Friday, 28 October 2011

इतिहास की धरोहर "रोम"..



<span title=
इटली की राजधानी रोम - इस नाम से जूलियस सीजर नेरो जैसे कई नाम ज़ेहन में चक्कर लगाने लगते हैं.इतना कुछ है रोम में कि ना जाने कब से आपको इसकी यात्रा कराने के बारे में सोचा और हर बार यह सोच कर रुक गई कि कहाँ से शुरू करूँ और कहाँ ख़तम. अब जब लिखने बैठी हूँ तो शायद कई किश्त लग जाएँ परन्तु मेरी कोशिश रहेगी कि इस ऐतिहासिक नगरी के साथ थोडा सा न्याय कर सकूँ. विश्व की प्राचीनतम सभ्यता में से एक रोम.अपने नाम के साथ ही इतिहास के पन्नो की तरफ ले जाता है.कुछ वर्ष पहले जब इटली जाने का कार्यक्रम बनाया तो सोचा था रोम के लिए कम से कम ४ दिन तो निकाले जायेंगे.मेरी तमन्ना रोम की एक-एक दिवार पर पडी इतिहास की हर एक लकीर पढ़ लेने की थी.परन्तु हमेशा ऐसा थोड़े ना होता है जैसा कि आप सोचें.परिवार में मेरे अलावा किसी को इतिहास में रूचि नहीं. तो पहले तो इटली जाने के लिए ही उन्हें ब्लैक मेल करना पडा.वेनिस और पीसा के नाम के ललकारे देने पड़े और चूँकि रोम इटली की राजधानी है इसलिए उसे भी देख लेने की मेहरबानी करने के लिए वे तैयार हो गए परन्तु शर्त यह कि वेनिस, मिलान,फ्लोरेंस और पीसा के बाद बचे हुए सिर्फ २ दिन में जितना हो सकेगा रोम घूमा जायेगा. उसपर तुर्रा यह कि और भला चर्च और खंडहरों को कब तक निहारोगी ? खैर भागते भूत की लंगोटी भली. ये सोच हम रोम देखने के सपने सजाने लगे. <span title= इस भव्य नगर की स्थापना लगभग 753 ईसा पूर्व में हुई थी। और इसके बसने को लेकर एक बहुत ही चर्चित कहानी भी है .कि मंगल देवता के दो जुड़वां पुत्र थे - रोमुलस और रिमस। एक बार तेबर नदी में बाढ़ आने से ये दोनों बहते हुए पेलेटाइन पहाड़ी के पास पहुंच गए। इन बच्चों को एक मादा भेडि़या ने दूध पिलाया व एक चरवाहे ने दोनों को पाला। बड़े होकर इन दोनों भाइयों ने एक नगर की स्थापना की जिसका नाम रोमुलस के नाम पर रोम रखा गया व रोमुलस इसके सम्राट बने। <span title= इटली पहुँचने के लिए लन्दन से हमारी उड़ान मिलान की थी और फिर वहां से वेनिस और वेनिस से रोम हमें योरोस्टार (ट्रेन ) से पहुंचना था.यूँ यह ट्रेन काफी सुविधाजनक थी परन्तु पूरी इटली में एक समस्या बहुत विकट है वह यह कि वहां बस में चढो या ट्रेन में सिर्फ टिकट लेने से काम नहीं चलेगा उसे वहां लगी कुछ मशीनों पर वैलिडेट (पंच )भी करना पड़ेगा. वर्ना वो टिकट कोई मायने नहीं रखती.खैर असली समस्या यह नहीं थी , परेशानी तो यह थी कि यह सब अगर आप पहले से नहीं जानते तो वहां जाकर आपको कोई बताने वाला नहीं मिलेगा और भाषा की अनभिज्ञताकी वजह से वहां कुछ लिखा आप पढ़ नहीं पाएंगे.और अगर आप टिकट बिना वैलिडेट कराये बस या ट्रेन में पहुँच गए तो आपको कह दिया जायेगा कि टिकट वैलिड नहीं है.और अगर आपकी किस्मत अच्छी है तो कोई आपको समझाने वाला मिल जायेगा कि आपको करना क्या है.लेकिन जब तक आप समझ कर टिकट वैलिड कराने जायेंगे आपकी बस या ट्रेन छूट जाएगी.या फिर आपको जुर्माना भी भरना पड़ सकता है.खैर इस मामले में हमारी किस्मत अच्छी थी और कुछ ऐसा होता है ये हम कहीं नेट पर पढ़ चुके थे तो एक ही बार के झटके में हमें समझ में बात आ गई और आगे से यह काम सबसे पहले याद रखा गया. खैर शाम को करीब पांच बजे हम रोम के ट्रेन स्टेशन पर पहुंचे.और वहां पहुँचते ही एहसास हुआ कि हमारे भारतीय मित्र कितनी अफवाह उड़ाते हैं उन्होंने हमें कहा था कि रोम और नई दिल्ली में कोई फरक नहीं है. परन्तु स्टेशन से बाहर निकलते ही उनकी बात का मर्म हमें समझ में आने लगा. वाकई भारत के ही किसी बड़े शहर के जैसा माहौल था.वही छोटे छोटे खोमचे, फुटपाथ पर ही चादर बिछा कर सामान बेचते लोग और अपनी -अपनी कम्पनियों के पैकेज बेचने को बेताब ट्यूरिस्ट गाइड.मोलभाव करते हमारे पीछे पीछे भाग रहे थे. फर्क था तो बस इतना कि वे सारे भारतीय की जगह बंगला देशी थे. हालाँकि देखने से तो सारे साउथ एशियन एक जैसे ही लगते हैं.पर हमें फ़िक्र थी अपने होटल पहुँचने की जो कि शहर से कुछ बाहर था और हमें वहां तक पहुँचाने के लिए एक बस आनेवाली थी जिसका कि बताई हुई जगह पर कोई अता पता नहीं था.और उस तक पहुँचने में हमें काफी मशक्कत करनी पडी . इन सब समस्यायों को देखते हुए.और रोम के दर्शनीय स्थलों की संख्या देखते हुए सर्वसम्मत्ति से ये फैसला हुआ कि २ दिन का बस टूर ले लिया जाये.इससे बेशक समय की थोड़ी पाबन्दी रहेगी परन्तु कम समय में काफी कुछ कवर किया जा सकेगा.अत: वहीं एक बंगाली भाई से २ दिन का टूर बुक करा के हमने होटल के लिए प्रस्थान किया. दूसरे दिन उसी स्टेशन से हमारी रोम यात्रा शुरू हुई और सबसे पहला पड़ाव आया कोलेजियम. रोमन आर्किटेक्चर और इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट नमूना। इसकानिर्माण तत्कालीन शासक वेस्पियन ने 70-72वीं ईस्वी में प्रारंभ किया था, जिसे उनके बाद सम्राट टाइटस ने 80 ईस्वी में पूरा किया। 81 से 96 के बीचडोमीशियन के राज में कुछ और परिवर्तन किए गए। इसका नाम सम्राट वेस्पियन और टाइटस के पारिवारिक नाम फ्लेवियस के कारण एम्फीथिएटरम्‌फ्लावियम रखा गया परन्तु वर्तमान में यह कोलेजियम के नाम से ही प्रसिद्ध है. हालाँकि इसके अब खंडहर ही शेष हैं परन्तु इन खंडहरों को देख कर अनुमान लगाया जा सकता है कि इमारत कितनी विशालकाय और यहाँ होने वाली गतिविधियाँ कितनी भयावह रही होंगी. यहाँ योद्धा अपनी युद्ध कला का प्रदर्शन करते थे और यहाँ तक कि कई दिनों से भूखे रखे जंगली जानवरों से लड़कर उन्हें अपने कौशल का प्रदर्शन करना होता था.इन जानवरों को प्रतियोगिता स्थल तक लाने के लिए भूमिगत मार्ग का उपयोग किया जाता था.और फिर बुरी तरह से घायल और शहीद योद्धाओं को रखने की भी अलग व्यवस्था थी.कोलेजियम में घूमते हुए अक्सर ही लगता जैसे अभी उस द्वार से भूखे शेर निकल कर आयेंगे . वहां खड़े ज्यादातर दर्शकों के इस कल्पना मात्र से रौंगटे खड़े हो जाते थे. खैर वहां से राम राम करते बाहर निकले तो कुछ रोमन - "रोमन एंड कंट्री मेन" स्टाइल में(पारम्पारिक रोमन वेश भूषा) बाहर घूम रहे थे, और लोग उनके साथ तस्वीरें खिचवा रहे थे. जाहिर है ये मौका हम भी नहीं खोना चाहते थे तो उचक कर पहुँच गए और बत्तीसी निकाल कर खड़े हो गए. फोटो लिया गया और जैसे ही हम धन्यवाद कह कर हटे उसने हमें पकड़ लिया और बोला फीस निकालो. हमने कहा कहाँ लिखा है ? तो महाशय बोले ३० डिग्री की गर्मी में ये लबादा लादे हम यहाँ फिर रहे हैं पागल नहीं हैं. फोटो खिचवाने के पैसे हैं. वो देने पड़ेंगे .पर हम अड़ गए कि ऐसा कहीं लिखा नहीं है. और आपने पहले कहा भी नहीं था. इसलिए हम तो नहीं देंगे पर वो जोर जबरदस्ती पर उतर आया और कहने लगा कि फिर फोटो डिलीट करो हमने कहा ठीक है कर देते हैं और उसे फोटो डिलीट करके दिखा दी. अब वह अपनी जीत पर गर्व करता चला गया परन्तु उसे यह नहीं पता था कि उसका पाला हिन्दुस्तानियों से पडा था.जो उस ज़माने में ज्ञानी कहलाते थे. जिस ज़माने में उसके पूर्वजों को मुँह भी धोना नहीं आता था.असल में हमने उसे जो डिलीट करके दिखाया था वो वीडियो रेकॉर्डिंग था और उसके बाद का स्टिल फोटो हमारे कैमरे में सही सलामत था :). रोम में एक रोमन को चकमा देकर हम पहुंचे वहीं पास के एक महल में जहाँ के खंडहर में भी भव्यता और एश ओ आराम झलक रहा था.सभ्यता के आरम्भ में भी उस महल में प्रयोग होने वाला मार्बल किसी उच्च कोटि के मार्बल से ज्यादा अच्छा प्रतीत होता था. और यह सिद्ध भी कर दिया हमारे साथ की गाइड ने,वहीं एक जगह पर एक ग्लास पानी डाल कर. पानी पड़ते ही उस जगह एक धूल पड़े पत्थर की जगह बेहद खूबसूरत,रंगीन और चमकदार नजर आने लगा वैसे यहाँ यह कहना भी आवश्यक होगा भवन निर्माण हो या मूर्ति कला रोम की अपनी एक अलग ही पहचान है.जगह जगह लगे हुए स्टेचू इतनी सूक्ष्म मानवीय शारीरिक बनावट का नमूना हैं कि देखने वाला दांतों तले उंगली दबा लेता है.अभी तक मैंने भारत का कोणार्क हो या फ्रांस का लौर्व ज्यादातर जगह मूर्तियों,प्रतिमाओंया चित्रों में स्त्री को ही कलात्मक रूप में देखा था परन्तु रोम में ( पूरे इटली में ही ) इसके इतर पुरुष के नग्न स्टेचू दिखाई पढ़ते हैं जो वहाँ के मूर्तिकार की कारीगरी,मानवीर शरीर संरचना विज्ञान और उच्च कलात्मकता को बताते हैं. सुविनियर के तौर पर भी इसी तरह की मूर्तियों की वहां सर्वाधिक बिक्री होती देखी जातीहै. रास्ते में रोम की पुरातन दीवार और और बहुत से कलात्मक स्मारकों से गुजरते हुए हमारा अगला पड़ाव था वैटिकन सिटी. --क्रमश:

Thursday, 20 October 2011

गट्ठे भावनाओं के


जब भी कभी होती थी
संवेदनाओं की आंच तीव्र
तो उसपर 
अंतर्मन की कढाही चढ़ा
कलछी से कुछ शब्दों को 
हिला हिला कर
भावों का हलवा सा 
बना लिया करती थी
और फिर परोस दिया करती थी
अपनों के सम्मुख
और वे भी उसे 
सराह दिया करते थे
शायद  मिठास से 
अभिभूत हो कर ,
पर अब उसी कढाही में 
वही बनाने लगती हूँ
तो ना जाने क्यों
आंच ही नहीं लगती
थक जाती हूँ 
कलछी चला चला कर
पर  लुगदी भी नहीं बनती अब
और बन जाते हैं 
गट्ठे भावनाओं के
जिन्हें किसी को  परोसने की 
हिम्मत नहीं होती मेरी
इंतज़ार में हूँ कि 
कोई झोंका आकर बढ़ा जाये
कम होती आंच को
तो इन गट्ठों  को गला कर
परोस सकूँ अपनों के समक्ष

Thursday, 13 October 2011

कहाँ जा रहे हैं हम ???


तीन मध्यम वर्गीय १६- १७ वर्षीय  बालाएं आधुनिक पश्चिमी पोशाक , एक हाथ में स्टाइलिस्ट बैग्स और दूसरे में ब्लेक बेरी.इस काले बेरी  ने बाकी सभी मोबाइल को छुट्टी पर भेज दिया है आजकल. स्थान -महानगर की मेट्रो . शायद किसी कोचिंग क्लास में जा रहीं थीं या फिर आ रहीं थीं.पर उनकी बातों में कहीं भी लेश मात्र भी पढाई या उससे सम्बंधित किसी भी विषय का कोई सूत्र नहीं था.सीट पर बैठी एक बाला ने ही बात छेड़ी- 
ए सुन - हूम  आर यू गोइंग आउट विथ? नाओ अ डेज ?
जबाब दूसरी वाली ने दिया - अरे इसका मत पूछ यार ..शी इज सो लकी. गोट अ हैंडसम फैलो दिस टाइम 
पहली - अच्छा..पर तेरा वो पहले वाला भी तो अच्छा था यार. रिच भी था.
अब जबाब तीसरी ने दिया - हाँ अच्छा था .पर अजीब था यार. उसे कहीं चलने को कहो तो मना कर देता था .फिर मैं किसी ओर के साथ डिस्क चली जाती थी तो वहां पहुँच जाता है .देयर वाज नो प्रायवेसी एट ऑल .मैं तो नहीं रह सकती ऐसे.
दूसरी - मेरा वाला तो मस्त है.
पहली - हाँ यार समझ में नहीं आता ये लोग इतने पज़ेसिव क्यों हो जाते हैं? कौन सा इनसे शादी करनी है यार. 
आस पास इतनी भीड़ में कोई उनकी बात सुन भी सकता है इससे बेखबर बिंदास वे तीनो अपनी चर्चा में मशगूल थीं.
आप सोच रहे होंगे कि किसी नाटक का किस्सा आपको सुना रही हूँ .मुझे भी एक पल को यही लगा था कि शायद कोई नाटक या सपना देख रही हूँ.यहाँ वहां देखा भी सभी अपनी अपनी बातों में मशगूल थे. और मेट्रो की आवाज़ में ज्यादा दूर तक तो बात सुनाई भी नही दे सकती थी .तभी मेरी नजर मेरी बराबर की सीट पर बैठी महिला पर पड़ी वो मंद मंद मुस्करा रही थी अब वह उन लड़कियों की बात पर मुस्करा रही थी या मेरे चेहरे के हाव भाव पर ये मुझे नहीं पता .पर मुझे एहसास हुआ कि मैं कोई कल्पना नहीं कर रही ये वार्ता साक्षात मेरे सामने चल रही है.
और मैं सोच रही थी सच में समय बदल गया है. और ये लडकियां व्यावहारिक हैं.क्यों करें शादी ? आखिर क्या मिलेगा शादी करके? एक जिम्मेदारी भरा परिवार, कैरियर की श्रधांजलि, और एक पज़ेसिव पति.फिर जरुरत ही क्या इस झंझट की.अपना कमाएंगे, खायेंगे , और मस्त जिन्दगी जियेंगे ,कोई रोकने टोकने वाला नहीं. आखिर क्यों वे अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारें.शादी के बाद की  जिन्दगी उनके वर्तमान स्टाइल से तो मैच करने से रही, फिर क्यों बिना वजह ओखली में अपना सर देना.
यही मानसिकता हो गई है आज हमारे आधुनिक महानगरीय समाज की. आर्थिक जरूरतों की पूर्ति के लिए आज स्त्री और पुरुष दोनों का धन अर्जित करना जरुरी है और इन परिस्थितियों में शादी के बाद घर की जिम्मेदारी कौन संभाले, ये सवाल उठ खड़ा होता है. कुछ समझदार लोग तो मिलजुल कर बाँट भी लेते हैं पर फिर समस्या आती है बच्चों की. अपनी  अपनी व्यस्तताओं के चलते बच्चों की जिम्मेदारी उठाने की हिम्मत उनकी नहीं होती.जहाँ रोज की भागम- भाग जिन्दगी में उनके पास आपस में दो घड़ी बिताने का वक़्त नहीं वहां बच्चे को कौन देखेगा.तो वह बच्चे की जरुरत को ही नकार देते हैं. हर रिश्ता किसी ना किसी जरुरत पर ही टिका होता है यह एक सामाजिक और मानसिक सत्य है.फिर जहाँ ना आर्थिक निर्भरता है किसी पर , ना भावात्मक और ना ही सामाजिक या पारिवारिक तो फिर किस आधार पर कोई रिश्ता जीवित रहे. और यही वजह है,कि वर्तमान परिवेश में शादियाँ टूटते वक़्त ही नहीं लगता.आखिर क्यों कोई बिना किसी बजह के एक दूसरे  से समझौता करें. मैं ही क्यों? तू क्यों नहीं? की भावना रिश्ते की शुरुआत में ही हावी हो जाती है और नतीजा - या तो आज के युवा शादी ही नहीं करना चाहते , और जो कर लेते हैं उन्हें उसे तोड़ने में वक़्त नहीं लगता.तो क्या आपस के स्वार्थ कि बिनाह पर धीरे धीरे समाप्त हो जाएगी यह विवाह की व्यवस्था?.
अब चाहें तो हम इसे पश्चिमी समाज का असर कह सकते हैं .परन्तु मुझे नहीं लगता कि पश्चिमी समाज में कभी भी या आज तक भी विवाह या फिर बच्चों की पैदाइश को नकारा गया हो. हाँ रिश्तों को लेकर उन्मुक्तता जरुर है परन्तु रिश्तों की महत्ता भी कायम है .बेशक लिव इन रिलेशन शिप है परन्तु बच्चों की जिम्मेदारी से मुँह नहीं मोड़ा जाता.यूँ ही अपनी हर समस्या का ठीकरा हम पश्चिमी सभ्यता के सर पर नहीं फोड़ सकते.
जैसे पश्चिमी समाज की तर्ज़ पर हम भी नारी वाद का झंडा लेकर खड़े हो गए. जबकि उनकी और हमारी नारी वादी समस्याओं में कभी कोई ताल मेल था ही नहीं.उनकी समस्याएं अलग थीं और हमारी अलग.
देखा जाये तो स्त्रियों के सम्मान को लेकर हमारे भारतीय समाज में कभी कोई दो राय नहीं रहीं. आदि काल से ही जब से मानव ने समाज की व्यवस्था की, सुविधा के अनुसार व्यवस्था को दो भागों में बाँट लिया गया - पुरुष के हिस्से बाहर का काम आया और स्त्री के हिस्से घरेलू .कहीं, किसी के काम को लेकर कोई मन मुटाव नहीं था. किसी का काम कमतर या नीचा नहीं माना जाता था.दोनों ही पक्ष सम्मानीय थे.फिर हमने आर्थिक विकास करने शुरू किये और धन की लोलुपता बढ़ने लगी और समस्या यहीं से शुरू हुई .जब हर सफलता और योग्यता का मापदंड उसके आर्थिक अर्जन से होने लगा. घर में काम करने वाली स्त्री के योगदान को नकारा जाने लगा उसका अपमान किया जाने लगा. और धीरे धीरे स्त्री के स्वाभिमान ने आग पकड़ी और उसने भी आर्थिक निर्भरता की बिनाह पर अपनी योग्यता को सिद्ध करने की ठान ली. और फिर समस्या उत्पन्न हुई  तालमेल की.अंग्रेजों के साथ आई अंग्रेजी नारीवाद की आंधी ने भारतीय स्त्रियों को भी प्रभावित किया और शुरू हुआ आधुनिकता का नया दौर. जिसमें कहीं भी किसी भी रिश्ते के लिए जगह नहीं थी .जरुरी था तो सिर्फ अर्थ अर्जन. स्त्री बाहर निकली तो उसे मिला नया आयाम , सामाजिक सम्मान. और परिणाम स्वरुप घरेलू  स्त्रियों को अयोग्य करार दे दिया गया. घरेलू  स्त्रियों में अपने काम और शिक्षा को लेकर हीन भावना घर करने लगी . और आज यह हालात है कि "हाउस वाइफ" शब्द "गुड फॉर नथिंग" जैसा  समझा जाता है . आर्थिक रूप से संबल स्त्री आज हर तरह से सक्षम है .अत: वह किसी भी तरह का शोषण या समझौता बर्दाश्त करने को तैयार नहीं. उसे हर हाल में हर स्थान पर पुरुषों  के बराबर का वर्चस्व चाहिए जिसके वह काबिल है और वह लेकर भी रहती है.पर इन सब बदलाव के एवज में हमें मिल रहे हैं बिखरे परिवार, असंवेदनशील रिश्ते,मर्यादाओं का हनन.
एक समय था जब हम सभ्य नहीं थे, सामाजिक नहीं थे. किसी तरह की कोई परिवार नाम की व्यवस्था हमारे समाज में नहीं थी.हम जानवरों की तरह जिससे चाहे सम्बन्ध बनाते थे और अपनी इच्छाओं और जरुरत की पूर्ति के बाद भूल जाते थे . क्या हम फिर जा रहे हैं उसी पाषाण युग की ओर.?? या फिर यह परिवेश है बदलते वक़्त की मांग और व्यावहारिकता.???.इसका फैसला तो वक्त ही करेगा.




नवभारत.12oct2011 में प्रकाशित,


Monday, 10 October 2011

तेरे साथ ही मेरी दीवानगी गई...


“शब्-ए फुरक़त का जागा हूँ , फरिश्तों अब तो सोने दो ,

कभी फुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता आहिस्ता...”

कभी सोचा नहीं था कि इस पोस्ट के बाद यह श्रद्धांजलि इतनी जल्दी लिखूंगी. अभी इसी साल जून की तो बात है जब जगजीत सिंह का लन्दन में कंसर्ट था और वहां उनका ७० वां जन्म दिन मना कर आई थी उनके जन्म दिन का केक खा कर आई थी जो वहीँ स्टेज पर काटा था उन्होंने. यूँ तो उनका कार्यक्रम लगभग हर साल ही होता था और लगभग हर देश में होता था .परन्तु मेरा दुर्भाग्य कि कभी भी, कहीं भी उसमें शामिल होने का मौका नहीं मिला. हर साल किसी न किसी वजह से बस मन मार कर रह जाना पडा.परन्तु इस बार शायद कोई शक्ति थी जो मुझे उस ओर खींच रही थी. और मैंने अपना फैसला सा सुना दिया था कि इस बार कोई जाये साथ न जाये मैं तो जा रही हूँ और मेरा इतना कडा रुख देख पतिदेव भी बिना हुज्जत किये मेरा साथ देने को तैयार हो गए थे. आज सुबह-सुबह मेल देखने के लिए नेट खोला तो उनके ना रहने की दुखद खबर मिली.तब से उस कन्सर्ट के वो ऐतिहासिक पल नजरों से आंसू बन टपक तो रहे हैं परन्तु लुप्त होने का नाम नहीं ले रहे.रह- रह कर उनकी छवि और उनका आत्मिक ,सुकून देने वाला स्वर मन मस्तिष्क पर हावी हो रहा है. स्टेज पर बैठ तीन घंटे तक उसी कशिश और जोश के साथ लगातार गाने वाले वाले उस सुगठित देह और आकर्षित व्यक्तित्व को देखकर कौन सोच सकता था कि कुछ ही महीनो में वो इस दुनिया से विदा ले लेगा.खुद उन्होंने भी कहा था कि अपने ७० वर्ष पूरे करने के उपलक्ष्य में वे दुनिया भर में इस साल अपने ७० कंसर्ट करेंगे.उस स्वर सम्राट को शायद मुझ जैसे ही किसी दीवाने की नजर लग गई. जो उस पूरी शाम उसे निहारती रही थी और ऊपर वाले की इस नियामत पर फक्र किये जा रही थी.
जगजीत सिंह वह इंसान था जिसने अपने स्वर और आवाज़ से आम श्रोता को ग़ज़ल से रु ब रू कराया."कागज की कश्ती" के माध्यम से उन्हें बचपन लौटाया, "होटों से छू लो से"- मोहब्बत करना सिखाया यहाँ तक कि "आखिरी हिचकी तेरे जानू पे आये ,मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ."से  उसे रोना और मरना भी सिखाया. यह वो इंसान था जिसने ग़ज़ल को खास लोगों की महफ़िल से उठाकर आम लोगों के बीच खड़ा किया.और दुनिया का कोई भी संगीत प्रेमी उनके इस ऋण से कभी भी उऋण नहीं हो सकेगा.
मेरे लिए तो ग़ज़ल का मतलब सिर्फ और सिर्फ जगजीत सिंह थे. मेरी आँखों से अगर कभी भी पानी निकला तो उसका कारण सिर्फ और सिर्फ जगजीत सिंह के गीत थे.और उनकी ही गायकी में मैंने ग़ालिब को समझना सीखा.
आज गजल की दुनिया का यह सम्राट हमारे बीच नहीं परन्तु उनकी आवाज़ की वो खनक, वो अंदाज ए बयाँ , लफ्जों की वो खुमारी मेरी दुनिया में हमेशा एक सौगात बनकर बसी रहेगी.
उन्होंने हमेशा अपने चाहने वालों के लिए गाया. हमेशा अपने चाहने वालों का मान वे अपने कार्यक्रमों में रखा करते थे और आज शायद यही वो कह रहे हैं अपने चाहने वालों से.
थक गया मैं करते करते याद तुझको.
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ.

Thursday, 6 October 2011

स्वप्न, परी और प्रेम.

नादान आँखें.


बडीं मनचली हैं 
तुम्हारी ये नादान आँखें 
जरा मूँदी नहीं कि 
झट कोई नया सपना देख लेंगी. 
इनका तो कुछ नहीं जाता 
हमें जुट जाना पड़ता है 
उनकी तामील में 
करना पड़ता है ओवर टाइम . 
अपने दिल और दिमाग की
 इस शिकायत पर 
आज रात खुली आँखों मे गुजार दी है मैने. 
न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी. 
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सोन परी 
नानी कहा करती थी 
सात समुंदर पार 
दूर देश में परियाँ रहतीं हैं 
जो पलक झपकते ही 
कद्दू को गाड़ी और 
चूहों को दरबान बना देतीं हैं 
इसलिये अब 
हर सुनहरे बालों वाली लड़की को 
मुड़ कर देखती हूँ 
शायद वही निकले मेरी सोन परी.
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(तुर्गेनैव के उपन्यास आस्या, प्रथम प्रेम और बसंती झरना पर आधारित.) 


त्रासद प्रेम 


तुर्गेनैव  कहते थे 
प्रेम त्रासद भावना  है
फिर चाहे वो अस्या का हो 
जिसने एक मन मौजी से किया 
या फिर हो जिनायदा का, 
एक शादी शुदा पुरुष से प्रथम प्रेम 
या सानिन का प्रेम हो 
एक क्रूर ,छली जेम्मा से.
मेरे ख्याल से तो ऐसी 
बेबकूफ़ियों  का अंजाम 
त्रासद ही होना था.

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