल कर बस चलते ही जाना है.
अँधेरी जिंदगियों में यूँ जल ऐ 'शिखा' जैसे
कुछ तारीक़ निगाहों को रोशन कर जाना है
अपनी तो जिन्दगी का बस इतना सा फ़साना है
जिस धुंध से आये थे बस उससे गुज़र जाना है
क्यों बैठकर सोचूं और क्यों करूँ किसी से शिकवा
क्या लेकर हम आये थे , क्या लेकर हमें जाना है
इस जिन्दगी से बस इतनी सी गुजारिश है
दो लम्हे अता कर दे जिन्हें जीते चले जाना है.
रुख यूँ तो हवा का हरदम ही रहा तिरछा
दिशा अपनी बदल कर बस चलते ही जाना है.
अँधेरी जिंदगियों में यूँ जल ऐ 'शिखा' जैसे
कुछ तारीक़ निगाहों को रोशन कर जाना है
क्रिसमस तो है हीं, लेकिन बड़ी बात ये है की इतनी ओवर-इक्साइटेड समय में भी आप इतना खूबसूरत लिख लेतीं हैं..मैं तो हैंगओवर में ही रहता कुछ दिनों तक..
ReplyDeleteबाई द वे, हर लाईन पसंद आई...
अँधेरी जिंदगियों में यूँ जल ऐ 'शिखा' जैसे
कुछ तारीक़ निगाहों को रोशन कर जाना है
:) :)
इस जिन्दगी से बस इतनी सी गुजारिश है
ReplyDeleteदो लम्हे अता कर दे जिन्हें जीते चले जाना है.
...isse adhik ki chah bhi nahi, isse adhik kuch hai bhi nahi
great you r specilly blessd one keep writing maa saraswati aap ke saat hai good one
ReplyDeleteMerry Christmas to you and Pankaj, Vedant and Somya.
ReplyDeletePehle Christmas yaad aate hi Calcutta ki jagmagati raatein yaad aati thi, poora sheher jaise sone ki anek maalayein pehene aaj apni sundarta dikha raha ho sabko. Lekin aaj mera christmas us shaam ki taraf le jata hai jahan hum sab the. u might rememeber a party but i rememebr those days liek it was yesterday :)
Love
Soniya.
करते रहिये रोशन जहां को...बनते रहिये दीप शिखा ...शुभ कामना.
ReplyDeletesahi kaha bachchon ki chhuttiyan matlab apna kaam dugna .yahan bhi yahi haal hai .
ReplyDeletepr aese me aapne kya kamal likha hai
रुख यूँ तो हवा का हरदम ही रहा तिरछा
दिशा अपनी बदल कर बस चलते ही जाना है.
bahut khoob
rachana
अँधेरी जिंदगियों में यूँ जल ऐ शिखा जैसे
ReplyDeleteकुछ तारीक़ निगाहों को रोशन कर जाना है
अँधेरी जिंदगियों में यूँ जल ऐ 'शिखा' जैसे
कुछ तारीक़ निगाहों को रोशन कर जाना है ...
ज़रा गौर करें ... आगे से जहाँ भी आप किसी भी शेर में अपने नाम का इस्तमाल करें तो उसको 'शिखा' के बीच में जरुर लिखें ...
बाकी रचना बेहद उम्दा है ... आभार !
अँधेरी जिंदगियों में यूँ जल ऐ शिखा जैसे
ReplyDeleteकुछ तारीक़ निगाहों को रोशन कर जाना है
bahut satik hei yah pnktiya shikhaji ....:)
इस जिन्दगी से बस इतनी सी गुजारिश है
ReplyDeleteदो लम्हे अता कर दे जिन्हें जीते चले जाना है.
...बहुत खूब! बहुत सटीक और सशक्त अभिव्यक्ति...आभार
शिखा जी,
ReplyDeleteअच्छी लगी यह गज़ल भी.. दिल से निकली है.. इसलिए बिलकुल ताजगी भरी है... कहीं कहीं पर थोड़ी गुंजायश है, मगर डायरेक्ट दिल से की तर्ज़ पर पसंद आयी...
इतनी भाग-दौड के बीच भी आप इतनी आध्यात्मिक सोच दिमाग में ले आती हैं, यही बड़ी बात है!!
अच्छा लगा आपका ये अंदाज़ भी!!
बस कमाल कर दिया आपने. सभे शेर बेहद जज्बाती...
ReplyDeleteइस जिन्दगी से बस इतनी सी गुजारिश है
दो लम्हे अता कर दे जिन्हें जीते चले जाना है.
दाद स्वीकारें.
बहुत खूब, बहुत बढ़िया.
ReplyDeleteरुख यूँ तो हवा का हरदम ही रहा तिरछा
ReplyDeleteदिशा अपनी बदल कर बस चलते ही जाना है.
अँधेरी जिंदगियों में यूँ जल ऐ 'शिखा' जैसे
कुछ तारीक़ निगाहों को रोशन कर जाना है
Bahut khoob!
Merry Xmas!
शिखा की रौशनी में हर धुंध छंट जाएगी ,
ReplyDeleteतिरछी हवा भी टकराकर खाक में मिल जाएगी .
जीवन की सच्चाई को चंद लब्जों में समेट लिया आपने , लेकिन अदम्य जिजीविषा वाली आत्मा से भी परिचय हुआ . साधुवाद
इस तरह का लेखन हो, तो बार-बार ''झेला'' जा सकता है. सोच-विचार, चिंतन ...इन सबके घोल से जो कुछ निकलता है, उससे इसी तरह की प्यारी कविता बनती हैं.मैरी क्रिसमस..
ReplyDeleteसाहिर की एक नज़म याद दिलवा दी शिखा ...
ReplyDeleteसंसार की हर शै का इतना ही फ़साना है
इक धु्ंध से आना है, इक धुंध में जाना है
जिंदगी के फलसफा का यह एहसास बहुत सुकून देता है. आभार.
ReplyDeleteबहुत सुन्दर है ग़ज़ल । नया हैडर भी बढ़िया लगा शिखा जी ।
ReplyDeleteक्रिसमस की शुभकामनायें ।
कुछ तारीक़ निगाहों को रोशन कर जाना है...
ReplyDeleteexcellent..
खूबसूरत रचना।
ReplyDeletebahut sunder khwaish hai ...rachna me ...
ReplyDeletebahut badhia rachna ..
....झेल लीजिये ये रचना भी
ReplyDeleteझेल ली! आभार! :)
Dil se 'WAH' hai nikli mere...
ReplyDeletePadhkar teri gazal nayi...
Hum teri taareef karen kya..
Tareefon ki jhadi lagi....
Merry X-Mas...
Deepak Shukla. .
अँधेरी जिंदगियों को रोशन करने की चाहत , हवा के उलटे रुख को बदलने की हिम्मत ,ज़िन्दगी के दो लम्हे जी लेने की ख्वाहिश ,
ReplyDeleteन किसी से गिला न शिकवा ...यथार्थ को कहती पंक्तियाँ की न कुछ लाये हैं और न ही ले जायेंगे ...पर इस ज़िन्दगी के फ़साने को कौन कितना याद रखता है ... सुन्दर भाव ... अच्छी प्रस्तुति .. व्यस्तता के बीच भी ख्यालों को शब्द दिए ..
मैंरी क्रिसमस
झेलते झेलते ये तो पसंद ही आ गई...:)
ReplyDeleteGorgeous.
ReplyDeleteबहुत खूब वाह!
ReplyDeleteअँधेरी जिंदगियों में यूँ जल ऐ 'शिखा' जैसे
ReplyDeleteकुछ तारीक़ निगाहों को रोशन कर जाना है...
खयाल उम्दा है ...मगर मन को लाख समझाते भी शिकायत हो जाती है तो क्या कीजे !
रुख यूँ तो हवा का हरदम ही रहा तिरछा
ReplyDeleteदिशा अपनी बदल कर बस चलते ही जाना है.
Shikha ji above liens are the main theme of your good creation. very nice and keep it up ....:):)
रुख यूँ तो हवा का हरदम ही रहा तिरछा
ReplyDeleteदिशा अपनी बदल कर बस चलते ही जाना है.
Dear shikaha ji above lines are main theme of your creation. really very nice and keep it up....:):)
bahut sundar rachna
ReplyDeleteआपकी बस लेखनी चलती रहे,
ReplyDeleteशब्द का संग्रह बना खजाना है...
बुल्ला कि जाणा मैं कौन...
ReplyDeleteजय हिंद...
इस जिन्दगी से बस इतनी सी गुजारिश है
ReplyDeleteदो लम्हे अता कर दे जिन्हें जीते चले जाना है.
वाह ...बहुत खूब कहा है आपने इन पंक्तियों में ।
bahut achcha likhi hain......
ReplyDeleteइस जिन्दगी से बस इतनी सी गुजारिश है
ReplyDeleteदो लम्हे अता कर दे जिन्हें जीते चले जाना है.
sundar bhavavyakti
हुनर की पहचान होती है तिरछी हवाओ में
ReplyDeleteहवा के रुख के साथ तो कोई भी उड़ सकता है ,
देखा आपकी पंक्तिया संक्रामक है ,मैंने भी कुछ लिख दिया
क्यों बैठकर सोचूं और क्यों करूँ किसी से शिकवा
ReplyDeleteक्या लेकर हम आये थे , क्या लेकर हमें जाना है
Diosa,
Ye Line padhkar laga bas hamare liye hi likhi hai.
इस जिन्दगी से बस इतनी सी गुजारिश है
ReplyDeleteदो लम्हे अता कर दे जिन्हें जीते चले जाना है
vaah ..bahut khoob....
आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
ReplyDeleteकृपया पधारें
चर्चा मंच-737:चर्चाकार-दिलबाग विर्क
bahut khub
ReplyDeleteबहुत सुन्दर भाव संजोये हैं।
ReplyDeleteअब मैं क्या कहूं शिखा? सारे लोग बहुत अच्छा-बहुत अच्छा लिख के जा रहे हैं, लेकिन मैं ये नहीं कह सकती :( SORRY
ReplyDeleteएक नम्बर की कमज़ोर रचना है ये तुम्हारी :(
तुम जैसी सशक्त गद्य लेखिका से मैं तो कहीं बहुत ज़्यादा अपेक्षा रखती हूं. भाव अच्छे हैं, लेकिन ताना-बाना बहुत कमज़ोर है :( :(
कुछ तारीक़ निगाहों को रोशन कर जाना है
ReplyDeleteवाह! सुन्दर....
सादर बधाई...
बहुत सुन्दर...
ReplyDeleteवंदना ! सबकी अपनी अपनी पसंद होती है. तुम्हें नहीं पसंद आई कोई बात नहीं.इसमें सॉरी कैसा. बल्कि शुक्रिया इमानदार प्रतिक्रिया का. पर दूसरों के कहे को तो मत कोसो :).हो सकता है वे भाव को ही महत्व देते हैं या फिर मेरा हौसला नहीं तोडना चाहते और चाहते हैं कि मैं कवितायेँ भी लिखती रहूँ. जबकि कुछ लोग शिद्दत से यह चाहते हैं कि मैं सिर्फ गद्य ही लिखूं . कवितायेँ लिखना ही छोड़ दूं :). यूँ भी हर कोई हमेशा अच्छा लिखे ये संभव कम ही होता है.और मैं तो बिलकुल ही नालायक हूँ.कभी कभार कुछ तुम लोगों की उच्च नज़रों को जँच जाये तो बात अलग है :)
ReplyDeleteक्यों बैठकर सोचूं और क्यों करूँ किसी से शिकवा
ReplyDeleteक्या लेकर हम आये थे , क्या लेकर हमें जाना है
सब कुछ यहीं मिला है,और सब यहीं रह जाना है.......
shikha jee..aapee nayi kavita padhi..phir lagatar aapke lekhon ne mujhe prabhabit kiya..main to maanta tha ke aap ghazal ya geet likhtee he nahi hongi..lekin aaj ..christmas ke awsar per jindgi ko jeene ke naye mantra sikhati jeewan rang me doobi behtarin ghazal...hardik badhayee..
ReplyDeleteप्रेरक रचना.......
ReplyDeleteकल 24/12/2011को आपकी कोई पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
ReplyDeleteधन्यवाद!
"रुख यूँ तो हवा का हरदम ही रहा तिरछा
ReplyDeleteदिशा अपनी बदल कर बस चलते ही जाना है"
बहुत खूब!
ब्लॉग में किया गया परिवर्तन अच्छा लगा।
ReplyDeleteइस ग़ज़ल में प्रत्यक्ष अनुभव की बात की गई है, इसलिए सारे शब्द अर्थवान हो उठे हैं ।
अँधेरी जिंदगियों में यूँ जल ऐ 'शिखा' जैसे
ReplyDeleteकुछ तारीक़ निगाहों को रोशन कर जाना है..
वाह ,क्यों न हो आपकी यह अभिलाषा !
रुख यूँ तो हवा का हरदम ही रहा तिरछा
ReplyDeleteदिशा अपनी बदल कर बस चलते ही जाना है.
लाजवाब पंक्तियाँ
सादर
अँधेरी जिंदगियों में यूँ जल ऐ 'शिखा' जैसे
ReplyDeleteकुछ तारीक़ निगाहों को रोशन कर जाना
अति सुन्दर
क्या बात कही है...
ReplyDeleteरुख यूँ तो हवा का हरदम ही रहा तिरछा
दिशा अपनी बदल कर बस चलते ही जाना है.
प्रेरक, प्यारी इस सुन्दर पोस्ट ने मन लुभा लिया...
सुखद ho आने वाला हर वर्ष...यही शुभकामना है...
बड़े दिन की शुभकामनायें! उत्सव के उल्लास का आनन्द लीजिये!
ReplyDeletecome here from Malaysia =)
ReplyDeleteक्यों बैठकर सोचूं और क्यों करूँ किसी से शिकवा
ReplyDeleteक्या लेकर हम आये थे , क्या लेकर हमें जाना है
जीवन के इस फलसफे को कभी कभी लिखना जितना आसान होता है निभाना उतना ही कठिन ..
लाजवाब रचना है ... आपको क्रिसमस और नव वर्ष की बहुत बहुत शुभकामनाएं ...
सुंदर प्रस्तुति, बस पल भर ठहरना है और फिर चले जाना है... और हम चलते है क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनायें के साथ . .
ReplyDeleteरुख यूँ तो हवा का हरदम ही रहा तिरछा
ReplyDeleteदिशा अपनी बदल कर बस चलते ही जाना है.
चलने का यह स्टाइल पसंद आया,शिखा जी.
सुन्दर प्रस्तुति के लिए शुक्रिया.
मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.
'हनुमान लीला भाग-२'पर
आपका हार्दिक स्वागत है.
बस इतनी सी गुजारिश..!!!
ReplyDeleteअँधेरी जिंदगियों में यूँ जल ऐ 'शिखा' जैसे
कुछ तारीक़ निगाहों को रोशन कर जाना है..
अग्निशिखा की भावपूर्ण अभिव्यक्ति
bahut achchi peshkash. Dhanyavaad!!
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