Monday, 30 January 2012

मियाँ की जूती मियाँ के सिर.

अभी तक नस्लवाद का इल्जाम पश्चिमी विकसित देशों पर ही लगता रहा है.आये दिन ही नस्लवादी हमलों के शिकार होने वालों की खबरे आती रहती हैं. कभी ऑस्ट्रेलिया से, तो कभी ब्रिटेन से तो कभी अमेरिका से. पर क्या कभी आपने सुना या सोचा कि अंग्रेज़ भी कभी इस नस्लवाद का शिकार हो सकते हैं.कुछ अजीब लगता है ना ? पर आजकल यही समाचार सुर्ख़ियों में है. लन्दन में मशहूर एक सेंडविच कंपनी पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि वह ब्रिटेन वासियों को अपने यहाँ नौकरी नहीं देती.उनकी अर्जी बिना विचार के ही ख़ारिज कर दी जाती है.और ब्रिटेन में इस प्रसिद्द चैन दुकान में जहाँ पौलेंड, स्वीडन, इटली ,नेपाल हर जगह के लोग हैं वहां केवल  १ या २ ही ब्रिटिशर्स ( ब्रिटेन में पैदा होने वाले ) दिखाई देते.उस पर भी उनका कहना है कि उनके साथ वहां पक्षपात किया जाता है.बेशक वहां अंग्रेजी ही काम की भाषा है पर वह कम ही बोली जाती है.उन्हें एक बाहरी इंसान की तरह वहां महसूस होता है.
जबकि इस कम्पनी का कहना है कि ऐसा कुछ नहीं है.उनके पास ब्रिटिशर्स की बहुत कम अर्जियां आती हैं.और जो आती हैं वे उनमें काम के जरुरी घंटों के प्रति लचीलापन कम होता है.
असल में समस्या यह है कि बाहर से आये लोगों में अंग्रेजो के मुकाबले काम के प्रति ज्यादा समर्पण देखने में आता है वे अपना कार्य ज्यादा निष्ठा से करते हैं और कम कीमत पर करते हैं. वहीँ अंग्रेज पहले तो इस तरह के कामों में रूचि ही नहीं रखते और यदि करना भी पड़े तो इस न्यूनतम कीमत पर तो कभी तैयार नहीं होते.पहले इस तरह की समस्या इसलिए नहीं थी कि आर्थिक हालात ठीक थे.उन्हें काम करने की जरुरत ही महसूस नहीं होती थी.और इतिहास गवाह है कि यदि काम करना ही पड़े वे सिर्फ प्रवन्धक / संचालक ही बनना चाहते हैं उससे नीचे के काम करना ही वह नहीं चाहते.और करें भी क्यों जन्म से लेकर बुढ़ापे तक सरकार उन्हें पालती है.और काम ना मिले तो घर बैठे रोजगार भत्ता भी देती है.फिर उन्हें क्या जरुरत है कि कॉफ़ी शॉप में जाकर सेंडविच बनायें.पर अब हालात बदल गए हैं आर्थिक मंदी के चलते बहुत से भत्ते बंद कर दिए गए हैं.अत: काम करना तो अब मजबूरी है परन्तु मानसिकता इतनी जल्दी नहीं बदलती.अत: जाहिर है बाहर के लोगों के मुकाबले ब्रिटिशर्स काम के प्रति कम जोशीले और कम निष्ठावान साबित होते हैं. 
पर भला अपनी कमजोरियों को कब कोई मानता है. यह कोई समझने को तैयार नहीं कि जब अपने लोग काम करना ही नहीं चाहते तो उन्हें काम मिलेगा कैसे.यूँ यह समस्या शायद हर देश के महानगर की भी है.जहाँ काम की तलाश में बाहर से लोग आते हैं.इसे मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में भी मैंने महसूस किया .जहाँ दिल्ली में ज्यादातर जगहों पर दूरस्थ उत्तर पूर्वी राज्यों के युवाओं को ख़ुशी से संतुष्टि पूर्वक,मेहनत और निष्ठा से काम करते देखा क्योंकि अपने घर से बाहर आकर वहां रहने के लिए काम करना उनके लिए जरुरी है .वहीँ खुद दिल्ली के युवा अपनी रंगीनियों में डूबे अपने लायक रोजगार ना मिलने की दुहाई देते दिखे और मुंबई में बाहर राज्यों से आने वालों के काम के प्रति रोज ही कुछ ना कुछ सुनने में आता ही रहता है.बहुत साधारण सी बात है, कि हर व्यापारी अपनी कंपनी में निष्ठावान, मेहनती, खुशमिजाज,फ्लेक्सिबल  और सस्ता कर्मचारी चाहता और उसे जहाँ भी यह सब कम कीमत पर मिलता है वह उसे काम देता है. ब्रिटेन और अमेरिका सरीखे देशों में भी यह बात काफी समय से सुनने में आती रही है कि दूसरे देशों से आये हुए लोग सभी नौकरियां पा जाते हैं जबकि अपने ही देश के युवक बेरोजगारी की समस्या से जूझते रहते हैं.आर्थिक मंदी के इस दौर में यह समस्या बढती ही जा रही है.और इसका सारा दोष बाहरी नागरिकों पर थोप दिया जाता है. तो क्या वाकई नस्लवादी अब खुद इसके  शिकार हो रहे हैं ? या जरुरत है उन्हें अपनी सदियों से चली आ रही मानसिकता बदलने की .वक़्त को समझने की, यह समझने की कि प्रतियोगिता के इस युग में सिर्फ इतना काफी नहीं कि आप एक विकसित देश में या महानगर में पैदा हुए हैं .जरुरी है काम करना और लगन और निष्ठा से काम करना.जरुरत है समय के अनुसार वर्क कल्चर को समझने की.

66 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

इतना काफी नहीं कि आप एक विकसित देश में या महानगर में पैदा हुए हैं .जरुरी है काम करना और लगन और निष्ठा से काम करना.जरुरत है समय के अनुसार वर्क कल्चर को समझने की.

यही तो समझना नहीं चाहते लोग .. सार्थक मुद्दा उठाया है .. वैसे हमें लगता था कि यह भारत में ही होता है ..विकसित देशों में भी यह समस्या आ रही है ..

Sonal Rastogi said...

लक्ष्य और प्रेरणा
ये दो बातें है जो इंसान को काम करने का बढावा देती है ,जब घर से दूर निकल कर बहार आतें है तो आँखों में एक सपना होता है ,और परिवार को सुख देने की इच्छा ,बस दिन रात को भुलाकर काम में जुट जाते है , नए शहर में बसर करने के लिए रोज़गार की ज़रुरत होती है तो बस शुरुवात कर देते है ...अच्छा मुद्दा'

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

काम को पूजा जबतक नहीं समझेंगे लोग, तब तक काम को ओहदे से जोडते रहेंगे.. ओहदे से जोडेंगे त ओ काम के बड़े-छोटे का भेद सामने आएगा, फिर इंसानों के बड़े-छोटे की समस्या आएगी.. मुम्बई में बिहारियों के साथ और दिल्ली में प्रवासियों के साथ यही समस्या है.. जब तक सुई और तलवार का अलग अलग महत्व लोग नहीं समझेंगे, तलवार से बटन टाँकने की कोशिश होती ही रहेगी और इसमें निराशा होने पर आक्रोश भी होगा ही!!
बहुत ही सामयिक आलेख!!

रश्मि प्रभा... said...

sahi aalekh

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

वाह वाह

Pallavi said...

वाह!!! क्या सही उदहारण दिया है बिहारी जी ने...
जब तक सुई और तलवार का अलग अलग महत्व लोग नहीं समझेंगे, तलवार से बटन टाँकने की कोशिश होती ही रहेगी और इसमें निराशा होने पर आक्रोश भी होगा ही!!
यही सच है बहुत ही सार्थक बात....सारगर्भित आलेख ...

अरुण चन्द्र रॉय said...

सार्थक मुद्दा उठाया है .. बहुत ही सामयिक आलेख!!

वन्दना अवस्थी दुबे said...

आती हूं शिखा, अभी तो बस देख के जा रही हूं :)

शिवम् मिश्रा said...

एक सामयिक आलेख + एक सार्थक मुद्दा = एक बढ़िया पोस्ट !

बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

अनूप शुक्ल said...

इसई लिये कहा गया है -----समय होत बलवान! :)

रचना दीक्षित said...

काम के प्रति निष्ठा और लगन को नकारना इस व्यावसायिक दुनिया में अब अधिक संभव नहीं है फिर चाहें वह विक्सित हो विकाशशील.

जयकृष्ण राय तुषार said...

बहुत ही सुन्दर आलेख जो आंखे खोलने का काम करेगा |

Kailash Sharma said...

बहुत सार्थक आलेख...हमें समय के साथ बदलना होगा ...

ashwini kumar vishnu said...

"बाहर से आए लोगों में अंग्रेजों के मुक़ाबले काम के प्रति ज़्यादा समर्पण देखने को आता है वे अपना कार्य ज़्यादा निष्ठा से करते हैं और कम क़ीमत पर करते हैं " काफ़ी हद तक सही है। यह भी उतना ही सही है कि किसी भी शहर प्रांत या देश में कम काम करके अधिक से अधिक अर्थलाभ देने वाले कामों पर स्थानीय लोग ही क़ाबिज़ रहते हैं। बाहरी लोग तो पूरे जी जान से जुटे रहने के बावजूद स्थानीयों की आँखों में चुभते रहते हैं। कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो दूसरे देशों में बाहरी लोगों को औसत दर्जे के रोजगार मुहैया किए जाते हैं हर जगह, और ज़रा-ज़रा बात पर जब मन हुआ तब उन्हें चलता भी कर दिया जाता है । हमारे देश में तो बाहर के लोगों को लेकर हर बड़े शहर में रवैया बहुत ही ख़राब है: उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पूर्वोत्तर राज्यों के श्रमिक अथक-श्रम करने और निष्ठावान बने रहते हुए भी दिल्ली- मुंबई में बेवजह गुंडई का शिकार होते रहते हैं। मामला सीधे-सीधे रोजगार की उपलब्धता से जुड़ा है, वहाँ कमी हुई कि बहुस्तरीय आक्रोश उमड़ पड़ते हैं। विचारगर्भित लेख है, बहुत अच्छा लगा !

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

यही बात भारत में भी लागू होती है... यहाँ भी स्थानीय लोगों की जगह दूसरे स्थानों से आये लोग अधिक काम करते हैं.

kshama said...

Vikasit deshon ke logon ko apnee mansikata badalna zarooree hai! Bilkul sahee sawaal uthaya hai aapne!

प्रतिभा सक्सेना said...

अब सबके दिमाग़ ठिकाने आ जायेंगे .

ashish said...

हम तो रोज ही इस कार्य संस्कृति के निवाला बनते है . मेरे प्रतिष्ठान के यूरोपियन कार्यालय में ढेर सारी छुट्टी और हमसे ज्यादा कार्य की उम्मीद हमेश विचलित करती है . बाप दादा की जुटाई संपत्ति बहुत दिनों तक काम नहीं आती .एक दिन वो भी कोल्हू के बैल बनेंगे , समय बहुत दूर नहीं है. मियां मरदूद वो और जूती भी उनकी ही .

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सटीक!

रेखा श्रीवास्तव said...

ye vaqt vaqt kee bat hai, kabhi auron ka shoshan karne vale aaj halat ke shikar ho rahe hain aur hona bhi chahie.

S.N SHUKLA said...

सार्थक और सामयिक प्रस्तुति, आभार.

anju(anu) choudhary said...

इस तरह के लेख पढ़ने के बाद बहुत कुछ समझने और जाने को मिलता हैं ....ऐसे ही लिखती रहे ..आभार

sheetal said...

shikha ji.
mujhe nahi pata tha ki bade vikshit desh main bhi aisi samasya hain.
aisa to yahi bharat main sunane ko milta hain.

प्रवीण पाण्डेय said...

अधिक धन की चाह या स्वजन की चाह?

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

सच है शिखा बदलते समय के अनुसार स्वयं को भी ढलना ही होगा ...... जहाँ तक अपने काम के प्रति मेहनत और निष्ठा रखने की बात है कोई भी देश हो ,कैसा भी समय हो यह सोच हर व्यक्ति में होनी चाहिए ....

ktheLeo said...

शायद हम सब समझ पायें ये सच्चाई कभी तो।

Khushdeep Sehgal said...
This comment has been removed by the author.
Khushdeep Sehgal said...

मशहूर भारतीय उद्योगपति रतन टाटा को
अभी ब्रिटेन में अपनी एक कंपनी (शायद जगुआर कार) में ऐसे ही अनुभव से दो-चार होना पड़ा था..कंपनी के मालिक टाटा शाम को पांच बजे पहुंचे थे लेकिन ब्रिटिशर्स वक्त के इतने पाबंद हैं कि किसी ने भी उनसे मुलाकात के लिए रुकना गवारा नहीं समझा...इस पर मजबूरन टाटा को भारतीयों के काम के प्रति समर्पण का ज़िक्र करना पड़ा था...

जय हिंद...

अमित श्रीवास्तव said...

"एंटी इनकम्बेंसी" केवल चुनाव में ही नहीं अपितु सभी जगह ,घर,परिवार ,समाज ,कार्य क्षेत्र लगभग सभी जगह देखने को मिलने लगा है अब| स्वयम का विरोध करना फैशन सा हो गया है और यही विरोध छद्म रूप से धर्म निरपेक्ष और जात निरपेक्ष होने का श्रेय भी दिलाता है |

Atul Shrivastava said...

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर की गई है। चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

Suman said...

nice

वाणी गीत said...

अंग्रेज जब भारत आते थे तो उन्हें भारतीयों की जिंदगी आरामपरस्त लगती थी और उन्होंने इसका फायदा उठाया अपना शासन ज़माने में ...अब कुछ आदतें हमसे उधर में ली उन्होंने और हम भारतीय तो वहां सिर्फ कमा कर ही खुश हैं !

महफूज़ अली (Mahfooz Ali) said...

वन ऑफ़ द बेस्ट क्रियेशन एवर... ग्रैस्पफुल, इंटेलीजेंटली पेन्ड, वीवड सैगाशियसली, नेस्टिंग इन क्राफ्टेड मैनर, वैरी बियुटीफुल्ली सीज़ंड ऐज़ यू आर...

थैंक्स फोर शेयरिंग....

डू कीप इट अप...


ब बाय....

टेक केयर... एंड डू कीप पोस्टिंग सच अ राईट अप... इट शोज़ द बियुटी ऑफ़ माइंड ऐज़ वेल....

सदा said...

सार्थक व सटीक बात कही है आपने इस आलेख में ।

डॉ टी एस दराल said...

शिखा जी , कितनी अजीब बात है . अपने देश में काम न करने वाले विदेश में निष्ठा से काम करते हैं . इस विचार से तो अंग्रेज़ और भारतीय एक जैसे ही हुए .

Mithilesh dubey said...

हमेशा की तरह सही मुद्दे पर सारगर्भित आलेख लिखा है आपने ,बधाई आपको । लग रहा है कि मेरे मोबाईल मेँ कुछ दिक्कत है ,इसीलिए तो एक एडवांस टिप्पणी की भाषा समझ नहीँ पा रहा ।खैर आपका आभार

ajit gupta said...

जहाँ भी बाप-दादों का पैसा संचित है वहाँ यही मानसिकता दिखायी देती है। जब समाप्‍त हो जाता है तब ठेला भी चला लेते हैं।

Mukesh Kumar Sinha said...

apne ko bhartiya hone par garv ho raha hai..:) yaani ham bhartiya sach me mehnati hain naa:))
waise ek aur udaharan hai... main bihar se hoon, bihar ke majduron ki pahchaan pure desh me hai, aur aisa logo ko kahna hai wo khub mehnat karte hain... par fir bhi bihar me wo mehnat nahi kar pate..!
sayad aise hi britishers honge... unko bhejo yahan pe plats dhoyen...delhi me:D:D

दिगम्बर नासवा said...

बदलते समय के साथ बदलना जरूरी है पर अक्सर देखा गया ही की पुराने परिवेश में रहते हुवे बदलाव आसानी से नही आता ... ऐसे ही अपने शहर, समाज में रहते हुवे बदलाव जल्दी नहीं आता ... बाहर निकलने पर समझ आता है की दुनिया कहाँ है और बदलने में ही भलाई है ... जो अँगरेज़, अमेरिकन बाहर रहते हैं उनका वर्क कल्चर कुछ सुर है और ये बात दुबई में आम देखने को मिलती है ...

मनोज कुमार said...

कुछ जगहों (नाम लेना नहीं चाहता) और वहां के लोगों को सस्ता में काम करने वाला आदमी/लोग चाहिए। वह ज़रूरत बाहर से आए लोगों पूरा कर देते थे। फिर स्थानीय वे लोग उस काम को कर भी नहीं पाते। बाहर से आए लोग क्षमता, लगन और दक्षता में स्थानीय लोगों से बेहतर परिणाम देने का माद्दा रखते थे/हैं।
समस्या तो इस तरह की आनी ही थी, आएगी भी।

वन्दना अवस्थी दुबे said...

अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे :) बहुत सही मुद्दा.

सुधाकल्प said...

आपका लेख बहुत जानदार है। हुकूमत के दिन लद गए .इस युग में जीने के लिए संघर्ष करना ही पड़ेगा .

संजय भास्कर said...

समय के साथ बदलना जरूरी है

केवल राम : said...

सब मानसिकता की बात है ....लेकिन काम को काम ही समझना चाहिए ..काम छोटा या बड़ा नहीं होता ..बल्कि आपको सोंपा गया काम अगर आप निष्ठां से निभाते हैं तो वह आपकी महता को सिद्ध कर देता है ....आपने एक सार्थक विषय पर सही प्रकश डाला है ..!

सतीश सक्सेना said...

जो मेहनती होगा उसे ही काम मिलेगा ...
आपको शुभकामनायें !

निर्मला कपिला said...

सार्थक पोस्ट।

BS Pabla said...

किसी भी शहर/ देश का कथित रूप से विकसित होना वहां उपलब्ध प्रवासियों पर निर्भर होता है

फिर चाहे वह मुंबई पंजाब में बिहारियों की उपस्थिति हो या अमेरिका में कोलम्बस सरीखे लोगों का पहुँचना हो

रंजना said...

आपकी बातों से पूर्ण सहमति है...यह समस्या किसी एक देश या प्रदेश की नहीं, बल्कि पूरे विश्व की है..लेकिन एक बात बड़ी खटकती है...जो वर्ग अपने स्थान/प्रदेश से बाहर जा बारह पंद्रह घंटा खटने को तैयार रहता है(यानि कि उसकी कार्य क्षमता इतनी है), अपने देश /प्रदेश में वही अपने इस क्षमता का अर्धांश भी उपयोग नहीं करता, उसे यह अपनी तौहीन समझता है, प्रतिष्ठा के साथ जोड़कर देखता है...

Piush Trivedi said...

बढ़िया लेख इसे भी देखे :- http://hindi4tech.blogspot.com

JHAROKHA said...

shikha ji
bahut hi samyik mudda uthaya hai aapne aur bahut hi behatreen tareeke se apni baat bhi prastut ki hai.
salil bhai ji ki baat se mai bhi sahmat hun.
mera housla badhane ke liye bahut bahut dhanyvaad
behtreen aalekh
poonam

JHAROKHA said...

shikha ji
bahut hi samyik mudda uthaya hai aapne aur bahut hi behatreen tareeke se apni baat bhi prastut ki hai.
salil bhai ji ki baat se mai bhi sahmat hun.
mera housla badhane ke liye bahut bahut dhanyvaad
behtreen aalekh
poonam

lokendra singh rajput said...

काम को अपना समझकर नहीं करेंगे तो कौन काम पर रखेगा और काम को काम की तरह ही लेना चाहिए छोटा या बड़ा नहीं। आपने सही लिखा है कि जब बेरोजगारी भत्ता दिया जा रहा है तो किसी को क्या पड़ी है शॉप में जाकर बर्गर या कॉपी बनाने की। सार्थक विषय।

NISHA MAHARANA said...

sahi n satik aalekh

PRIYANKA RATHORE said...

bahut khoob....

काजल कुमार Kajal Kumar said...

काम ही नहीं, भारत ने 20 बिलियन डालर का जो जहाज़ ख़रीदने का आर्डर फ़्रांस को दिया है, उसे समझ ही नहीं आ रहा कि कोई विकासशील देश यह कैसे कर सकता है. भारत में आज बहुत बड़ी संख्या में विदेशी नौकरियों पर हैं... पर कुत्ते ही पूंछ यूं ही सीधी होती कहां है

काजल कुमार Kajal Kumar said...

कुत्ते ही = कुत्ते की

राजेश उत्‍साही said...

यह समस्‍या तो हर जगह है। जो बाहर से आते हैं वे कम पैसे में और अधिक समर्पण से काम करते हैं।

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

यह समस्या गाँव शहर व महानगर ,सभी जगह है । गाँव में माँ के लिये एक लडका पीने के पानी का एक कलशा लाने के लिये रखा था । पर दो दिन बाद ही उसके पिता ने यह कह कर कि हमारा लडका किसी का पानी क्यों भरें हटा लिया । पर उसी पिता को लडके का होटल में झूठी प्लेट धोना बुरा नही लगा । यही झूठा अहंकार है ।

Udan Tashtari said...

जरुरी है काम करना और लगन और निष्ठा से काम करना.जरुरत है समय के अनुसार वर्क कल्चर को समझने की.

बिल्कुल जी..यही जरुरी है.

उपेन्द्र नाथ said...

अपनी जमीं से उखड़े हुए लोग कुछ सम्मान पाने के लिए शायद पूरा जोर लगा देते है..... उदहारण के लिए बाहर के जिले से इलाहाबाद आकर पढने वाले सिविल सर्विस क्लियर कर लेते है मगर मकान मालिक के लड़के कुछ नहीं कर पाते.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

देखते हैं कि समस्या का क्या हल निकलकर सामने आता है। एक पक्ष आपने रखा दूसरा पक्ष यह भी है कि स्थानीय निवासियों के मुकाबले प्रवासियों का शोषण आसानी से हो जाता है। जो लोग एजेंटों और सरकारी कर्मचारियों को रिश्वतें देकर छिप-छिपाकर दूसरे देश पहुँचते हैं वे न्यूनतम मज़दूरी से कम पर भी काम करते हैं और अमानवीय परिस्थितियों में काम करते हुए भी अपने कानूनी अधिकारों की अनदेखी करने को तैयार रहते हैं और उन्नत देशों में भी कई व्यवसाइयों की पहली पसन्द बनते हैं।

P.N. Subramanian said...

Sundar post. Bharat ke kayi Pranton mein bhi aisi samasya khadi ho chuki hai

हरकीरत ' हीर' said...

शायद हर देश के महानगर की भी है.जहाँ काम की तलाश में बाहर से लोग आते हैं.इसे मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में भी मैंने महसूस किया .जहाँ दिल्ली में ज्यादातर जगहों पर दूरस्थ उत्तर पूर्वी राज्यों के युवाओं को ख़ुशी से संतुष्टि पूर्वक,मेहनत और निष्ठा से काम करते देखा क्योंकि अपने घर से बाहर आकर वहां रहने के लिए काम करना उनके लिए जरुरी है...

ये तो सी आम बात है .....घर की मुर्गी दाल बराबर ....
भारतियों को पैसा निष्ठावान बनता है ....

Unique said...

आपके द्वारा लिखी गयी बातें सच मुच में स्पन्दंसे जुड़ा है आपके द्वारा लिखी गयी बातें सच मुच में स्पन्दंसे जुड़ा है आपके द्वारा लिखी गयी बातें सच मुच में स्पन्दंसे जुड़ा है

डॉ. जेन्नी शबनम said...

ye sach hai ki khud ke liye jyada paisa chaahiye hota hai aur dusro ko dena ho to jitna kam ho utna dena chaahte hain. ye to vyavasaay ka buniyaadi dhancha aur manovigyan hai. angrejo ki baat ho ya fir apne desh ke mahanagron ki, dusre jagah log jyada mehnat se kaam karte hain, apne praant mein karna nahi chahte, na jaane kyon aisi maansikta hai. par aisa sarvatra hai. achchha aalekh.

Rakesh Kumar said...

"मियाँ की जूती मियाँ के सिर."
शीर्षक पढकर ही मजा आ गया है.

सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

आपके बारे में सदा जी की हलचल में
पढकर बहुत अच्छा लगा.

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