रद्दी पन्ना -
सफ़ेद कोरे पन्ने सी थी मैं जिस पर जैसी चाहे
इबारत लिख सकते थे तुम
पर तुमने भी चुनी काली स्याही
पर भूल गए तुम
उन काले शब्दों को उकेरना होता है
बेहद एहतियात से
तनिक स्याही बिखरी नहीं कि
शब्द बदल जाते हैं धब्बों में
और फिर वह पन्ना
जो सज सकता था किसी पुस्तक में
रह जाता है बस एक रद्दी बनकर
जिसमें सिर्फ
मूंगफलियाँ लपेटी जा सकती है.
माचिस -
दोष तुम्हारा नहीं जान
तुमने तो वही किया
जो दस्तूर था
चाहा अपना भला
सोचा अपने लिए
और बन गए घी का दीया
गुनाह तो मेरा था
जो खुद को भुला
बन गई डिब्बी माचिस की
और जली तीली तीली तेरे लिए.
वापसी -
यूँ चलते चलते तेरे साए में
राह से मिटा डाले कदमो के छापे भी
जो उन्हीं के सहारे वापस जा सकती
अब तो ढूँढनी होंगी नई राहें
तलाशने होंगे जरिये
जोड़ना होगा सामान
फिर से सफ़र के लिए
यूँ तो उसी मंजिल पर लौटना
अब आसां ना होगा.

teeno ek se badhkar ek.. :) :)
ReplyDeleteall is good but the last one is best..... तलाशने होंगे जरियेजोड़ना होगा सामान फिर से सफ़र के लिए यूँ तो उसी मंजिल पर लौटना अब आसां ना होगा....bahut khub likha hai aapne :)
ReplyDeleteबहुत सुन्दर..
ReplyDeleteसभी कवितायेँ लाजवाब.
विचार और चिंतन के धरातल पर तीनो कविताएँ ठीक है. महज भावुकता ही नहीं है यहाँ, यथार्थ की स्वीकारोक्ति भी है.
ReplyDeleteतीनो रचनाये शानदार भावों को संजोये।
ReplyDeleteएक बात बताइए भई.... आप अपनी तरह ही सुंदर क्यूँ लिखतीं हैं?
ReplyDeleteदोष तुम्हारा नहीं जान
तुमने तो वही किया
जो दस्तूर था
चाहा अपना भला
सोचा अपने लिए
और बन गए घी का दीया
बहुत ही गहरी पंक्तियाँ हैं....
कम आआआल है....
जय हो ...
ReplyDeleteबहुत खूबसूरत क्षणिकाएं ।
ReplyDeleteलेकिन ये मन में उपजी कैसे ! !
तीनों रचनाएँ बहुत भावपूर्ण और लाज़वाब...
ReplyDeleteबेहद खूबसूरत तीनो क्षणिकाएं...
ReplyDeleteयूँ ही कभी कभी दिल में
कुछ बाते उठती हैं
और बन जाती हैं
एक खूबसूरत कविता ... अनु
दर्शन का सम्पुट , क्षणिकाओ को विशेष बना रहा है . चिंतन के धरातल पर यथार्थ का उल्लेख , खूबसूरत .
ReplyDeletebahut bahut bahut khoob
ReplyDeleteaapki soch kamal hai sunder bhav sunder shbd badhai
rachana
bahut khoob.
ReplyDeleteशब्द लिखने के प्रयास में स्याही फैल जाती है, उसे एक कला का रंग दे दें हम सब।
ReplyDeleteतीनों ही अच्छी रचनाएं हैं.
ReplyDeleteTeeno rachanayen ek se badhke ek hain! Maza aa gaya!
ReplyDeleteसर्दिया उदास होती है सुना था पर इसकी कोहरे की नमी मौसम के साथ कविताओं में महसूस कर रही हूँ .....
ReplyDeleteसभी अच्छी हैं. दूसरी मुझे अधिक अच्छी लगी तीनों में.
ReplyDeleteसुन्दर भावाभिव्यक्ति है आपकी
ReplyDeleteइसके लिए आभार
http://vicharbodh.blogspot.com
भावपूर्ण रचनायें साथ ही नया कलेवर अच्छा लगा
ReplyDelete- शुभकामनायें
कुछ सुना-सुना सा लगा.. कुछ गुनगुनाया सा, ऐसा लगा कि ये क्षणिकाएं चुपके से कोइ कानों में फुसफुसाकर कह गया हो.. पीछे मुडकर देखा तो कोइ नहीं था..शायद ठंडी हवा थी, गुनगुना कर चली गयी!! और छोड़ गयी एक स्पंदन!!
ReplyDeleteजो सज सकता था किसी पुस्तक में
ReplyDeleteरह जाता है बस एक रद्दी बनकर
जिसमें सिर्फ
मूंगफलियाँ लपेटी जा सकती है.
......................................................................
बहुत सी संवेदनशील कविताऐं, आभार कि संवेदना के उच्च शिखर पर जा कर इसे महसूस किया और फिर शब्दों की सुन्दर बगीया बना दी। बहुत दिनों बाद आना हुआ, अफसोस है। जारी रखिए ताकि हिन्दी साहित्य को इसी तरह की उंचाई मिलती रहे।
सादर।
तीनों रचनाएँ बहुत लाज़वाब| आभार|
ReplyDeleteआपके शब्द स्वयं तो स्पंदित होते ही हैं,पढने वाले को भी स्पंदित कर जाते हैं |
ReplyDeleteबहुत ही खुबसूरत रचनाये.....
ReplyDeleteतीनो ही रचनाएँ बेहद सारगर्भित और यथार्त्वादी दृष्टिकोण से रूबरू होती, खास कर तीसरी कविता मुझे बेहद ही अच्छी लगी.. शुभकामनाएँ ! सादर नमन !
ReplyDeleteमूंगफलियाँ लपेटी जा सकती है.
ReplyDeleteमूंगफलियाँ ही क्योँ ???
यूँ तो उसी मंजिल पर लौटना
अब आसां ना होगा.
बात तो सही है .....लेकिन कोशिश करके देखिये ..उससे भी अच्छी मंजिल मिल सकती है .......!
सफ़ेद कोरे पन्ने सी थी मैं
ReplyDeleteजिस पर जैसी चाहे
इबारत लिख सकते थे तुम
पर तुमने भी चुनी काली स्याही ... aur ab khoj rahe ho syaahi sokhnewala kagaj ...sari rachna kshnik , per gahri
अतिसुन्दर,
ReplyDeletevaah kitnee sundar bhavabhivyakti hai in kavitaon me ..umda ..
ReplyDeleteबेहतरीन आभार
ReplyDeleteएक गहन सोच से निकली तीनो क्षणिकाएं ...!!
ReplyDeleteबहुत सुंदर .
Teeno kavitayen ek se badhkar ek hain....bhavpoorn, saargarbhit aur paripoorn kavitayen...
ReplyDeleteShubhkamnayen...kavitaon ki taraf vapasi ke liye....
Saadar...
Deepak..
सर्दी के मौसम में मूंगफली ही याद रही ... पुडिया में लिपटी हुई ...
ReplyDeleteतीली तीली जल किया दिए को रौशन ..बहुत संवेदनशील क्षणिका ..
लौटते कदम मंजिल तक वापस नहीं आते बस राहें ही मिलती हैं ...
तीनों क्षणिकाएं गहन भावों को समेटे हुए ..
"रद्दी पन्ना" तो पहले पढ़ चुका हूँ और अपने अभिप्राय से भी अवगत कराया है । "माचिस" और "वापसी" दोनों ही अति-लघु कविताओं ने बहुत प्रभावित किया । "माचिस" में 'घी का दीया' प्रतीक के मिस पुरुष की स्वार्थपरक अहम्मन्यता को अंतर्तम तक पहुँच कर चुनौती दी है । तिल-तिल तीली-तीली मिटकर एक स्त्री अपना सर्वस्व निछावर कर जिस पुरुष को सभी के सम्मान का दर्ज़ा हासिल कराती है वही पुरुष उसे सामान्य मनुष्यता की श्रेणी में भी रखने को तैयार नहीं दिखता, इसी संतप्त करते सच को प्रकट करती सशक्त रचना है यह ! 'वापसी'में "अब ढूंढनी होंगी नई राहें...उसी मंज़िल पर लौटना अब आसाँ न होगा" पंक्तियाँ बहुत सहज लगीं । कब तक आखिर स्त्री आज़माइशों के दौर से गुजरती रहे, अग्निपरीक्षाओं पर खरी उतरती रहे ? ऐसी किसी भी मंज़िल पर न चल सक्ने की असमर्थता व्यक्त करती नारी का दृष्टिकोण बहुत भाया ! अभिनन्दन शिखा जी, इतने कम शब्दों में इतनी सच्ची और अच्छी बातें बनाना हर किसी के लिए संभव नहीं होता !
ReplyDeleteतीनों रचनाओं में गजब के भाव।
ReplyDeleteबेहतरीन।
तीनों क्षणिकाएं बेहतर .....
ReplyDeleteहर जगह पुरुष है ..अपने अहम् के साथ.
हर जगह स्त्री है ...शिकायतों के साथ....
अस्तित्व की पहचान का संकट पुरानी समस्या है.
उसके संरक्षण की ज़द्दोजहद के साथ हर जगह शिखा जी भी हैं....
शिखा जी ! आप क्रांतिकारी हैं क्या ?
ज़बरदस्त!!!! तीनों की तीनो!!!!
ReplyDeleteसोचने को मजबूर करती रचनाएँ ....
ReplyDeleteशुभकामनायें आपको !
माचिस की तीली सी जली तेरे लिए ...
ReplyDeleteकोरा कागज़ रद्दी बांटे देर कितनी लगती है ...
उन्ही राहों पर भी चले मगर मंजिल वही अब कहाँ ...
सभी बेहतरीन!
यु ही कभी -कभी ऐसा भी होता हैं ....बहुत ही सुंदर क्षणिकाए ...पेश करने का अंदाज भी जुदा ..
ReplyDeleteगहन सोच से निकली तीनो क्षणिकाएं ...!
ReplyDeleteयह निराशा के भाव क्यों? भारत में स्त्री को मातृ-स्वरूप मानते हैं जिसमें सारी दुनिया को बदलने और संस्कारित करने की क्षमता होती है।
ReplyDeleteउम्दा...
ReplyDeleteबेहतरीन..
क्या कहने हैं.....
हर शब्द बोल रही है...
क्या कहूँ शब्दों की कमी है..
बहुत हो गया.........
अब:)))))
वाह शिखा जी.. रद्दी पन्ना और माचिस तो बेहतरीन कृतियाँ हैं..
ReplyDeleteबेहद भावनात्मक...
प्यार में फर्क पर आपके विचार ज़रूर दें..
एक अच्छी रचना के लिए ढेर सारी बधाइयाँ |
ReplyDeleteएक से अधिक बेहतरीन रचना एक बार में पोस्ट नहीं करनी चाहिए, यह ब्लॉगिंग का असूल है, वरना किस पर कमेंट करें किसको छोड़ें का प्रश्न सामने खड़ा हो जाता है ...
ReplyDeleteहम तो बस लाजवाब कहेंगे और बधाई देंगे।
खूबसूरत कवितायें... तीनों की तीनों
ReplyDeleteतीनों रचनाएं बेहद सशक्त. ये चाँद शब्द बहुत गहरे अर्थ रखते हैं...
ReplyDeleteजोड़ना होगा सामान
फिर से सफ़र के लिए
यूँ तो उसी मंजिल पर लौटना
अब आसां ना होगा.
शुभकामनाएं.
बेहतरीन कविता बधाई शिखा जी
ReplyDeleteVapsi aur machis ... Bahut kuch sochne pe majboor karti hain ... Lajawab .....
ReplyDeleteSORRY DIOSA,
ReplyDeleteAPKO IS MOOD MAIN ACCEPT NAHI KAR SAKTE HAM, PLZ ............
हर वह चीज जिसे हम यूँ ही देख कर नजरअंदाज कर देते हें उसको अगर इस शिद्दत से लिखा और पढ़ा जाय तो फिर वो कुछ और ही बन जाता है. रद्दी कागज और माचिस की डिब्बी बहुत सुंदर प्रस्तुति .
ReplyDeleteवाह ....तीनों क्षणिकाएं ..बेहतरीन हैं ।
ReplyDeletebahut achi lagi kavitayen....
ReplyDeleteबढिया हैं तीनों कवितायें.
ReplyDeleteवाह जी वाह...क्या माहौल बना है....बेहतरीन!!
ReplyDeleteउन काले शब्दों को उकेरना होता है
ReplyDeleteबेहद एहतियात से
तनिक स्याही बिखरी नहीं कि
शब्द बदल जाते हैं धब्बों में
और फिर वह पन्ना
जो सज सकता था किसी पुस्तक में
रह जाता है बस एक रद्दी बनकर
wah! kya shabda hain. kuchh hi shabdon men pura jeevan darshan. badhai.
वाह वाह वाह
ReplyDeleteक्या कवितायें है!
ReplyDeleteवाह क्या कवितायें हैं। :)
ReplyDeleteये ऊपर वाला अनामी कमेंट भी हमारे माउस से ही छिटककर भाग गया था। सबर नहीं कमेंट तक को!
सुन्दर और स्पष्ट भाव
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर और सार्थक कविता
यूँ चलते चलते तेरे साए में
ReplyDeleteराह से मिटा डाले कदमो के छापे भी
जो उन्हीं के सहारे वापस जा सकती
अब तो ढूँढनी होंगी नई राहें
तलाशने होंगे जरिये
जोड़ना होगा सामान
फिर से सफ़र के लिए
यूँ तो उसी मंजिल पर लौटना
अब आसां ना होगा.
सारगर्भित पोस्ट है भुत सुन्दर|
सभी कवितायेँ बेहतरीन
ReplyDeleteशनिवार 14-1-12 को आपकी पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
ReplyDeleteधन्यवाद!
आपकी कवितायेँ आपके संस्मरणों से कतई उन्नीस नहीं ....कई भावों को स्फुरण दे दती हैं.... हाय रे .....
ReplyDeleteWah....adbhut...bahut khub...
ReplyDeletewww.poeticprakash.com
bahut gahrai hai aapki kavitaon mein
ReplyDeleteतीनों एक से बढ़कर एक ! बहुत सुन्दर !
ReplyDeleteभावपूर्ण लाजबाब प्रस्तुति,बढ़िया अभिव्यक्ति,क्षणिकाए अच्छी लगी.....
ReplyDeletenew post--काव्यान्जलि : हमदर्द.....
कई बार अनुरोध के बाद आप मेरे पोस्ट पर नही पहुची,क्या यही शिष्टाचार है,ब्लॉग जगत का,..
तनिक स्याही बिखरी नहीं कि
ReplyDeleteशब्द बदल जाते हैं धब्बों में
.....
और जली तीली तीली तेरे लिए.
......
यूँ तो उसी मंजिल पर लौटना अब आसां ना होगा.
...
शिखा जी की कलम कुछ लिखे और वो सोंचने पर मजबूर न करे ऐसा हो ही नहीं सकता.
तीनों लघु कवितायेँ सशक्त !!
तीनो रचनाये बहुत ही लाजवाब है
ReplyDeleteबेहतरीन अभिव्यक्ति
माचिस की तीली सी जली तेरे लिए..अनुपम भावो से सजी कविता दर्द के दरिया से गुजरती है और उसका एहसास कराती है.
ReplyDeleteतनिक स्याही बिखरी नहीं कि
ReplyDeleteशब्द बदल जाते हैं धब्बों में...
bahut khoob...aabhar
wow!!!!!!!!!! first tym i read article in spandan blog.........i really like it alot!!!!....frn now...i vl b regular reader.......n share my thots tooo.......!!!!!
ReplyDeleteदेखन में छोटन लगे.. घाव करे गंभीर। तीनों कविताएं पसंद आईं
ReplyDeleteवाह-वाह
ReplyDeleteकागज़ पर जज्बा-ए-दिल बहुत ही ख़ूब-सूरत अंदाज़ से लिखा है/
http://rhythmvyom.blogspot.com/
.
ReplyDeleteबहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति, बधाई.
पधारें मेरे ब्लॉग पर भी और अपने स्नेहाशीष से अभिसिंचित करें मेरी लेखनी को /
तीनो रचनाये बहुत ही लाजवाब है
ReplyDeleteबेहतरीन अभिव्यक्ति
kammal ka likha hai......
ReplyDeleteteeno kavitaye bahut hi sundar avm prbhavshali abhivykti ke sath ....abhar shikha ji.
ReplyDeleteसभी एक से बढकर एक!
ReplyDeleteतीनों कविताएँ वास्तविकता दर्शाती है...सुन्दर प्रस्तुति!
ReplyDeleteAGNI SHIKHA WALI KAWITA..SABHAAR
ReplyDeleteआपकी किसी पोस्ट की चर्चा है नयी पुरानी हलचल पर कल शनिवार 21/1/2012 को। कृपया पधारें और अपने अनमोल विचार ज़रूर दें।
ReplyDeleteगहन भावों ले भरी कविता मन को आंदोलित कर गयी । पोस्ट अच्छा लगा । मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद .
ReplyDeleteओह! बेहतरीन कविताएँ.
ReplyDeleteएक से एक लाजबाब.
आपकी कवितायें आपके स्पंदनों
को इतना मृदुल कर देती हैं
कि आपके ब्लॉग से वापिस
जाने का मन नही करता.
पर मजबूरी है.अब आप मेरे ब्लॉग
पर आईयेगा अपने मृदुल स्पंदनों का
विस्तार करने के लिए.ताकि मैं
अपने ब्लॉग पर भी रह सकुं
शब्द बदल जाते हैं धब्बों में
ReplyDeleteऔर फिर वह पन्ना
जो सज सकता था किसी पुस्तक में
रह जाता है बस एक रद्दी बनकर
जिसमें सिर्फ
मूंगफलियाँ लपेटी जा सकती है.
लाजवाब। सुन्दर कविता के लिये बधाई।
'Vaapsi' aur 'raddi panna' pasand aaee... ek arse ke baad ('buzz' ke baad)aaj spandan par aana achchha laga...
ReplyDeleteइतने गहरे एहसास...
ReplyDeleteइतनी सुन्दर अभिव्यक्ति!
वाह!