Tuesday, 29 November 2011

जीना यहाँ.. मरना यहाँ ..

*सिर्फ एक पंक्ति फेसबुक की दिवार पर - "मैंने अपनी महिला मित्र को छोड़ दिया. अब मैं आजाद हूँ." और नतीजा... उस लडकी ने शर्मिंदगी और दुःख में आत्महत्या कर ली.
*एक बच्ची ने फेस बुक पर एक इवेंट डाल दिया .कल उसका जन्म दिन है सभी को आमंत्रण .दूसरे दिन हजारों की संख्या में उसके घर आगे उपहार लिए लोग खड़े थे. माता पिता ने किसी तरह बच्ची को घर से बाहर भेज कर उस भीड़ से छुटकारा पाया.
यहीं नहीं इस जैसे हजारों उदाहरण आजकल रोज देखने में आते हैं.सिर्फ कहीं लिखीं चंद पंक्तियाँ जिन्दगी लेने और देने का सबब बन जाती हैं.और इन सबका जरिया है सोशल नेटवर्किंग साइटें. कौन कहाँ है, किसके साथ है , क्या कर रहा है , क्या खा रहा है , कौन सी पौशाक खरीदी.किसको पाया , किसको छोड़ा सब कुछ सबको पता है.कहीं कोई निजता की जरुरत नहीं.ये सोशल नेटवर्क नाम के जाल ने लोगों को इस कदर घेर लिया है कि उसके बाहर उन्हें दुनिया दिखाई ही नही देती. यश ,अपयश, सफलता ,असफलता,प्रेम, विछोह सब यहीं से शुरू होकर यहीं पर समाप्त हो जाता है.उनके लिए जो यहाँ नहीं है वह इस दुनिया में ही नहीं है.इन्हीं साइट्स पर जोडियाँ बनती हैं, उनकी खुशियाँ भी यहीं मनाई जाती हैं, और सभी घर वाले हों या मित्र यहीं इन्हीं खुशियों में शामिल होते हैं और फिर यहीं रिश्ते टूट भी जाते हैं और यह भी घरवालों को इन्हीं साइट्स पर आये स्टेटस से ही पता चलता है.
गए वक़्त की बातें लगती हैं.जब कहा करते थे कि बेटी के मन के भाव माँ उसकी एक झलक से पहचान लेती है. अब तो उन भावों की थाह पाने के लिए उसे बेटी के फेस बुक या ट्विटर जैसे किसी अकाउंट पर जाना पड़ता है.यूँ बुरा नहीं .एक झलक की जगह एक क्लिक....
सोशल नेट्वोर्किंग - आज के इलेक्ट्रोनिक मीडिया के सन्दर्भ में एक ऐसा माध्यम जो एक विस्फोट की तरह सामने आया है.और अपने साथ हर एक को बहा ले गया है..आज की नेट उपयोगिता आज से १० वर्ष पूर्व हो रही नेट की उपयोगिता से एकदम भिन्न है.यह एक प्रति व्यक्ति संवाद की ऐसी प्रजनन भूमि तैयार करता है जो इससे पहले कभी संभव नही थी.सोशल नेटवर्किंग हर एक व्यक्ति के लिए है और हर एक के बारे में है. यह मानवीय सामाजिक विकास की वृद्धि में एक क्रांतिकारी कदम है.मानव इतना सामाजिक कभी ना रहा होगा जितना कि अब हो गया है.
फेस बुक, माय स्पेस , ट्विटर,ब्लॉग जैसी नेट्वर्किंग साइट्स ने लोगों को जिस तरह अपनी गिरफ्त में लिया है वह मात्र निजी विचारों के आदान प्रदान तक सिमित नहीं है बल्कि वह किसी भी तरह के अभियान को सफल करने में या उसे पलट कर रख देने में भी सक्षम है. जहाँ एक और अन्ना के अभियान से जुड़ कर ये साइट्स उसे अखिल भारतीय अभियान बना देती हैं. एक ऐसा अभियान जिससे पहली बार इतनी बड़ी संख्या में युवाओं को जुड़ते देखा गया. एक ऐसा अभियान जिसने सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया.कोई राम लीला मैदान में अन्ना के साथ हो या ना हो पर इन साइटों पर हर कोई अन्ना की टोपी लगाये दिख रहा था और भले ही हाथ में समोसा पकडे लिखा हो पर स्टेटस पर लिखा था अन्ना के साथ हमारा भी व्रत है.
वहीँ दूसरी और यही सोशल नेटवर्क साइट्स लन्दन में दंगों का कारण भी बनती हैं.ब्लेक बेरी, फेक बुक और ट्विटर में टैग और सीधे सन्देश के माध्यम से पल पल की खबर यहाँ से वहां पहुँचाने की सुविधा ने लन्दन को ३ दिन तक दंगों की भीषण आग में सुलगाये रखा एक ऐसा नजारा जो इससे पहले नजदीकी दिनों में कभी देखा नहीं गया और जिसका अंदाजा तक लन्दन पुलिस को नहीं था.
हालाँकि यह भी सच है कि इस तरह के दंगे या अभियान उस समय भी हुआ करते थे जब कि इन सोशल साइट्स का अस्तित्व नहीं था.लन्दन में हुए दंगे बेशक बढ़ती बेरोजगारी की वजह से हुए हों तब भी उसमें इजाफा करने का और इन्हें फ़ैलाने का कार्य इन सोशल नेटवर्क साइट्स के माध्यम से अवश्य किया गया. जिस तरह तुनेशिया या ईजिप्ट की क्रांति भले ही लम्बे समय से चली आ रही तानाशाही और भ्रष्ट व्यवस्था का परिणाम हों परन्तु उस आग को भड़काने में इन साइट्स पूरा पूरा सहयोग अवश्य कहा जायेगा.
वहीँ लन्दन के पुलिस के सहायक आयुक्त Lynne ओवेन्स के गृह मंत्रालय को दिए गए वक्तव्य के मुताबिक इन्हीं साइट्स की बदोलत पुलिस ने ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट और ओलम्पिक साइट्स पर दंगे होने से रोका. और दंगों के बाद इन्हीं साइट्स की बदोलत ग्रुप बनाकर लोगों ने शहर की सफाई में भी अनुकरणीय योगदान दिया.
इन सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने युवाओं को तो इस कदर प्रभावित किया है कि आज इनसे अलग उन्हें किसी का अस्तित्व ही नजर नहीं आता. ये साइट्स जहाँ एक और इन युवाओं को इनके व्यक्तित्व, सामाजिक विकास और आत्म विश्लेषण और आत्म कौशल दिखाने के सहज और सरल मौके देती हैं. उतनी ही उनकी हताशा, निराशा और असफलता का कारण भी बनती देखी जाती हैं.जहाँ एक और अकेलेपन से जूझते किसी युवा के सामने दोस्ती और रिश्तों के ढेरों विकल्प ये साइट खोलती हैं तो इन्हीं की वजह से मौत जैसे चरम अंजाम तक भी पहुंचा सकती है..यानि जीना यहाँ ,मरना यहाँ और इसके सिवा नहीं कोई जहाँ..
*अभी लन्दन में कुछ उदाहरण देखने में आये कि एक स्कूल का एक अध्यापक नकली आई डी बना कर इन्हीं सोशल साइट्स पर अश्लील आपत्तिजनक तस्वीरें भेजा करता था इसी क्रम में एक तस्वीर भूलवश अपने एक छात्र को भी भेज बैठा और पकड़ा गया तथा स्कूल से उसे निष्काषित कर दिया गया और मासूम बच्चों का भविष्य बच गया.
*वहीँ कुछ स्कूली छात्रों को कोई एक अध्यापिका पसंद नहीं थी उन्होंने उसे नापसंद करने वालों का एक ग्रुप ऐसी ही एक साईट पर बना लिया और वहां उसी को लेकर छात्रों के विचारों का लेन देन होता है .कोई आश्चर्य नहीं कि आने वाले किसी दिन ऐसे ही तथ्यों के आधार पर उस बेचारी अध्यापिका का स्कूल निकाला हो जाये आखिर मकसद तो छात्रों की संतुष्टि और हित का ही है.यानि कि किसी का भविष्य बनाना / बिगाड़ना हो या सरकार गिरानी हो अब सब कुछ इन्हीं सोशल नेटवर्किंग साइट्स की मेहरबानी पर टिका है.
पूरे ब्रह्माण्ड को एक क्लिक की आवाज पर सामने ला खड़ा कर देने वाली ये सोशल नेटवर्किंग साइट्स मानवीय सोच को भी एक क्लिक तक ही सीमित कर देने की भी क्षमता रखती हैं.जहाँ इनसे बाहर कोई जिन्दगी नजर नहीं आती. बहरहाल तकनीकी क्षेत्र में जब जब भी बदलाव आया है अपने साथ सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही पहलू लेकर आया है. सोशल नेटवर्क नाम के इस समुन्द्र मंथन से भी विष और अमृत दोनों ही निकले हैं. अब समस्या यह है कि इस युग में शिव कहाँ से आये जो सम्पूर्ण विष को अपने कंठ में उतार ले और समाज के लिए बचे सिर्फ अमृत. --

Tuesday, 22 November 2011

धुंआ धुंआ जिंदगी...

हथेली की रेखाओं में
कभी सीधी कभी आड़ी सी
पगडंडी पर लुढ़कती कभी
बगीचों में टहलती
बारिश बन बरसती
कभी धूप में तपती
नर्म ओस सी बिछती तो
कभी शूल बन चुभती
झरने सी झरती कभी
नदिया सी बहती रहती
मेज पे रखे प्याले से
कभी चाय सी छलकती.
ग़ज़ल सी कहती कभी
कभी गीतों पे थिरकती .
रातों के गहरे साये में
परछाई सी चलती
कोयले सी जलती कभी
तो कभी राख बन उड़ती
हर पल निगाहों पे पर्दा डाले
धुआं धुआं सी जिन्दगी.

Monday, 14 November 2011

रूहानी प्यार "रॉक स्टार"

वहमों गुमान से दूर दूर ,यकीन की हद के पास पास,दिल को भरम ये हो गया कि ........जी नहीं मैं ये अचानक सिलसिला की बात नहीं कर रही हूँ .वरन ना जाने क्यों जोर्डन और हीर का प्रेम देख ये पंक्तियाँ स्मरण हो आईं. जोर्डन जो हीर से प्यार करना चाहता है सिर्फ इसलिए क्योंकि हीर दिल तोड़ने वाली मशीन है और उसे अपना दिल तुडवाना है क्योंकि बिना दिल टूटे हुए संगीत की झंकार नहीं निकल सकती.पर ना जाने कब ये प्यार उनकी रूह में बसता जाता है, दिल कतरा कतरा पिघलता जाता है, हर सीमा से परे, हर जरुरत से दूर, रूह से रूह का रिश्ता.
बहुत समय बाद कल सिनेमा हॉल पर जाकर एक फिल्म देखी .हालाँकि इतनी ठण्ड में गर्म लिहाफ से निकल रणवीर कपूर की फिल्म देखने जाना मुझे नागवार गुजर रहा था परन्तु इम्तिआज अली का नाम और फिल्म के गीत मुझे सिनेमा की तरफ ठेल रहे थे.यूँ फिल्म शुरू होने तक यही लगता रहा कि कहीं पैसे ना बर्बाद हो जाएँ.परन्तु शुक्रिया इम्तियाज अली साहब का ऐसा कोई भी पछतावा हमें नहीं हुआ बल्कि बड़े समय बाद एक अच्छी फिल्म देखी तो सोचा आपके साथ भी बाँट ली जाये.
चलिए अब बात करते हैं रॉक स्टार की, एक ऐसी फिल्म जिसे देखते आप स्क्रीन पर हैं. पर एहसास होता है एक क्लासिक उपन्यास पढने का.जैसे एक एक दृश्य एक एक पन्ने की तरह पलटता जाता है और आपके मन में प्रवेश करता जाता है.एक गंभीर कहानी की और बढ़ती फिल्म रोचक और चुस्त संवादों की वजह से कहीं बोझिल नहीं होती.हाँ अंत आते आते एक बार को लगने लगता है. अरे ये क्या...फिर वही लैला मजनू की कहानी, वही एक दुसरे की बाँहों में दम तोड़ते प्रेमी फिर वही नाटकीय अंत ?..लेकिन नहीं.. यहाँ एक बार फिर कहानीकार बाजी मार ले जाता है और एक बहुत ही तार्किक और अलग मोड़ पर कहानी का समापन होता है.
यूँ सफ़ेद चादर के अन्दर हीर और जोर्डन का एक अलग दुनिया में मिलने का बिम्ब अनोखा है और बेहद प्रभावशाली है.
जोर्डन की भूमिका के साथ रणवीर कपूर ने अपनी क्षमता से बढ़कर न्याय किया है .कहीं यह एहसास नहीं होता कि इसकी जगह कोई और होता तो शायद बेहतर होता.रणवीर कपूर ने बेफिकर दीवानगी और रूहानी मोहब्बत को बहुत ही शिद्दत से निभाया है और कहीं भी अपने पिता ऋषि कपूर के मजनू वाले किरदार की छाप उसमें नजर नहीं आती.
वहीँ हीर के तौर पर नर्गिस फकीरी बला की खूबसूरत लगीं हैं. इतनी कि हाथ ना लगना, मैली हो जाएगी.हो भी क्यों ना आखिर किंग फिशर के कलेंडर से निकली हैं. यूँ संवाद अदायगी में, और हीर के किरदार के साथ न्याय करने में उन्नीस सी साबित होती प्रतीत होती हैं. पर अपनी खूबसूरती के बल पर इन सारी कमियों को नर्गिस ढांप ले जाती हैं.फिल्म के बाकी पात्र भी अपनी अपनी भूमिका में उपयुक्त लगते हैं.
फिल्म में कहानी के अलावा एक और बेहद मजबूत पक्ष है - फिल्म का गीत संगीत - सभी गीत बेहद खूबसूरत हैं "तुम हो पास मेरे", और "नादान परिंदे" ..जैसे गीत जिन्हें सुन- देख कर अनुमान लगाना मुश्किल होता है कि इनके बोल ज्यादा बेहतर हैं या सुर? फिल्मांकन ज्यादा आकर्षक है या गायकी ?
वहीँ खूबसूरत दृश्यों को कैमरे में उतारने में कैमरा मेन ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी..कश्मीर की अप्रतिम वादियाँ हो या प्राग का धुला धुला सा प्राकृतिक सौन्दर्य सभी जैसे छन -छन कर कैमरे में समाता गया है.
उस पर किरदारों के लिबास पर भी खासी मेहनत की गई है. दिल्ली के स्टीफंस कॉलेज में पढने वाली हीर और कश्मीरी पंडित की बेटी हीर के लिबासों में बेहतरीन तालमेल बैठाया गया है. कश्मीरी फिरन में लिपटी हीर के लिबासों में २००९ के किंगफिशर कैलेंडर की नर्गिस की छवि को भुनाने की कतई कोशिश नहीं की गई है.
कुल मिलाकर रणवीर कपूर के ना चाहने वालों के लिए भी. रॉक स्टार एक must watch फिल्म है.
हिंदी सिनेमा के इस दौर में जहाँ फिल्म में कहानी के नाम पर रेशेसन आया हुआ है ,इम्तियाज अली ने एक मास्टर पीस बनाया है और वे निसंदेह बहुत सी बधाई और हिंदी फिल्म दर्शकों की तरफ के एक बड़े वाले थैंक्स के हक़दार हैं.

Tuesday, 8 November 2011

पगडंडी की तलाश

अपनी कोठरी के छोटे से झरोखे से देखती हूँ
दूर, बहुत दूर तक जाते हुए उन रास्तों को.
पक्की कंक्रीट की बनी साफ़ सुथरी सड़कें
खुद ही फिसलती जातीं सी क्षितिज तक जैसे
और उन पर रेले से चलते जा रहे लोग
अनगिनत, सजीले, होनहार,महान लोग.
मैं भी चाहती हूँ चलना इसी सड़क पर
और चाहती हूँ पहुंचना उस क्षितिज तक
पर नहीं जाना चाहती उसी एक राह से
शामिल होकर उसी परंपरागत भीड़ में
जो चल रहे हैं न जाने कितनो का सर
अपने अहम् के पाँव तले कुचल कर
रौंद कर अस्तित्व अनेक मासूमो का
यूँ खुद को ऊँचा दिखाने की ख्वाइश में
मिटा देते हैं फिर कोई लंबी लकीर
अपनी छोटी लकीर को लंबा करने की खातिर
मुझे उस सड़क तक पहुँचने के लिए
अपनी अलग पगडण्डी की तलाश है.

Wednesday, 2 November 2011

इतिहास की धरोहर "रोम".(.पार्ट २ )

बचपन से सामान्य ज्ञान की पुस्तक में पढ़ते आये थे कि दुनिया का सबसे छोटा देश है "वेटिकेन सिटी " तब लगता था छोटे से किसी द्वीप या पहाड़ी पर छोटा सा देश होगा.पर ये कभी नहीं सोचा था कि एक देश के अन्दर क्या बल्कि एक शहर के अन्दर ही ये अलग देश है.करीब ४४ हेक्टेयर में बना हुआ कुल ८०० लोगों की आबादी वाले इस देश का अपना राजा है, इसकी राजभाषा है लातिनी । ईसाई धर्म के प्रमुख साम्प्रदाय रोमन कैथोलोक चर्च का यही केन्द्र है, इस साम्प्रदाय के सर्वोच्च धर्मगुरु पोप का यही निवास स्थान है और उन्हीं की यहाँ सत्ता है, अपने अलग कानून हैं.यहाँ तक कि अपना अलग रेडियो स्टेशन, अपनी अलग मुद्रा है और अपना अलग पोस्ट ऑफिस भी. जो अपनी डाक टिकट तक अलग बनाते हैं.यहाँ तक कि ज्यादातर रोम वासियों द्वारा इटालियन डाक सेवाकी जगह वेटिकन डाक सेवा इस्तेमाल की जाती है क्योंकि ये ज्यादा तेज़ है..वेटिकेन सिटी अपने खुद के पासपोर्ट भी जारी करती है जिसे पोप, पादरियों ,कार्डिनल्स और स्विस गार्ड के सदस्यों ( जो इस देश में मिलिट्री फ़ोर्स की तरह काम करते हैं) को दिए जाते हैं.और इतना सब होने पर भी यह कोई अलग देश नहीं लगता .रोम के अन्दर ही बस एक अलग सा केंद्र लगता है एक वृहद और बेहद खूबसूरत प्रतिमाओं से सजा एक कैम्पस.
जिस दिन हम वेटिकेन सिटी पहुंचे, रविवार था. और वहां खास प्रार्थना का आयोजन था जिसमें हिस्सा लेने के लिए महँगी टिकट के वावजूद लम्बी लाइन थी. अन्यथा चर्च में आम लोगों का प्रवेष निषेध था .परन्तु म्यूजियम खुला हुआ था. हममे से किसी को भी ना तो धर्म में, ना ही प्रार्थना में इतनी रूचि थी कि महँगी टिकट लेकर २ घंटे की लाइन में लगते अत: फैसला हुआ कि यहाँ दोपहर का खाना त्याग कर लाइन में लगने से बेहतर है कि म्यूज़ियम देखकर ही निकल लिया जाये और बाकी का दिन रोम की बाकी जगह देखने में बिताया जाये.तो हम भव्य प्रतिमाओं को निहारते हुए और बाहर खड़े गार्ड्स के साथ तस्वीरें
खिचवाते हुए म्यूजियम में पधारे जहाँ की भव्यता देख कर पहली बार एहसास हुआ कि वाकई किसी अमीर राज- घराने में आ पहुंचे हैं.खैर म्यूजियम तो बहुत ही बड़ा था पर उसका छोटा सा चक्कर लगा कर हम निकल आये और सोचा कि अब कुछ खाने का जुगाड़ किया जाये.
पिछले कुछ दिनों से इटली के अलग अलग शहरों में घूमते हुए पिज्जा, पास्ता और पनिनी ही खा रहे थे. अब चूँकि राजधानी रोम में थे और अब हम रोम की मुख्य सड़क पर खड़े थे, माहौल कुछ कुछ अपने देश जैसा ही लग रहा था. अत: एक आशा हुई कि शायद कोई दाल रोटी वाला भारतीय भोजनालय मिल जाये.परन्तु हमारा ये कयास भी गलत साबित हुआ. इटली में उनका ही भोजन इतना प्रसिद्ध है कि किसी और देश के व्यंजनों की शायद गुंजाइश ही नहीं.हाँ कुछ एक चीनी रेस्टोरेंट्स जरुर दिखाई दिए पर भारतीय के नाम पर एक -दो बांग्लादेशियों के रेस्टोरेंट्स ही नजर आये जहाँ अपनी किस्मत अजमाने से अच्छा हमने और एक दिन पिज्जा पर बिताना ही बेहतर समझा.या फिर क्यों ना उन खास
सजावटी बेहद खूबसूरत आइस क्रीम पर हाथ अजमाया जाये जिनकी म्यूजियम जैसी दुकाने उस सड़क के हर कोने में उसी तरह दिखाई पढ़ रही थीं जैसे इटालियन ब्रांड और डिजाइनर सामानों के छोटे- बड़े शो रूम्स.शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो उनके आकर्षण से अछूता रहता हो.दुनिया भर के जितने फ्लेवर आप सोच सकते हो आपको वहां मिल जाते हैं.औरे वहां टहल रहे हर यात्री के हाथ में एक खूबसूरत कोन दिखाई पढ़ जाता है.खैर कीवी,रम,वाइल्ड बैरी, मेलन, जैसे अलग अलग फ्लेवर की आइसक्रीम लेकर हम पहुंचे कुछ ऐसी विचित्र सी सीढ़ियों पर जिन्हें यूरोप की सबसे व्यापक सीढियां कहा जाता है.ये नीचे "पिआजा दे स्पंगा" से ऊपर चर्च "त्रिनिता दे मोंटी को जोड़ती हैं. क्योंकि इन्हें स्पेन की एम्बेसी को चर्च से जोड़ने के लिए बनाया गया था इसलिए शायद इसका नाम स्पेनिश स्टेप्स है.एकदम खड़ी चढ़ाई पर चढ़ती हुई इन १३८ सीढ़ियों को एक फ़्रांसिसी राजनयिक ने विरासत में मिले धन से बनवाया था.खैर स्वादिष्ट आइस क्रीम से मिली ऊर्जा को ३२ डिग्री की गर्मी में इन सीढ़ियों पर चढ़कर एक चर्च को देखने में गवाने का हमारा मन ना हुआ और हमने वहां से कूच किया कुछ दुकानों की तरफ
कि आखिर इटली आयें और कुछ गुच्ची या अरमानी जैसे ब्रांड की चीजें ना लीं तो क्या खाक इटली आये? परन्तु ये नाम सिर्फ नाम के बड़े ही नहीं दाम के भी बड़े हैं. और शायद इटली की दुकानों से सस्ते लन्दन की दुकानों में मिल जाते हैं. अत: उन्हें सिर्फ निहार कर कुछ निराश से जब हम बाहर सड़क पर निकले तो एक बार फिर हमारे निराशा में डूबे मन को उबारा कुछ अपने ही तरह के लोगों ने. उन बांग्लादेशियों ने जो वहां सड़क पर ही एक चादर पर सभी प्रसिद्ध इटालियन ब्रांड का सामान लगाये बेच रहे थे. वो भी कौड़ियों के दाम और बिलकुल अपने देशी स्टाइल में. जैसे ही किसी पुलिस वाले को देखते, तुरंत सभी सामान चादर में लपेट ऐसे घूमने लगते जैसे कोई पर्यटक ही हों. उनके जाते ही फिर से अपना बाजार लगा लेते और ग्राहकों को पटाने लगते. हालाँकि वह सामान हमें दिल्ली के पालिका बाजार जैसा ही लगा परन्तु दिल के बहलाने को ग़ालिब ये ब्रांड अच्छा है. की तर्ज़ पर हमने भी कुछ खरीद लिया और पहुंचे

रोम के सुप्रसिद्ध त्रेवी फाउन्टेन पर.
२६ मीटर उंचा और २० मीटर चौड़ा ये रोम का सबसे ब
ड़ा और दुनिया का सबसे प्रसिद्ध फव्वारा है.फव्वारे में जो प्रतिमा है वह सागर के देवता नेपच्यून की है. जो सीपी और २ समुद्री घोड़ों के रथ पर सवार हैं.इनमें से एक घोड़ा शांत और आज्ञा कारी है और दूसरा अशांत. जो कि सागर के मूड को दर्शाते हैं.यह फव्वारा रोम वासियों के पीने के पानी की आपूर्ति के लिए बनाया गया था परन्तु अब इसे चखने की कोशिश भी नहीं कीजियेगा क्योंकि अब यह पानी सलोरीन और अन्य रासायनिक पदार्थों का सागर है.इस फव्वारे के बारे में एक किवदंती भी प्रचलित है कि जो इसमें सिक्का डालता है वह दुबारा रोम जरुर आता है. रोम अभी काफी देखना बाकी था परन्तु समय अभाव ने हमें भी उस फव्वारे में एक सिक्का डालने पर मजबूर कर दिया इस आशा में कि किवदंतिया भी किसी ना किसी आधार पर ही बनती होंगी.शायद इस सिक्के के बहाने हमारा दुबारा रोम आना संभव हो ही जाये. इसी आशा के साथ हमने एक सिक्का आँख बंद करके उस इच्छाधारी फव्वारे में डाला और फ्लोरेंस के लिए निकल पड़े .

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