Monday, 27 June 2011

तू और मैं ...


तेरी मेरी जिन्दगी 
उस रसीली जलेबी की तरह है
जिसे देख ललचाता है हर कोई
कि काश ये मेरे पास होती
नहीं देख पाता वो उसके 
गोल गोल चक्करों को 
उस घी की तपन को 
जिसमें तप कर वो निकली है.
*************************
कभी कोई लिखने बैठे 
कहानी तेरी मेरी 
तो वो दुनिया की 
सबसे छोटी कहानी होगी
जिसमें सिर्फ एक ही शब्द होगा 
"परफेक्ट ".
***********************************
तेरे लिए मैं 
तेरी उस पसंदीदा टाई की तरह हूँ 
जिसे तू हर ख़ास मौके पर 
गले से लगा लेता है
पर मेरे लिए तू 
मेरे सीने से लगी वो चैन है 
जिसे मैं कभी खुद से अलग नहीं करती.
********************************
मैं एक रिमोट कंट्रोल हूँ तेरे लिए
जिससे तू जब तब 
अपने मूड के हिसाब से 
चैनल बदल लेता है 
पर  मेरे लिए तो तू 
१९८० का वह  दूरदर्शन है 
जिसपर हमेशा कृषि दर्शन ही आता है. 

Monday, 20 June 2011

उड़ान

मनोज जी ने अपने ब्लॉग पर प्रवासी पंछियों पर एक श्रंखला शुरू की है. जो मुझे बेहद पसंद है .क्योंकि उसमें मुझे अपने बचपन के बहुत से सवालों के जबाब मिल जाते हैं.ये कुछ पंक्तियाँ उन्हीं आलेखों से प्रेरित हैं.
कहते हैं उड़ान परों से नहीं
हौसलों से होती है
पर क्या हौसला ही काफी है.
हौसले के साथ तो 
उड़ता है बादल भी
पर कहलाता है आवारा.
यूँ तो उड़ता है पत्ता भी
पर निर्भर होता है
 
 हवा के रुख पर.
उड़ान हो तो ऐसी
जैसे उड़ते हैं पंछी
संतुलित करके परों को
सोच कर मंजिल को
पहचान कर सही दिशा को
उड़ो  तुम भी,
बेशक "पर" हौंसलों के हों
पर ध्यान रहे
गंतव्य तक पहुँचने के लिए
सही दिशा का भान होना
बेहद जरुरी है

Friday, 17 June 2011

इन्द्रलोक में ब्लॉगिंग...


देश के गंभीर माहौल में निर्मल हास्य के लिए :)
पृथ्वी  पर ब्लॉगिंग  का नशा देख कर कर स्वर्ग वासियों को भी ब्लॉग का चस्का लग गया. और उन्होंने भी  ब्लॉगिंग  शुरू कर दी. पहले कुछ बड़े बड़े देवी देवताओं ने ब्लॉग लिखने शुरू किये, धीरे धीरे ये शौक वहां रह रहे सभी आम और खास वासियों को लगने लगा यहाँ तक कि यमराज के भी कुछ गणों  ने ब्लॉग बना लिए और उत्पात मचाने लगे.कुछ लोगों ने अपना अपना मुखिया भी चुन लिया .जब कुछ छोटे देवी देवता अच्छा लिखने लगे और उन्हें अच्छा रिस्पॉन्स भी मिलने लगा तब इंद्र का सिंहासन  डोलने लगा. स्वर्ग में हडकंप मचने लगा .सबको अपनी अपनी कुर्सी और रोटी  की चिंता सताने लगी.तो इंद्र ने एक सभा बुलाई देखिये एक झलक ---
सबसे पहले नारद का दल आया -.दुहाई है प्रभु दुहाई है .आज कल ब्लॉग में इतना मौलिक और अच्छा सामान मिलने लगा है हमारी तो रोजी छिन रही है प्रभु .पहले जिस चीज़ के लिए अख़बारों के मालिक हमें पैसे देते थे हमारी चिरौरी  करते थे, अब उन्हें वो सब फ्री में मिल रहा है .प्रभु वो अब हमें पूछते ही नहीं .जहाँ जगह खाली मिलती है कोई ब्लॉग की पोस्ट लेकर ठोक  देते हैं . कुछ करिए प्रभु ....कुछ करिए.
इंद्र.- हाँ समस्या तो गंभीर है तुम ऐसा करो पहले खुद एक ब्लॉग बनाओ फिर ब्लॉगरों से दोस्ती हो जाये तो उन्हें बरगलाना शुरू करो.उन्हें कहो कि अपनी पोस्ट अख़बारों में ना दें फ्री में. उन्हें पैसे का लालच दो ,उन्हें कहो कि अखबार वाले उन्हें इस्तेमाल कर रहे हैं.उनकी कीमती चीज़ का इस्तेमाल फ्री में कर रहे हैं.देखो !ये पढने लिखने वाले लोग बड़े सैंटी  होते हैं. ये तरीका जरुर काम करेगा और वो इसके  खिलाफ आवाज़ उठाएंगे. अब अखवार वाले हर किसी को तो पैसे देने से रहे .और मान लो देने भी लगे, तो पैसे के चक्कर में लोग वह लिखेंगे जो उनसे लिखने को कहा जायेगा और फिर ब्लॉग पोस्ट की सहजता और रोचकता ख़तम हो जाएगी.तो अखबार वाले फिर से तुम्हारे पास चले आयेंगे और तुम्हारी चांदी ही चांदी.
 दल  - अरे महाराज ये भी किया अब तक कर रहे हैं. कुछ ब्लॉगर  तो झांसे में और पैसे के लालच में आ भी गए. पर कुछ तो बहुत ही ढीठ  हैं वो कहते हैं हम तो ब्लॉग लिखते हैं अपनी ख़ुशी के लिए, अपने विचार ज्यादा लोगों तक पहुँचाने के लिए, फिर वो कैसे भी पहुंचे. चाहे अखबार से या रेडिओ से हम तो खुश ही होंगे.और ब्लॉग लिखने में कौन से हमें पैसे मिलते हैं जो कहीं और छपने से पैसे की उम्मीद करें .बस हमारी बात हमारे नाम से ज्यादा लोगों तक पहुँच रही है तो हम तो खुश हैं.
उस पर भगवान हमें तो सारी राजनीति  देख कर लिखना पढता है ये ब्लॉगरों  की तो कोई जबाबदेही है नहीं , बिंदास लिखते हैं तो जनता हाथों हाथ ले रही है.बहुत कहा कि स्वर्ग की ब्लॉगिंग में कचरा है, हनुमान की सेना है उसपर उसके हाथ में उस्तरा पकड़ा दिया है.पर कोई सुनता ही नहीं.चुपचाप बस अपना काम करते रहते हैं.
तभी भड़भड़ाता  दूसरा दल आया  -
महाराज एक और विकट  समस्या है .वो है टिप्पणियों की .  कुछ लोगों के ब्लॉग में इतनी  टिप्पणी आती है कि पूछो मत हाँ ये और बात है कि वो लिखते भी ठीक ठाक ही हैं, और दूसरों को सराहते भी  हैं. लेन देन  है महाराज.और हम अपनी अकड़ में कहीं जा नहीं पाते.इत्ते इत्ते लिंक भेजते हैं लोगों को कि इनबॉक्स रोने लगे फिर भी  हमें कम टिप्पणी मिलती हैं . बहुत दुखी हैं महाराज क्या करें.
इंद्र. - तुम ऐसा करो कि एक एक अभियान छेड़ दो, कि ये टिप्पणी वगैरह  सब बेकार है. जो स्तरीय लिखने वाला है उसे इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए और इसका आप्शन ही बंद कर देना चाहिए.
दल  - अरे ये भी किया था प्रभु ! और कुछ दोस्त तो साथ भी आ गए.कुछ देवताओं को उनकी महानता का  वास्ता देकर साथ मिलाया कि इन टिप्पणियों से उनका स्तर गिर जाता  है .पर प्रभु उन लोगों का क्या करें जो महा जिद्दी हैं .कहते हैं कि हमारा तो दो शब्दों से भी उत्साह बढता है .आखिर हर कलाकार अपनी कला पर तालियाँ और वाह वाह चाहता है वही उसकी उर्जा है. फिर हम क्यों नहीं .
और प्रभु उसपर स्वर्ग की देवियों और अप्सराओं ने भी ब्लॉगिंग शुरू कर दी है .अब तक तो वे देवताओं के कामों में ही उलझी रहती थीं अब जब से लिखना शुरू किया है कमाल हो गया है ऐसा लिखती हैं कि सब खिचे चले जाते हैं .हमने तो यहाँ तक फैलाया कि अप्सराओं के लेखन पर नहीं, वे अप्सराएँ हैं इसलिए लोग जाते हैं उनकी पोस्ट पर.परन्तु  कोई फायदा नहीं प्रभु! उनके लेखन में ताजगी है,मौलिकता है और उनके पास समय भी है प्रभु .हमें तो कोई पूछता ही नहीं .अब कितना किसी को भड़काएं ..
तभी ब्रह्मा का दल दौड़ा दौड़ा आया - प्रभु गज़ब हो गया .हर कोई आम ओ ख़ास  लिखने लगा है. हर कोई कवितायें,कहानियां ,संस्मरण लिख रहा है कोई विधा नहीं छोड़ी भगवन ! साहित्य की  तो ऐसी तेसी हो गई है प्रभु !.उनके लेखन में  इतनी ताजगी है हमारा साहित्य तो किलिष्ट लगता है लोगों को .उनकी पोस्ट धडाधड छप रही है प्रभु .ईमानदार  अभिव्यक्ति होती है तो लोग खूब पसंद कर रहे हैं .पर भाषा के स्तर  का क्या प्रभु? हमें कौन पूछेगा फिर ? अनर्थ हो रहा है अनर्थ.

इंद्र - अरे तो आप मुहीम चलाइये कि स्तरीय लिखा जाये , सार्थक लिखा जाये. अपने को ऊँचा और दूसरे के लेखन को निम्न बताइए.लोगों को भडकाइये  कि पॉपुलर  लोगों की पोस्ट पर ना जाएँ .उन्हें लिखना नहीं आता.भाषा और विधा के नाम पर फेंकिये पत्थर उनपर .जरुर असर होगा .फिर आप ही आप होंगे और भाषा भी जहाँ की तहां रहेगी .
दल- वही तो  कर रहे हैं प्रभु! कुछ लगाये भी हुए हैं इसी काम पर. परन्तु  जैसे कुछ लोगों के कान पर जूं तक नहीं रेंगती महाराज, रिएक्ट ही नहीं करते हंगामा ही नहीं होता फिर क्या करें. हमें तो सार्थक लेखन के नाम पर बार बार ना जाने कितनी निरर्थक पोस्ट लिख डालीं.पर कोई असर नहीं हुआ. .
 सहायता कीजिये भगवान रहम कीजिये हर उपाय कर लिया है.कुछ ब्लॉगरों  को ब्लॉगिंग  छुडवाने के लिए टंकी पर भी चढ़ाया पर अब उसे भी कोई भाव नहीं देता. तो बेचारे खुद ही उतर आते हैं थोड़ी देर में. माना कि ब्लोगिंग सहज, सरल अभिव्यक्ति का मंच है पर अगर वो हमारे क्षेत्र में घुसपेठ करेंगे तो गुस्सा तो आएगा ना प्रभु ! 
दुहाई है ...दुहाई है...दुहाई है.....
स्वर्ग लोक में से आता शोर सुनकर यमराज के कुछ गणों के भी कान खड़े हो गए .उन्हें उत्पात करने का मौका  मिल गया .सोचा चलो बहती गंगा में हमऊँ हाथ धो लें इसी बहाने दो चार पर भड़ास निकाल आयें .
सो उन्होंने आकर सभा में उत्पात मचाना शुरू कर दिया और सभा बिना किसी हल या नतीजे के ही समाप्त हो गई.

Thursday, 9 June 2011

शेक्सपियर के शहर के अनपढ़ बच्चे

लन्दन - पुस्तकों की दुकानों, पुस्तकालयों , प्रकाशकों , लेखकों का शहर .लेकिन इस शहर में तीन में से एक बच्चा बिना अपनी एक भी किताब के बड़ा होता है.जहाँ ८५% बच्चों के पास उसका अपना एक्स बॉक्स ३६० है , टीवी पर अपना कण्ट्रोल है, पूरा कमरा खिलोनो से भरा पडा है, ८१ % के पास अपना मोबाइल फ़ोन है. परन्तु कहने को भी,अपनी खुद की एक भी पुस्तक नहीं है .
जब एक बच्ची से उसकी टीचर ने कक्षा में सबके साथ पढने के लिए एक पुस्तक घर से लाने को कहा तो वह बच्ची आर्गोस का (एक दूकान) कैटलोग लेकर आई कि उसके घर में सिर्फ एक यही पुस्तक है. .
शेक्सपियर भी जब आसमां से ज़मीं पर देखता होगा ....  

जरा इन आंकड़ों पर गौर कीजिये -
लन्दन में तीन में से एक बच्चे के पास अपनी एक पुस्तक भी नहीं है ..
११ साल की उम्र में जब बच्चे प्राइमरी स्कूल से निकलते हैं तो २५% बच्चे ठीक से पढ़ और लिख भी नही पाते .
लन्दन में पढने वाले एक चौथाई बच्चे सेकेंडरी स्कूल छोड़ते समय भी आत्मविश्वास से पढ़ लिख नहीं पाते.
लन्दन में काम करने वाले वयस्कों में से एक मिलियन व्यस्क ठीक से पढ़ नहीं पाते और ५ % इंग्लैण्ड  के व्यस्क का साक्षरता  स्तर  एक सात साल के बच्चे से भी कम है .
४० % बच्चे जब ११ साल की उम्र में सेकेंडरी स्कूल में आते हैं, तो उनका पढने का स्तर ६ से ९ साल के बच्चे जितना होता है .
लन्दन के स्कूल में २०% बच्चे स्पेशल नीड्स जैसे डायलेक्सिया के शिकार हैं.
और लन्दन की ४०% फर्म  कहती हैं कि उनके कर्मचारियों के लिट्रेसी स्किल बहुत खराब हैं, जिससे उनके व्यापार पर नकारात्मक असर पड़ता है.( लन्दन इवनिंग  स्टेंडर्ड से साभार.)

आखिर क्या वजह है कि एक ऐसा शहर जो शब्दों की दुनिया का केंद्र है. वहां ११ साल की उम्र तक के एक चौथाई बच्चे ठीक से पढ़ और लिख नहीं पाते.
गौरतलब है कि लन्दन के प्राइमरी स्कूलों में पुस्तक पढने ( रीडिंग स्किल )पर बहुत जोर दिया जाता है.हर बच्चे के लिए उसके स्तर की पुस्तकें उपलब्ध कराई जातीं हैं,उन्हें स्कूल और घर में पढने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है . उनके माता पिता से कहा जाता है कि बच्चे के साथ बैठकर रोज एक पुस्तक पढ़ें.और और धीरे धीरे उनका स्तर बढ़ाया जाता है.फिर क्या वजह है कि आंकड़े इतने खराब हैं.
इसके कारणों के तौर पर कहा जाता है कि -
लन्दन में बाहर से बहुत लोग आते हैं जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती.ऐसे घरों से आये बच्चे पढने में अपने माता पिता की मदद नहीं ले पाते और उनके माता पिता अंग्रेजी पढने के प्रति उदासीन रहते हैं अत: वे कमजोर रह जाते हैं.
ज्यादातर टूटे हुए परिवारों में एक ही अभिभावक पर इतना अधिक बोझ होता है, वह अपनी जीविका कमाने में इतना व्यस्त होते हैं , कि वे चाह कर भी बच्चों के साथ बैठकर पुस्तक नहीं पढ़ पाते. 
ज्यादातर माता पिता पुस्तक पढने को लेकर उदासीन होते हैं. उसे इतना महत्वपूर्ण नहीं समझते अत: बच्चों के कहने पर भी कि "आज लाइब्रेरी चलें" उनका जबाब होता है ."आज नहीं फिर कभी".इससे बच्चे में भी पढने की आदत कभी विकसित नहीं हो पाती और नतीजा बहुत खराब होता है.
वजह जो भी हो लन्दन जैसे शहर के लिए साक्षरता का यह स्तर बेहद शर्मनाक होने लगा है. इससे जुडी संस्थाएं और अधिकारी इस बारे में खासे चिंतित नजर आने  लगे हैं .और इसे सुधारने की भरपूर कोशिशें की जा रही हैं .
उम्मीद है कि सारी दुनिया को अपने शेक्सपियर  की मिसालें देने वाला , सारी दुनिया के साहित्य पर अपनी धाक ज़माने वाला लन्दन अपने घर के बच्चों के साक्षरता स्तर को कुछ तो सुधार पायेगा . जिससे ऊपर बैठे शेक्सपियर  को ज्यादा शर्मशार ना होना पड़े .
तस्वीरें गूगल से साभार 

Thursday, 2 June 2011

मखमली आवाज़ और खुमार...

इंग्लिश समर की सुहानी शाम है,  अपोलो लन्दन के बाहर बेइन्तिहाँ  भीड़ है. जगजीत सिंह लाइव इन कंसर्ट है. "तेरी आवाज़ से दिल ओ ज़हन महका है तेरे दीद से नजर भी महक जाये " कई दिनों से हो रहा यह एहसास जोर पकड़ लेता है. हम अन्दर प्रवेश करते हैं. थियेटर के अन्दर बार भी है . देखा लोग वहां से बीयर के ग्लास और चुगना अन्दर तक ले जा रहे हैं. आमतौर पर मना होता है कुछ भी खाना पीना अंदर ले जाना या खाना ,पर यहाँ तो सभी भारतीय थे तो शायद कोई भी नियम कानून लागू नहीं था.हम जाकर अपनी सीट पर बैठ  जाते हैं और खुद पर गुस्साते हैं क्यों नहीं  कैमरा लाये यहाँ तो दनादन फ्लैश  चमक रही हैं. हमारे पूर्व के अनुभव के चलते हम सिर्फ बन ठन के हाथ हिलाते चले आये थे ( कैमरे का इस्तेमाल लाइव शो के दौरान मना होता है )पर अब पछताकर क्या होना था .इंतज़ार करते रहे एक सुहानी शाम के शुरू होने का .७ बजे का समय था ७-२५ हो गए थे और सामने स्क्रीन पर सिवाए २-३ विज्ञापन के कुछ भी नजर नहीं आ रहा था उसपर लोगों का मजे से बीयर उड़ाना और अपना कैमरा ना ला पाने की खुन्नस अब बैचैन किये दे रही थी.तो यह बैचैनी बाकी लोगों पर भी हावी हुई और थोडा शोर मचना शुरू हुआ. तब जाकर मंच पर एक कन्या प्रकट हुईं और ७-३५ पर उन्होंने शो का आगाज  किया.बस वो आखिरी पल था इंतज़ार का. उसके बाद एक पल भी सांस लेने की  फुर्सत नहीं मिली. इस ८ फरवरी को जगजीत सिंह ने ७० वर्ष और अपने गायन के पांच दशक पूरे कर लिए हैं.और इस उपलक्ष्य में इस वर्ष उनके ७० कंसर्ट करने की  योजना है, जिसके तहत यह लन्दन में उनका २७ वां कंसर्ट था.परन्तु ७० की ना तो इस गजल सम्राट की अवस्था लगती है ना ही उनका अंदाजे बयाँ और आवाज़....आसन ग्रहण करते ही वे शुरू करते हैं." ठुकराओ या प्यार करो मैं सत्तर का हूँ (मैं नशे में हूँ की  जगह ).और  तालियों की गडगडाहट  के साथ सुरों का यह सफ़र शुरू होता है.

फिर - " मेरे जैसे हो जाओगे जब इश्क तुम्हें हो जायेगा ....और झुकी झुकी सी नजर ....बस फिर क्या था नजर सबकी उठ चुकी थीं और खुमार चढ़ चुका था. उसके बाद ग़ालिब ग़ालिब की  आवाजें दर्शक दीर्घा से आने लगीं और फिर अपने मदमस्त अंदाज में जगजीत सिंह ने सुर छेड़ा....हजारों ख्वाइशें ऐसी ...पूरा हाल जैसे मंत्रमुग्ध  था .अपनी नई एल्बम के एक मुखड़े " दूरियां बढती गईं चिट्ठी का रिश्ता रह गया ,सब गए परदेस  ,घर में बाप तनहा रह गया " और पंजाबी गीत " लेके फुलवारी " से होता हुआ सुरों का कारवां चौंदहवी की रात तक पहुंचा ( कल चौंदहवी की रात थी.) श्रोताओं को सोचने का भी समय नहीं मिल रहा था. मैं अपनी प्लेलिस्ट के कुछ गीत उन्हें सुनाने की विनती करना चाहती थी परन्तु वे तो एक घूँट पानी पीने  के लिए भी नहीं  रुकने वाले थे .गजलों के बीच में बाकी वाद्यों  पर बैठे संगीतकारों की कारीगरी हो या फिर जगजीत के अपने अंदाज में चुटीली हास्य टिप्पणियाँ .माहौल जैसे उनके रंग में ही रंगे  जा रहा था. ७० वर्षीय इस अद्भुत गायक की यह क्षमता मुझे पल पल अचंभित कर रही थी.और इसी बीच २ घंटे जाने कब निकले और इंटरवल हो गया जिसमें जगजीत सिंह का जन्म दिन मनाया गया ,केक काटा गया, जो बाद में सभी दर्शकों के मध्य बांटा भी गया.
शो का दूसरा भाग १५ मिनट बाद ही शुरू हो गया वो भी " कागज़ की कश्ती " से, श्रोता जो अभी ब्रेक से उठ भी ना पाए थे अचानक फिर नौस्टोलोजिक हो उठे. फिर स्वर उठा, "तुमको देखा तो ये ख़याल आया."और इस स्वर के साथ इस स्वर सम्राट ने हाल में बैठे सभी को अपने साथ बहा लिया. पूरा हाल उनके साथ गा रहा था और वो सभी को गवा रहे थे .मैंने आजतक इतनी भीड़ को इतना सुरीला और मधुर गाते पहले कभी नहीं सुना. पूरा हाल तुम घना साया के खूबसूरत स्वरों से गूँज रहा था.और फिर ....होठों से छू लो तुम ....अब पता लगा कि अकेली मैं ही नहीं हूँ जो इस जादुई आवाज़ में पिघली जा रही हूँ.हर कोई जैसे मदहोश था.
...लकड़ी की काठी सुनने की उम्र में जिसे सुन कर मैं बावली  हो गई थी. ...एंड आई फ़ैल इन लव अगेन विथ हिम ,हिस वॉयस  एंड दिस  सौंग.जाने क्या है जगजीत सिंह  की आवाज में , उनके अंदाज में, कि जब यह भी नहीं पता था कि ग़ज़ल होती क्या है तब से उन्हें सुनकर अजीब सा सुकून महसूस होता है. जैसे कि जावेद अख्तर उनके लिए कहते हैं कि "जगजीत की आवाज ऐसी है जैसे कड़ी धूप में चलते चलते अचानक ठंडी छाँव मिल गई हो".
७० वर्ष में आज भी उनकी गायकी में वही बात है जो आज से ५० साल पहले थी.कहीं कोई उम्र का निशाँ तक नजर नहीं आता.कुछ तो खास है इस अद्भुत इंसान में जिसके लिए. गुलजार कहते हैं - "जगजीत की आवाज़ सहलाती है, एक दिलासा सा देती है .और उसकी गायकी में मुझे मेरे शेर भी अच्छे लगते हैं".
और इसी तरह जाने कितनी और सुरीली गजलों के साथ पंजाबी के टप्पों के साथ शाम को विराम दिया जगजीत सिंह ने . परन्तु श्रोताओं का मन कहाँ भरना था... बहुत निकले  मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले... "अहिस्ता अहिस्ता" का शोर होने लगा और जैसा कि जगजीत जी के बारे में मशहूर है कि वह अपने प्रसंशकों को कभी निराश नहीं  करते उन्होंने सुर छेड़ा ...सरकती जाये है रुख से नकाब....और इसी के साथ स्टेज पर तो पर्दा गिर गया परन्तु मेरे मन पर इस शाम की खुमारी का पर्दा गिरने का नाम ही नहीं ले रहा उनकी ही ग़ज़ल के एक शेर के मुताबिक.- 
आग का क्या है पल दो पल में लगती है . 
बुझते बुझते एक जमाना लगता है.
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