Thursday, 31 March 2011

पाना मुश्किल है या निभाना.????

सफलता पाना  आसान है पर उसे उसी स्तर पर बनाये रखना मुश्किल. शायद आप लोगों ने भी सुन रखा होगा. कुछ लोग मानते होंगे और कुछ लोग नहीं. परन्तु मैं हमेशा  ही इस विचार से १००% सहमत रही हूँ. अपने आसपास ,या दूर- दूर न जाने कितने ही ऐसे उदाहरण मुझे मिल जाते हैं जिन्हें  देख कर इस विचार की सत्यता प्रमाणित होती रहती है.अपने आसपास भी आप गौर करें तो पाएंगे कि कितने ही लोग एक छलांग में ऊपर चढ जाते हैं पर कुछ समय बाद उनका कुछ अता पता नहीं मिलता. ..ज्यादा दूर मत जाइये अपनी इंडियन फिल्म इंडस्ट्री में ही देखिये - अरुण गोविल ,दीपिका राम सीता बनकर घर घर पूजे जाते थे परन्तु सीरियल के ख़त्म होते ही उनकी राम कहानी भी ख़त्म हो गई .वहीँ अपनी तुलसी मैया आदर्श बहु बनने के बाद कहाँ गईं किसी को परवाह नहीं.जैसे रोनित रॉय ,राहुल रॉय ,अनु कपूर, विवेक मुशरान ,और भी ना जाने  कितने ऐसे लोग रहे होंगे जिनकी पहली फिल्म सुपर हिट हुई परन्तु उसके बाद वे फ्लॉप हो गए .ऐसे उदाहरण समाज के हर क्षेत्र में हर वर्ग में, हर उम्र के लोगों में देखे जा सकते हैं. आखिर क्या वजह है? शानदार शुरुआत होने पर, बेमिसाल सफलता मिलने के वावजूद भी कुछ लोग सफल नहीं हो पाते या यूँ कहिये कि सफलता को आगे नहीं बढ़ा पाते या उसके स्तर को बनाये नहीं रख पाते. 
कुछ लोग कहेंगे कि यह सब तो किस्मत की बात है .परन्तु मेरे ख्याल से किस्मत के अलावा भी कुछ बातें है जो सफलता टिकाये रख पाने में बाधक बन जाती हैं. गौर फरमाइयेगा - 
- असल में किसी भी व्यक्ति की  सफलता में वह व्यक्ति अकेला नहीं होता , प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बहुत से लोग शामिल होते हैं और कई बार इन्हीं लोगों के सहारे वह सफलता पा जाते हैं परन्तु उसके बाद उन सहारों  की कमी या अनुपस्थिति में वे उसी गति से आगे नहीं बढ़ पाते .
- हम अपनी मेहनत और लगन से जब एक जगह पर अपना स्थान बना लेते हैं तो बाकी लोगों की  हमसे उम्मीदें बढ़  जाती हैं. वह हमसे उससे अच्छा और अच्छा करने की उम्मीद करते हैं और उन उमीदों पर हमेशा खरे ना उतरने के एवज़ में हम वह स्थान गँवा देते हैं.इसका मतलब यह नहीं कि सफलता पाने के बाद हमारे गुण कम हो जाते हैं बल्कि निरंतर अपने आपको और ऊँचा उठाने और लगातार अपने को बेहतर बनाने का गुण हममे नहीं होता और इसी कारण जिसमें यह गुण होता है वह हमसे आगे निकल जाता है .और दुनिया का दस्तूर है कि चढ़ते सूरज को ही सलाम करती है.
- कई बार सफल व्यक्ति में घमंड पैदा हो जाता है और इस कारण वह दुसरे किसी भी व्यक्ति को अयोग्य समझ लेता है.उसके गुणों और खूबियों से सीखने की बजाय वह उन्हें नकार देता है . उसकी यह प्रवृति उसे कुछ भी नया और अच्छा सीखने से रोकती है और वह जल्दी ही अपनी पाई सफलता से नीचे आ जाता है.
- इंसान गलतियों का पुतला है और कोई ना कोई गलती उससे हो ही जाती है हमेशा एक जैसा परफोर्मेंस  देना सम्भव नहीं होता और कई बार सफलता के बाद कुछ एक असफलताओं का सामना करने से व्यक्ति में कुंठा और निराशा जन्म ले लेती है और वह  अपना बुद्धि विवेक खो बैठता है परिणाम स्वरुप अपनी सफलता कायम नहीं रख पाता .
- ज्यादातर सफलता के सौपान चढ़ जाने के बाद व्यक्ति अपनी कमियों के प्रति उदासीन हो जाता है और दूसरों की कमियां गिनाने के चक्कर में खुद की  सुधारना भूल जाता है.वह इस मुगालते में जीता रहता है कि बाकी सब बेकार हैं दुनिया में कोई धुरंधर है तो बस वही .और असली दुनिया चलती रहती है ,उससे आगे निकल जाती है,और वह अपने फूल्स पैराडाइज में ही सोता रहता है.
- ईर्ष्या मनुष्य का स्वाभाविक गुण है .ऐसा भी होता है कि आपकी सफलता से जलने बाले बहुतायत में हो जाते हैं और उनकी जी जान से कोशिश रहती है कि वे  आपकी जगह पहुंचे ना पहुंचे परन्तु आपको खींच  खांच कर नीचे ले आया जाये और अगर आप मजबूती से अपनी जगह नहीं पकड़ कर बैठे हैं,आपके पैर धरातल पर मजबूती से नहीं रखें हैं , तो ऐसे तत्व जल्दी ही आपकी टांग पकड़ कर नीचे खींच लाते हैं .
- यह सत्य है कि इस दुनिया में  कुछ भी स्थिर नहीं है सब आना जाना है जो आज आपका है वह कल दुसरे का होगा ही. यह हम सब जानते हैं परन्तु अपनी मेहनत से पाई सफलता कुछ समय तक सहेज कर रख पाना भी हर कोई चाहता है पर कितने लोग सफल हो पाते हैं इस में ?. सफलता पाने से ज्यादा उसे कायम रखना मुश्किल होता  है.कम से कम मुझे तो यही लगता है .आपका क्या ख़याल है?

Friday, 25 March 2011

यू के में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मलेन. एक झलक ..

 .
हिंदी समिति के २० वर्ष पूरे होने के उपलक्ष  में वातायन,हिंदी समिति और गीतांजलि संघ द्वारा दिनांक ११,१२,और १३ मार्च को क्रमश: बर्मिंघम ,नॉटिंघम और लन्दन में  अन्तराष्ट्रीय हिंदी सम्मलेन आयोजित किया गया. जिसका मुख्य विषय था विदेश में हिंदी शिक्षण और इस सम्मलेन में भारत सहित यू के  और रशिया के  बहुत से हिंदी विद्वानों  ने भाग लिया जिनमें अजय गुप्त, पद्मेश गुप्त, डॉ.सुधीश पचौरी, तेजेंदर शर्मा, बोरिस ज़खारिन, ल्युदमिला खाख्लोवा, के के श्रीवास्तव, वेद मोहला,प्रेम जन्मजय,डॉ रामचंद्र रे, गौतम सचदेव, आनंद कुमार, अशोक चक्रधर,बागेश्री चक्रधर,रमेश चाँद शर्मा, देविना ऋषि, सुरेखा चोफ्ला, तितिक्षा, बालेन्दु दधीचि आदि शामिल थे.
लन्दन के नेहरु सेंटर में आयोजित इस समारोह के ३ सत्र थे .पहला सत्र हिंदी के विद्वानों  से यू के के हिंदी शिक्षकों  की चर्चा का था जिसकी अध्यक्षता गौतम सचदेव जी ने और सञ्चालन वेद मोहला जी ने किया इस पैनल  में भारत और रशिया  के हिंदी के विद्वान  सम्मलित  थे जिन्होंने यू के में हिंदी शिक्षण से  सम्बंधित सभी विषयों पर चर्चा की.
दूसरा सत्र  हिंदी शिक्षण में इन्टरनेट ,बेबसाईट एवं नई वैज्ञानिक तकनीकि  को लेकर था जिसकी अध्यक्षता तेजेंदर शर्मा ने की और इस सत्र में इस विषय पर अशोक चक्रधर और बालेन्दु शर्मा दधीचि ने अपने विचार और सुझाव रखे.और हिंदी भाषा में इन्टरनेट और कंप्यूटर पर काम करने की नई तकनीकों से अवगत कराया.
समारोह का तीसरा सत्र था- यू के में हिंदी शिक्षण - समस्याएं और चुनौतियाँ .जिसमें भारत से आये ,दिल्ली विश्वविध्यालय के हिंदी प्राध्यापक एवं डीन ऑफ़ कॉलेज श्री सुधीश पचौरी , जे एन यू की प्रोफ़ेसर और भाषा वैज्ञानिक अन्विता अब्बी प्रमुख वक्ता थे एवं मॉस्को  विश्वविद्यालय  में हिंदी की प्राध्यापिका  ल्युदमिला खाख्लोवा ने सत्र की अध्यक्षता की .इस सत्र के सञ्चालन का भार मुझे सौंपा गया था.
बैठे हुए मैं ,अन्विता अब्बी ,ल्युदमीला खोखलोवा और सुधीश पचौरी जी.पद्मेश जी सत्र के अंत में आभार प्रकट करते  हुए.
यह मेरा पहला अनुभव था जो शिक्षण और हिंदी भाषा के इतने बड़े बड़े विद्वानों के सेमिनार का सञ्चालन मुझे करना था और उसपर सबसे रोचक बात कि मॉस्को  विश्वविद्यालय  से आई उस प्राध्यापिका का परिचय मुझे देने का सौभाग्य मिला था जो उस वक़्त भी मेरे उन मित्रों ( हिंदी पढने वाले रूसी छात्र ) को हमारी फैकल्टी   के बराबर वाली ही इमारत  में हिंदी पढ़ाया करती थीं जिस समयकाल में मैं उस विश्व विद्यालय  में अपना अध्ययन  किया करती थी .कौन जानता था आज करीब १२ वर्षों बाद उनसे लन्दन में मुलाकात होगी और वह भी इस तरह. एक अजीब से नौस्टोलोजिया  का एहसास मुझे हो रहा था और हिंदी भाषा के प्रति और भी कृतज्ञ  मैं अपने आपको महसूस कर रही थी.
इस सत्र में विदेशों में हिंदी के स्वरुप और उसके शिक्षण की कार्य प्रणाली और और उसके मकसद को लेकर सार्थक सवाल उठाये गए जैसे - विदेशों में हिंदी किस मकसद से पढाई जा रही है उसका मकसद सिर्फ अपनी जड़ों से जुड़े रहना ,थोडा बहुत बोल समझ लेना है या उससे आगे भी कुछ है. 
क्या हिंदी को देवनागरी छोड़कर सुविधा के लिए रोमन के माध्यम से सिखाना चाहिए.?
नए मानकों के साथ  हिंदी पढ़ाने का तरीका क्या होना चाहिए जबकि विदेशों में हिंदी के अध्यापन का कार्य ज्यादातर अनट्रेंड अध्यापकों द्वारा स्वयं  सेवक के तौर पर किया जाता है .
सवाल गंभीर थे और उसपर अलग अलग प्रक्रिया भी हुई.परन्तु कुछ बात जिसपर लगभग सभी सहमत थे वह थीं कि बेशक हिंदी को शुरू में रोमन का सहारा लेकर पढ़ाया जाये परन्तु देवनागरी को उपेक्षित करके हिंदी को नहीं सिखाया जा सकता.
सुधीश पचौरी ने इस बात पर जोर दिया कि सही हिंदी और उसे सही तरीके से सिखाने के लिए प्रशिक्षित अध्यापकों की जरुरत है जिसके लिए विदेशों में भारतीय सरकार को समुचित व्यवस्था करनी चाहिए.भाषा वैज्ञानिकों के संरक्षण में सही ट्रेंनिंग और वर्कशॉप  आयोजित किये जाने चाहिए.
वहीँ रूस से आईं लुदमिला खाख्लोवा ने बताया कि विदेशों में रह रहे छात्रों को नई भाषा सिखाने के लिए किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है .बदलते हिंदी के मानकों को किस तरह सुलझाया जाये.उन्होंने कहा हिंदी कि किताबों में ही इन मानकों को लेकर इतना विरोधाभास है .लिखा कुछ और गया है और आजकल बोला कुछ और जाता है जिससे छात्रों में भ्रम पैदा  होता है और उनके सवालों का हमारे पास कोई जबाब नहीं होता .जरुरत है हिंदी कि पुस्तकों को समय और बदलते मानकों के हिसाब से अपडेट करने की.
कुल मिलाकर  काफी सार्थक रही चर्चा परन्तु इस सत्र का सबसे रोचक हिस्सा था अन्विता अब्बी का पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन जो उन्होंने उत्तर पूर्वी आदिवासियों के इलाके में हिंदी के स्वरुप को लेकर अपने शोध पर प्रस्तुत किया .इस प्रेजेंटेशन में इतनी रोचक बातें थीं कि मन करता था कि बस यह जारी ही रहे ख़तम ही ना हो.उनके मुताबिक इन आदिवासी इलाकों में हिंदी का स्वरुप हमारी हिंदी से कुछ भिन्न है ज्यादातर वे लोग क्रिया का प्रयोग ही नहीं करते और कारक के स्थान में भी परिवर्तन होता है जैसे - वह कहते हैं - मैं तुम्हारा कुत्ता खाया ..यानी तुम्हारे कुत्ते ने मुझे काटा.
ऐसे ही अनगिनत मजेदार उदहारण उन्होंने दिए पर वावजूद इसके इन क्षेत्रों में हिंदी के लिए बहुत ही प्यार और सम्मान देखा जाता है .वह हिंदी को अपनी अधिकारिक भाषा बनाना चाहते हैं और उसे सीखने में और जानने में गर्व महसूस करते हैं.कितने ही क्षेत्रों में उनकी अपनी एक मातृ भाषा होते हुए भी हिंदी सर्वाधिक प्रचलित भाषा है . और घर से बाहर निकालने पर वह हिंदी का ही प्रयोग करते हैं.
ऐसे कितने ही रोचक और सकारात्मक तथ्य अन्विता जी ने पेश किये जिन्हें सुनकर एक सुखद अनुभूति के साथ ही उर्जा का सा अहसास होने लगा कि हिंदी का रूप कुछ भी हो पर यह भाषा मरी नहीं है बल्कि थोड़ी सी जागरूकता से एक विख्यात और सर्वाधिक बोले जाने वाली भाषा बन सकती है.हिंदी का भविष्य उज्ज्वल  है, लोग हिंदी से प्यार करते हैं. बस जरुरत है उसके साथ सहजता से पेश आने की .उसके हर स्वरुप की तरफ उदारता और सकारात्मकता  से देखने की, बदलते वक़्त के साथ उसमें सहज परिवर्तन को अपनाने की.
इस तरह ऐसी ही ऊर्जा और सुखद अहसासों के साथ इस सत्र का समापन हुआ .
और समारोह के अंत में होली मिलन के उपलक्ष्य में अशोक चक्रधर और बागेश्री चक्रधर ने अपनी हास्य रचनाओं से समा बाँध दिया जिन्हें सुनकर पूरे समय समूचे हॉल में ठहाके गूंजते रहे.
दर्शक दीर्घा 

Wednesday, 23 March 2011

आज मैं ऊपर आसमां नीचे....

कभी कभी फ़ोन के घंटी कितनी मधुर हो सकती है इसका अहसास  कभी ना कभी हम सभी को होता है ,  मुझे भी हुआ जब सामने से आवाज़ आई ..शिखा जी ,  आपके संस्मरण को हाई कमीशन द्वारा घोषित लक्ष्मी मल्ल सिंघवी प्रकाशन अनुदान  सम्मान दिया जायेगा. कृपया वक्त पर हाई कमीशन पहुँच जाएँ. लैटर आपको १-२ दिन मे मिल जाएगा ...शब्द जैसे कानो में मिश्री की तरह घुल रहे थे और जबान तालू से चिपकी जा रही थी बड़ी मुश्किल से जी जरुर .बहुत - बहुत  शुक्रिया कहा और फ़ोन बंद हो गया. उसके बाद बहुत देर तक स्तब्ध सी बैठी रही .

कहाँ सोचा था कि ब्लॉग पर अपनी यादों को साझा  करते करते यहाँ तक पहुँच जाउंगी .  यूँ ही कुछ स्मरण लिखने शुरू किये थे . आप सभी ने इतना प्रोत्साहित किया कि एक के बाद एक कड़ी लिखती चली गई .फिर कुछ मित्रों ने कहना शुरू कर दिया इसे विस्तार दो और पुस्तक छपवाओ . बात हास्यप्रद थी और हंसी में ही मैंने टाल दी परन्तु मन के किसी कोने में इच्छा जन्म लेने लगी थी कि कोशिश करते हैं शायद ....
कहते हैं जब किसी भी चीज़ को आप दिल से चाहो तो साधन अपने आप बन जाते हैं . इसी दौरान एक दिन ब्लॉग पर एक कड़ी पढ़कर प्राण शर्मा जी ने मुझे चैट  पर कहा कि आप इसे पुस्तक का रूप देना  चाहती हैं तो लिखकर हाई कमीशन भेजिए . वह हर साल चयनित एक पुस्तक के प्रकाशन के लिए अनुदान और सम्मान देते हैं  . मैंने उन्हें हंस कर कहा पहले तो मुझे यह सब पता ही नहीं है दूसरा वहां इतने बड़े लोगों की रचनाएं  आती होंगी मुझे कहाँ स्थान मिलेगा..
वह कहने लगे  आपका लेखन सुयोग्य है . कोशिश करिए. उन्होंने कुछ सूचनाएँ भी भेजीं तो मैंने यह सोच कर कि भेजने में क्या जाता है एक पाण्डुलिपि भेज दी और भूल गई , क्योंकि पता लगा था कि मुझसे पहले वहां और भी पुस्तके विचारणार्थ हैं  और वे सब साहित्यकार हैं और मुझसे तो बेहतर ही लिखते होंगे , मुझे कहाँ मिलेगा.परन्तु शायद यह मेरे लेखन के शुभचिंतकों और उनकी शुभकामनाओं का ही नतीजा था जो यह फैसला मेरे हक़ में हुआ और मेरे संस्मरण को अनुदान हेतु चुना गया.मुझे फिर भी यकीन नहीं आ रहा था और मैं उस लैटर का इंतज़ार कर रही थी :). वह आया जिसमें लिखा था कि इस अवसर पर हिंदी साहित्य के अलग अलग क्षेत्र में एक शिक्षक, एक मिडिया कर्मी , एक स्वयंसेवी  संस्था और  एक लेखक को सम्मानित किया जाता है और इसी के तहत आपके संस्मरण के लिए यह अनुदान आपको ससम्मान प्रदान किया जायेगा. .
अब मेरे पैर जमीं पर नहीं पड़  रहे थे . आप में से बहुत से लोग हो सकता है यह सोच रहे हो कि अनुदान ही तो है अवार्ड थोड़े ना है जो इतना खुश हो रही है . परन्तु अपने लिखे पर इतने स्थापित साहित्यकारों के बीच उनके समान  सम्मान और सराहना पाना मेरे लिए तो किसी अवार्ड से कम नहीं था.
आखिर वो दिन भी आ गया . सही वक़्त पर हम समारोह स्थल पर पहुँच गए जहाँ बड़े ही सम्मान के साथ हमें आरक्षित प्रथम पंक्ति में बैठाया गया और फिर माननीय उच्चायुक्त  महोदय ने सभी को एक एक करके सम्मानित किया और बाद में सभी को २ शब्द भी कहने  को कहा  गया . अब इतने दिग्गजों के बीच हमारे मुँह से क्या निकला होगा यह तो आप समझ सकते हैं :) परन्तु मेरी पुस्तक को पुरस्कार स्वरुप जो यह अनुदान मिला है उसके लिए मैं हाई कमीशन  की तो तहे दिल से आभारी हूँ . लेकिन इसका श्रेय जाता है आप सब को. मेरे उन सभी पाठकों को जिन्होंने अपनी प्रतिक्रियाओं से मुझे निरंतर इतना लिखने का हौसला दिया है . हो सकता है मैं इस काबिल ना हूँ पर मैं अपने इस पुरस्कार रुपी अनुदान से बहुत खुश हूँ और मेरी इस ख़ुशी के जिम्मेदार आप सब हैं.
यह पुस्तक लगभग पूरी हो चुकी है और भगवान ने चाहा तो इस वर्ष के अंत तक आपके हाथों में होगी.
अपनी शुभकामनाएं और स्नेह बनाये रखियेगा.
बहुत बहुत धन्यवाद आप सबका.
देखिये समारोह के कुछ चित्र.

Friday, 18 March 2011

उजला आस्मां देख लूँ तो चलूँ...


इंटर नेट नहीं था तो उसका एक फायदा हुआ | दो  बहुत ही बेहतरीन पुस्तकें पढ़ने का मौका मिल गया. एक तो समीर लाल जी की "  देख लूँ तो चलूँ " आ गई भारत से कनाडा और फिर यॉर्क होती हुई. दूसरी संगीता जी की " उजला आस्मां " आखिर कार दो  महीने भारत में ही यहाँ वहां भटक कर पहुँच ही गई.शायद दोनों ही इंतज़ार कर रही थीं कि फुर्सत में पहुंचे. हालाँकि दोनों  ही पुस्तकों को ज्यादातर ब्लॉग पर पढ़ ही चुकी थी परन्तु जीती जागती पुस्तक को हाथ में लेकर आराम से बिस्तर पर पसर कर पढ़ने का जो आनंद है वह कंप्यूटर की बड़ी स्क्रीन पर पढ़ने का भी नहीं आता . सो इस अंतराल में दोनो ही पुस्तके कई बार पढ़ डाली.
समीर जी की  पुस्तक जहाँ रोचक लेखन शैली के कारण दिमाग पर कब्ज़ा जमाए रहती है वहीँ संगीता जी की कविताओं का संकलन दिल पर कब्ज़ा कर लेता है .
जहाँ समीर लाल जी के संस्मरण की एक एक घटना प्रवासियों के लिए अपनी ही कहानी कहती है , वहीँ संगीता जी की कविताओं में सामाजिक समस्यायों और भावों की विवधता अचंभित कर देती है.
समीर जी की पुस्तक का पात्र हर वो इंसान है जो अपने देश को छोड़ कर विदेश में बस गया परन्तु फिर भी अपनी मिट्टी  के लिए छटपटाता है और उससे जुड़े रहने की  भरसक  कोशिश करता है. उस पर बीच बीच में चुटीली भाषा का प्रयोग और रोचक घटना क्रम पूरी पुस्तक को एक ही बैठक में पढ़ जाने के लिए विवश करते हैं.
संगीता जी की कवितायेँ यथार्थ और भावनाओं का बेहतरीन संगम है.उनकी रचनाओं की गहराई हमेशा ही मुझे आकर्षित करती रही है. अंतरजाल पर भी जब तब उनका ब्लॉग खोल कर मैं बैठ जाती हूँ तो अब तो पुस्तक हाथ में है कंप्यूटर ऑन  करने की जहमत भी बची. हर भाव,संवेदनशीलता ,सामजिक समस्या और सरोकार को समेटे हुए यह संकलन निसंदेह ही संग्रहणीय है.
इन पुस्तकों के बारे में बहुत कुछ कहा जा चुका है. बहुत सी समीक्षाएं भी हो चुकी है. यह कोई समीक्षा नहीं. न ही मैं समीक्षक हूँ न ही इस काबिल कि इन पुस्तकों की समीक्षा कर सकूँ.
मैं बस एक प्रसंशक हूँ इन दोनों रचनाकारों की लेखन शैली की.और यह आभार है इन दोनों को जो इन्होने अपनी कीमती पुस्तकें मुझ तक पहुंचाई. शिबना प्रकाशन से छपी ये दोनों ही पुस्तके निसंदेह मेरे सिरहाने पर बने एक छोटे से पुस्तकालय के लिए अमूल्य धरोहर हैं जहाँ से जब तब मैं हाथ बढा  कर इनके पाठन का मजा ले लिया करती हूँ.
समीर लाल जी और संगीता जी को बहुत बहुत धन्यवाद और टोकरा भर
कर शुभकामनाये .उनकी लेखनी यूँ ही चलती रहे और ऐसी ही 


बहुत सी पुस्तकें मेरे पुस्तकालय की आजीवन सदस्य बनती रहें

Friday, 4 March 2011

बस एक "लौ"


कभी कभी तो लगता है कि हम लन्दन में नहीं भटिंडा में रहते हैं (भटिंडा वासी माफ करें ) वो क्या है कि हम घर बदल रहे हैं और हमारी इंटर नेट प्रोवाइडर कंपनी का कहना है कि उसे शिफ्ट  होने में १५ दिन लगेंगे .तो जी १८ मार्च तक हमारे पास नेट की सुविधा नहीं होगी.और हमारा काला बेरी भी देवनागरी नहीं दिखाता  ..भगवान  जाने कैसे जियेंगे हम (.पर आप लोगों को इसलिए बता दिया कि इतने दिन हमारी अनुपस्थिति  से आप लोग खुशियाँ न मानना शुरू कर दें.कि चलो जान छूटी)तो तब तक आप सभी लोग हमें माफ कीजियेगा.और यह अकविता झेलिये..


मेरे घर की खिड़की से नजर आता था 
एक ऊंचा  ,घना, हरा भरा पेड़ 
रोज ताका करती थी उसे 
अपनी सूनी सूनी आँखों से 
और तैर जाते थे सपने 
उसकी  शाख पर 
अपना भी एक ट्री हाउस बनाने के 
फिर एक दिन अपने ही आँगन से 
कुछ गीली सूखी लकड़ियाँ इकठ्ठा करके  
एक सीढ़ी बना ली मैंने 
और एक एक पाँव  जमाकर 
शुरू किया चढ़ना 
कुछ ही समय में उसकी शाख पर 
बना लिया अपना एक आशियाना 
और रौशनी के लिए जला लिया एक दिया भी 
लगा ये तो आसान ही था 
बस एक चाह की थी जरुरत 
परन्तु अब मुश्किल था 
आने वाले आंधी ,तूफ़ान से बचा पाना उसे 
बचा पाना उन समाज के ठेकेदारों से 
जो काट डालने तो आतुर थे उस पेड को ही 
जिस पर बड़ी मेहनत से बनाई थी 
अपने लिए एक जगह मैंने....
ना बचा पाऊं शायद ये पेड़, ये आशियाना
हाँ अपने दोनों हाथों की  कोठरी बना ली  है 

कम से कम उस दिए की "लौ " तो ना बुझने पाए-

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