मैं मानती हूँ कि लिखा दिमाग से कम और दिल से अधिक जाता है, क्योंकि हर लिखने वाला खास होता है, क्योंकि लिखना हर किसी के बस की बात नहीं होती और क्योंकि हर एक लिखने वाले के लिए पढने वाला जरुरी होता है और जिसे ये मिल जाये तो "अंधे को क्या चाहिए दो आँखें" उसे जैसे सबकुछ मिल जाता है.और इसीलिए उसके यह कहने के वावजूद "कि कोई बड़ी बात नहीं है पर आपको बता रहा हूँ" मेरा ये पोस्ट लिखना जरुरी हो जाता है .आखिर हर एक ब्लॉगर भी जरुरी होता है और जो ब्लॉगर दूसरे ब्लॉगर के मना करने के वावजूद ना लिखे वो भला कैसा ब्लॉगर:):). इसीलिए सुनिए -
अभी कल... नहीं शायद परसों... अजी छोड़िये क्या फर्क पड़ता है .हाँ तो इन्हीं किसी एक दिन हमारे एक बहुत ही काबिल ब्लॉगर
अभिषेक कुमार अपने एक मित्र के साथ अपने शहर के एक मॉल में घूम रहे थे. अब ये तो बताने की जरुरत नहीं कोई विषय ही खोज रहे होंगे वहां. तो एकाएक पीछे से एक आवाज आई -
"are you blogger abhi?", i am buni..you write so well...i read your blog...i have seen you one or two times in this mall..but today decided to meet you."
अब बेशक अभि के लिए यह बड़ी बात ना हो हमने भी वैसे नापी नहीं कि बड़ी थी या छोटी. परन्तु ख़ुशी की बात तो अवश्य थी. आखिर किसी लिखने वाले के लिए इससे बड़ा पुरस्कार क्या हो सकता है कि कोई अनजान पाठक उसका लिखा गंभीरता से पढता है. मुझे यकीन है कि जरुर अभि को और उसके साथ उसके दोस्त को भी एक सेलेब्रिटी जैसा अहसास हो रहा होगा .और गर्व भी कि उसके दिल से निकली बातें वो जिस मेहनत से ब्लॉग पर सजाता है वह कितनी खास हैं, कितनी सुन्दर और कितनी जरुरी.
यूँ यह बात बेशक अभिषेक की है. परन्तु गर्व का मौका हम सब का है और शायद एक प्रेरणादायक वाकया भी , कि जो ब्लॉग हम में से कोई भी,यह सोच कर लिखता है कि हमारा ब्लॉग हमारी बपौती है.हम जो मर्जी लिखें, किसी को क्या लेना देना .तो हमें कुछ भी लिखते समय यह जरुर सोचना चाहिए कि बेशक ब्लॉग हमारा है और उस पर लिखने का अधिकार भी हमारा. परन्तु उसे पढने वाले अनगिनत हो सकते हैं. वे भी जो हमें जानते हैं और वे भी जो हमें बिलकुल नहीं जानते और जो हमारे लेखन से ही हमारे व्यक्तित्व का एक बुत बना लेते हैं. मुझसे कई बार कुछ लोग यह कहते हैं कि अरे वो पोस्ट ..वो तो हमने किसी को जलाने , सताने , मनाने, लुभाने वगैरह वगैरह के लिए लिखी थी. पर जरा सोचिये आपने जिसके लिए भी लिखी हो पर पढ़ी वो न जाने कितने जाने अनजाने लोगों ने होगी. और उन्हें तो यह बात नहीं मालूम कि ये आपने क्यों और किसके लिए लिखी थी. उनके लिए तो वह एक पोस्ट है और उसी से लेखक के प्रति एक धारणा उनके मस्तिष्क में बन जाती है. फिर बेशक वो आपके किसी खास परिस्थिति में लिखे एक वाक्य से ही क्यों ना हो.
एक लिखने वाला जब खुद को एक लेखक कहता है तो उसकी एक सामाजिक जिम्मेदारी भी बन जाती है
सोचिये जब यह ब्लोग्स नहीं थे. लिखने वाले तो तब भी थे परन्तु पाठक उनमें से कुछ खास किस्मत वालों को ही मिला करते थे और प्रतिक्रिया देने वाले भी सिमित हुआ करते थे. परन्तु ऐसे भी अनगिनत लिखने वाले हुआ करते थे जो चाहे कितना ही बेहतर क्यों नहीं लिखते उनका लिखा कुछ पन्नो में सिमित रह जाता होगा. पर आज हमारे पास ब्लॉग के रूप में एक ऐसा माध्यम है जहाँ हम बिना किसी परेशानी के अपनी अभिव्यक्ति असीमित वर्ग तक अनजाने ही पहुंचा देते हैं.और यदि आपने इमानदारी से लिखा है और वह पठनीय है तो अपना पाठक वर्ग खुद ही तलाश लेता है. आप बिना किसी खास परिश्रम के बन जाते हैं सेलेब्रिटी , आपके फैन्स भी बन जाते हैं, आपको अपना लिखना सार्थक लगने लगता है. और आपकी निष्ठा और मेहनत लेखन के प्रति और बढ़ती जाती है.
जैसा कि मुझे यकीन है कि अभि के साथ भी हुआ होगा. मुझे नहीं पता इस वाकये के बाद उस रात उसे नींद आई होगी या नहीं:) परन्तु मुझे विश्वास है कि अब उसकी लेखनी की धार और तेज़ होगी और दोगुने उत्साह से निरंतर चलती रहेगी.
तो आइये नियामत के रूप में मिले इस ब्लॉग को अभिव्यक्ति का एक सार्थक माध्यम बनाये. व्यक्तिगत कुंठा और शत्रुता का माध्यम नहीं. क्या मालूम राह चलते कभी आपको भी आपका कोई अनजान पाठक मिल जाये तो आपको अपने उस पाठक से नजरे मिलाने में ख़ुशी और गर्व हो , शर्मिंदगी नहीं.
अभी कल... नहीं शायद परसों... अजी छोड़िये क्या फर्क पड़ता है .हाँ तो इन्हीं किसी एक दिन हमारे एक बहुत ही काबिल ब्लॉगर
अभिषेक कुमार अपने एक मित्र के साथ अपने शहर के एक मॉल में घूम रहे थे. अब ये तो बताने की जरुरत नहीं कोई विषय ही खोज रहे होंगे वहां. तो एकाएक पीछे से एक आवाज आई -
"are you blogger abhi?", i am buni..you write so well...i read your blog...i have seen you one or two times in this mall..but today decided to meet you."
अब बेशक अभि के लिए यह बड़ी बात ना हो हमने भी वैसे नापी नहीं कि बड़ी थी या छोटी. परन्तु ख़ुशी की बात तो अवश्य थी. आखिर किसी लिखने वाले के लिए इससे बड़ा पुरस्कार क्या हो सकता है कि कोई अनजान पाठक उसका लिखा गंभीरता से पढता है. मुझे यकीन है कि जरुर अभि को और उसके साथ उसके दोस्त को भी एक सेलेब्रिटी जैसा अहसास हो रहा होगा .और गर्व भी कि उसके दिल से निकली बातें वो जिस मेहनत से ब्लॉग पर सजाता है वह कितनी खास हैं, कितनी सुन्दर और कितनी जरुरी.
यूँ यह बात बेशक अभिषेक की है. परन्तु गर्व का मौका हम सब का है और शायद एक प्रेरणादायक वाकया भी , कि जो ब्लॉग हम में से कोई भी,यह सोच कर लिखता है कि हमारा ब्लॉग हमारी बपौती है.हम जो मर्जी लिखें, किसी को क्या लेना देना .तो हमें कुछ भी लिखते समय यह जरुर सोचना चाहिए कि बेशक ब्लॉग हमारा है और उस पर लिखने का अधिकार भी हमारा. परन्तु उसे पढने वाले अनगिनत हो सकते हैं. वे भी जो हमें जानते हैं और वे भी जो हमें बिलकुल नहीं जानते और जो हमारे लेखन से ही हमारे व्यक्तित्व का एक बुत बना लेते हैं. मुझसे कई बार कुछ लोग यह कहते हैं कि अरे वो पोस्ट ..वो तो हमने किसी को जलाने , सताने , मनाने, लुभाने वगैरह वगैरह के लिए लिखी थी. पर जरा सोचिये आपने जिसके लिए भी लिखी हो पर पढ़ी वो न जाने कितने जाने अनजाने लोगों ने होगी. और उन्हें तो यह बात नहीं मालूम कि ये आपने क्यों और किसके लिए लिखी थी. उनके लिए तो वह एक पोस्ट है और उसी से लेखक के प्रति एक धारणा उनके मस्तिष्क में बन जाती है. फिर बेशक वो आपके किसी खास परिस्थिति में लिखे एक वाक्य से ही क्यों ना हो.
एक लिखने वाला जब खुद को एक लेखक कहता है तो उसकी एक सामाजिक जिम्मेदारी भी बन जाती है
सोचिये जब यह ब्लोग्स नहीं थे. लिखने वाले तो तब भी थे परन्तु पाठक उनमें से कुछ खास किस्मत वालों को ही मिला करते थे और प्रतिक्रिया देने वाले भी सिमित हुआ करते थे. परन्तु ऐसे भी अनगिनत लिखने वाले हुआ करते थे जो चाहे कितना ही बेहतर क्यों नहीं लिखते उनका लिखा कुछ पन्नो में सिमित रह जाता होगा. पर आज हमारे पास ब्लॉग के रूप में एक ऐसा माध्यम है जहाँ हम बिना किसी परेशानी के अपनी अभिव्यक्ति असीमित वर्ग तक अनजाने ही पहुंचा देते हैं.और यदि आपने इमानदारी से लिखा है और वह पठनीय है तो अपना पाठक वर्ग खुद ही तलाश लेता है. आप बिना किसी खास परिश्रम के बन जाते हैं सेलेब्रिटी , आपके फैन्स भी बन जाते हैं, आपको अपना लिखना सार्थक लगने लगता है. और आपकी निष्ठा और मेहनत लेखन के प्रति और बढ़ती जाती है.
जैसा कि मुझे यकीन है कि अभि के साथ भी हुआ होगा. मुझे नहीं पता इस वाकये के बाद उस रात उसे नींद आई होगी या नहीं:) परन्तु मुझे विश्वास है कि अब उसकी लेखनी की धार और तेज़ होगी और दोगुने उत्साह से निरंतर चलती रहेगी.
तो आइये नियामत के रूप में मिले इस ब्लॉग को अभिव्यक्ति का एक सार्थक माध्यम बनाये. व्यक्तिगत कुंठा और शत्रुता का माध्यम नहीं. क्या मालूम राह चलते कभी आपको भी आपका कोई अनजान पाठक मिल जाये तो आपको अपने उस पाठक से नजरे मिलाने में ख़ुशी और गर्व हो , शर्मिंदगी नहीं.
* और अब एक और बात - आज ही भारत में रूसी उच्चायुक्त श्री एलेक्जेंडर कदाकिन का मेरी पुस्तक "स्मृतियों में रूस " पर प्रतिक्रया स्वरुप एक पत्र मिला है :) आप भी पढ़िए .

Abhishek jaisee ghatna hamare saath bhi ghate,... abhi to bas yahi soch sakte hain.. waise bahut sahi kaha aapne.. sarthak blogging ki bahut jarurat hai.. bina ade bhide ham apni baat kahen... aur kisi kee post ko galat kah sakte hain.. par uss vyakti ko bura banane se bachchen...!!
ReplyDeletearre haan bhul hi gaye... bade log... itna behtareen hindi me patra rusi rajdoot se paane ke liye bahut bahut badhai...:))
अरे वाह!!! यह तो बहुत ही अच्छा वाक्य बताया आपने जानकार बहुत अच्छा लगा। काश हमें भी जाने अंजाने लोगों के बीच ऐसी की पहचान मिले :) आपकी लिखी बातों से पूर्ण सहमति है। और हाँ श्री एलेक्जेंडर कदाकिन की पत्र रूप मे प्रतिक्रिया हेतु बहुत-बहुत बधाई।
ReplyDeleteyah ek aisa manch jaha aap khul kar apni baat kahte hay,aur aap ko samja jata hay.muj ko yaha ki kai samagri padne me bada aanand aaya,kirpaya badhai swikar kare.
ReplyDeleteदिल से लिखी रचनाएँ दिल और दिमाग दोनों को झकझोरती हैं , दिमाग से भी लिखा जाता है और उसमें थोड़ी कठोरता भी होती है ... पर जब ब्लॉग की पहचान कोई और करता है , उस वक़्त की ख़ुशी को नापा नहीं जा सकता . अभिषेक जी को भी उतनी ही ख़ुशी हुई होगी , जितनी पढकर हमें हो रही है . कहीं छापना , किसी की चर्चा में आना ---- यही तो हैं हमारी छोटी छोटी उपलब्धियां !
ReplyDeleteकिताब के लिए जो पत्र मिला है , वह तुम्हारे साथ भारत का सम्मान है - शुभकामनायें
भारत में रूसी उच्चायुक्त श्री एलेक्जेंडर कदाकिन ने आपकी पुस्तक को सराहा ....बहुत बधाई ...!!
ReplyDeleteसही कहा है आपने |मैं पूरी तरह सेहमत हूं कि हमे आज सार्थक ब्लोगिंग की ज्यादा आवश्यकता है ...!!
अभि को अपने अच्छा लिखने का पुरस्कार मिल गया|अच्छा लगा पढ़कर |
पहले बधाई स्वीकारें, आपकी उपलब्धियों एवं प्रभाव के लिए जिसके होते रूस के राजदूत ने आपको धन्यवाद दिया है ....
ReplyDeleteमुझे गर्व है कि हमारी एक बेटी को, विदेशों में भी सम्मान मिल रहा है !
@
तो आइये नियामत के रूप में मिले इस ब्लॉग को अभिव्यक्ति का एक सार्थक माध्यम बनाये. व्यक्तिगत कुंठा और शत्रुता का माध्यम नहीं. क्या मालूम राह चलते कभी आपको भी आपका कोई अनजान पाठक मिल जाये तो आपको अपने उस पाठक से नजरे मिलाने में ख़ुशी और गर्व हो , शर्मिंदगी नहीं.
बदकिस्मती है कि हिन्दी ब्लोगिंग में वह परिपक्वता देखने को नहीं मिलती जिसकी हमसे उम्मीद की जानी चाहिए थी !
जहाँ हम स्वंतंत्र तौर पर अपने अपने विचार लिखते हैं वहीँ एक खेद जनित परस्पर द्वंद्व दिखने लगा है ! गूगल से मुफ्त की लेखनी और प्रेस पाकर हम अपने आपको दुनिया का सबसे बड़ा साहित्यकार समझते हैं , जिसका साहित्य लोगों की समझ से बाहर है !
और इस गर्व के होते एक दूसरे का सर फोड़ने के लिए भी तैयार हैं !
घर की गुस्सा और कुंठा कलम के जरिये समाज में झोंकने के लिए कमर कसे तैयार दीखते हैं !
यहाँ हर कोई अपना पढ़ाने के लिए बेचैन है पढना कोई नहीं चाहता !
शायद समय कुछ कर सके ...
तुम्हारी प्रतिभा को नमस्कार एवं अगले शीर्ष पर देखने के लिए शुभकामनायें !!
हाए ! काश कोई कद्रदान हमें भी मिल जाए तो अपनी भी लेखनी में धार आ जाए । :)
ReplyDeleteसचमुच शिखा जी , यह तो बहुत बड़ी उपलब्धि है यदि एक भी बंदा आकर आपके लेखन की तारीफ करता है । निश्चित ही , इससे और बेहतर लिखने का प्रोत्साहन मिलता है ।
लेकिन क्या करें , कभी कभी पर ब्लॉग्स पर चहुलबाज़ी भी हो ही जाती है ।
शिखा जी आपने बिल्कुल सही कहा । लेखक की सामाजिक जिम्मेदारी भी होती है । यह आशाजनक है कि आप या अभिषेक जी जैसे अनेक ब्लाग-लेखक इस जिम्मेदारी को निभा रहे हैं । आपका आलेख सारगर्भित है ।
ReplyDeleteशिखा जी आपने बिल्कुल सही कहा । लेखक की सामाजिक जिम्मेदारी भी होती है । यह आशाजनक है कि आप या अभिषेक जी जैसे अनेक ब्लाग-लेखक इस जिम्मेदारी को निभा रहे हैं । आपका आलेख सारगर्भित है ।
ReplyDeleteवो अभि वाली बात कुछ आगे भी बढ़ी या उत्ती ही रही।
ReplyDeleteबाकी आपने बहुत अच्छा संदेश दिया। भाईचारा बढ़ाने के ऐसे ही संदेश जरूरी होते हैं।
रूसी उच्चायुक्त श्री एलेक्जेंडर कदाकिन के पत्र के लिये बधाई!
शिखा जी ,अंतरजाल पर हम जो लिखते है और सोचते है की बस मन हल्का कर लिया पर ऐसा नहीं होता ....हम अकेले में भी चीखते है तो हमारी आवाज़ हम तक आती है ...मेरे ब्लॉग का जिक्र जब हिन्दुस्तान times में रवीश जी ने किया था तो मैं झटका खा गई थी कि मेरे लिखे को कोई इतनी गंभीरता से ले रहा है ... आपको और अभिषेक जी को बधाई ..
ReplyDeleteअभिषेक तो वैसे भी बहुत अच्छा लड़का है.. और मैं तो उसका फैन हूँ ही.. .उससे जब पहली बार मिला था तो ऐसे लगा था कि बहुत पहले से जानता हूँ... और उसके लेखन की तो बात ही अलग है.. यह बात तो आपकी सही है कि लेखन हमारे व्यक्तित्व का आइना होता है. यहाँ जब लोग पर्सनल होते हैं.. तो कई तरह से पोस्टें लिखी जातीं हैं.. अभी ब्लॉग जगत को मैच्योर होने में बहुत टाइम है.... यहाँ उम्र और मैच्योरिटी में बहुत डिफ़रेंस है.. अभि छोटा है लेकिन बहुत मैच्योर है.. वहीँ यहाँ .. कई पचास पार हैं.. फ़िर भी चाइलडिश हैं.. तो जब तक के बिहेवियरल मैच्योरिटी नहीं आएगी.. तब के लेखन में अनाप शनाप देखने को मिलेगा.. और कई बार क्या है कि यहाँ लोगों ने ख़ुद को साहित्यकार घोषित कर रखा है.. भले ही कोई माने या ना माने.. कोई एजेंसी रिकौग्नाइज़ करे या ना करे.. लेकिन ख़ुद को ज़बरदस्ती साहित्यकार घोषित कर रखा है.. जैसे देखता हूँ कि लोग अपने घरों का नाम साहित्य सदन या साहित्यकार भवन रख देते हैं.. अब भाई वाईट हाउस रख दो... लोकसभा रख दो.. उससे कुछ थोड़े ही ना हो जायेगा.. तो अगर कोई लेखक है.. तो सबसे पहले लेखन उसके लिखने में दिखना चाहिए.. अगर इन्सान पढ़ा लिखा होता है तो सबसे पहले उसकी शक्ल बोलती है... बात करने का अंदाज़ बोलता है.. हम जिस कैटेगरी के होते हैं.. वही छाप हमारे चेहरे पर आ जाती है.. उसी तरह लेखन होता है.. जब हम किसी भी चीज़ से तंग आ जाते हैं.. तो चिडचिडाहट में जलाने , ताने मारने.. सताने जैसी पोस्टें लिखने लगते हैं.. यहाँ ब्लॉग जगत को ख़ुद ही मैच्योर होना पड़ेगा.. जब तक तक बिहेवियरल मैच्योरिटी नहीं आएगी.. अभिषेक जैसा होना मुश्किल है..
ReplyDeleteअच्छा! मेरा एक चीज़ और मानना है ..जब इन्सान दिल से सुंदर होता है तो चेहरा उसका अपने आप सुंदर हो जाता है.. और जब चेहरा सुंदर होता है... तो उसका टैलेंट भी सुंदर होता है... और जो भी टैलेंट होता है.. वो ऐसी ही सुंदर पोस्टों के रूप में बाहर निकलता है.. आपको रशियन ऐम्बैज़डर की तरफ से प्रतिक्रिया की बहुत बहुत बधाई.. और ऐसी ही पोस्टें लिखतीं रहें.. मैं तो आपका भी बहुत ही बड़ा (लखनऊ से लेकर लन्दन तक बड़ा वाला) फैन हूँ...
दिल से लिखी रचनाएँ सबको ही प्रभावित करती हैं ... पाठक स्वयं ही उन तक पहुँच जाते हैं ...ब्लॉग से किसी ब्लॉगर की इस तरह पहचान बनना उसके लेखन की सार्थकता को बताता है ... अभिषेक जी को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं ॥
ReplyDeleteसच कहा कि इस वाकये को जान कर हर एक ब्लॉगर की ज़िम्मेदारी बन जाती है कि अच्छा लिखें ...क्योंकि यही हमारी पहचान है ....
स्मृतियों में रूस पर प्राप्त पत्र भी कुछ ऐसी ही ज़िम्मेदारी का आभास करा रहा है ... बहुत बहुत बधाई ...
चार महीने पहले ब्लाग लिखना शुरू किया था मैने भी ....चालीस से ज्यादा मित्र बन चुके हैं जिनसे फोन मेल और लाइव चैट भी हो चुकी है ........मै लेखक नही हूं मेरे खानदान में आज तक कोई नही हुआ पर मै जो घूमता हूं वेा लिख देता हूं बस ऐसे ही कुछ लोग हैं जो उन्हे पसंद करते है और इसलिये आज आपकी सोलह आने सही बात बडी अच्छी लगी
ReplyDeleteइस लेख के लिये और आपको मिले पत्र के लिये साधुवाद
हमारी भी मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए...हमें भी आपके लेख अच्छे लगते हैं... वाक़ई आप ऐसी बेटी हैं, जिस पर किसी को भी नाज़ होगा...
ReplyDeleteनालंदा में आयोजित एक कवि सम्मेलन में मैं एक नई ताज़ी लिखी रचना सुनाकर बैठने जा रहा था, तो एक सज्जन बोले सर ज़रा “मन तरसे इक आंगन को” सुनाइए। मुझे आश्चर्य हुआ कि लोग मेरी रचना को शीर्षक एक साथ याद रखे हुए हैं और पसंद करते हैं और फ़रमाइश कर सुनना चाहते हैं। मैंने सुनाया ...!
ReplyDeleteअखबार और पत्रिका के लोगों की नज़र तो लगी ही रहती है ब्लॉग जगत के लोगों पर।
ऐसा कोई पाठक या प्रशंसक जब मिल जाता है, तो लगता है हमारी जिम्मेदारी और बढ़ गई है। कुछ लिखने के पहले ख़ुद को कई बार ख़ुद से तौलना पड़ता है।
रचना और दिल से लिखी गई पर हमने एक पोस्ट ही लिख मारा था - अगर चाहें तो यहां देख सकते हैं
दिल से लिखी गई रचना
एक रचनाकार के लिये इससे बढकर और कोई पुरस्कार या सम्मान नही हो सकता कि वह आम पाठक वर्ग मे अपनी पहचान बना ले और इसके लिये अभिषेक जी को हार्दिक बधाई…………और तुम्हें भी तुम भी तो देश और ब्लोगिंग का नाम रौशन कर रही हो…………हार्दिक बधाई और शुभकामनायें।
ReplyDeleteसर्वप्रथम आपको बहुत-बहुत बधाई इस पत्र की प्राप्ति पर बहुत ही सही कहा है आपने ... आपकी बातों से पूर्णत: सहमति रखती हूँ ..
ReplyDeleteबहुत सटीक बात कही है आपने।
ReplyDeleteरूसी उच्चायुक्त का यह पत्र संग्रहणीय है ;हार्दिक बधाई!
सादर
आपको और अभिषेक को बहुत बहुत हार्दिक बधाइयाँ !
ReplyDeleteसार्थक लेखन की सबकी अपनी परिभाषा होती है और कोई अपने हिसाब से सार्थक और कालजई ही लिखने की कोशिश करता है .दिल दिमाग दोनों एकसाथ काम करे तभी तो लिखा जा सकता है . दिमाग गड़बड़ हुआ तो उटपटांग लेखन और दिल लगा के नहीं लिखा तो केशवदास .हम तो पार्ट टाइम वाले ब्लोगर है और ये वाला मुगालता नहीं पाला की हमको कोई पहचानेगा , अब अंगूर खट्टे है ऐसा कह लीजिये. अभिषेक को मैंने कई बार पढ़ा है , एकदम दिल से डैरेक्ट लिखते है . डूबकर . कोई बनावट नहीं . कही दिखावे वाली स्मायली नहीं , सब कुछ एकदम प्राकृतिक . ऊपर से आत्मश्लाघा से बहुत दूर . अब अगर दिल्ली में मुझे भी कही दिख जाए तो पहचान तो लूँगा ही ना एक पाठक के बतौर .बहरहाल उनको मेरी ढेरों मुबारकवाद और शुभकामनायें .
ReplyDeleteपुनश्च आपकी किताब के बारे में श्रीमंत कदाकिन का पत्र हिंदी में देखकर आश्चर्य जनित प्रसन्नता हुई . उनके अनुसार आपकी पुस्तक निष्कपट है जैसा की भारत और रूस के सम्बन्ध . मुबारकां .
रूसी उच्चायुक्त श्री एलेक्जेंडर कदाकिन के पत्र के लिये बधाई!....सार्थक लेख!
ReplyDeleteअभी ऑफिस से लौटा हूँ और सोचकर आया था कि यह पोस्ट लिखूंगा.. और मेरी पोस्ट चोरी हो गयी!!
ReplyDeleteऊपर वाली पोस्ट के लिए कुछ नहीं कहूँगा मगर दूसरी पोस्ट की बधाई!!
ये तो एक्स्ट्रा लार्ज खबर है..वो दूसरी वाली...आपको बहुत बहुत बधाई दीदी..देखिये एक्स्ट्रा लार्ज खबर इसे कहते हैं, ना की मेरे वाली खबर को :)
ReplyDeleteएनीवे..
दीदी, मेरे से सबसे बड़ी गलती ये हो गयी की मैंने उसकी डिटेल नहीं ली..ये भी नहीं पूछा की और किसके ब्लॉग अच्छे लगते हैं आपको...
अरे, अकरम और मैं कुछ बेहद गंभीर मुद्दों पर बातें करते जा रहे थे की ये सब एकदम अचानक से हो गया...मैं संभल ही नहीं पाया...और बस उसने ही जो जो कहना था कहा...और मैं कुछ भी पूछ नहीं पाया..बस हलकी बात होकर रह गयी :)
वैसे ये बात तो है..की लाख उत्साह बढ़ाने वाले कमेन्ट आ जाए, लेकिन अगर ऐसा एक भी कोई मिलता है जो इस तरह आपकी तारीफ़ करता है तो उत्साह में जबरदस्त इजाफा होता है :)
भारत में रूसी उच्चायुक्त श्री एलेक्जेंडर कदाकिन के पत्र के लिए बहुत बधाई....
ReplyDeleteबड़े गर्व की बात है.......
ऐसे पल आपके जीवन में और भी आये.....
शुभकामनाएँ
अनु
Badhiya qissa! Aapkee shaili bhee kamaal kee hai!
ReplyDeleteहिंदी और हिंदुस्तान दोनों गौरवान्वित हुए | आपको बधाई |
ReplyDelete"लेखन" सदा संजीदगी से ही करना चाहिए |
कोई पढ़े अथवा न पढ़े |
यदि आपने इमानदारी से लिखा है और वह पठनीय है तो अपना पाठक वर्ग खुद ही तलाश लेता है. आप बिना किसी खास परिश्रम के बन जाते हैं सेलेब्रिटी , आपके फैन्स भी बन जाते हैं, आपको अपना लिखना सार्थक लगने लगता है. और आपकी निष्ठा और मेहनत लेखन के प्रति और बढ़ती जाती है.
ReplyDeleteआपने सही कहा,,,,
पत्र के लिये बधाई,,,,,,
MY RECENT POST,,,,,काव्यान्जलि,,,,,सुनहरा कल,,,,,
पत्र आसानी से नहीं बांचा जा पा रहा है, बहरहाल बधाई.
ReplyDeleteअभिषेक जी के ब्लाग में वो बात होती है, इसलिए ऐसा स्वाभाविक है.
निष्कपट पुस्तक को भारत और रूस के बीच एक और सेतु कहा गया है, आपके लिए गौरव और हम सब के लिए प्रसन्नता की बात है, पुनः बधाई.
ReplyDeleteआसानी से मिली चीज की क़द्र नहीं कर पते हम लोग ।बहुत सुन्दर आलेख ।आपको बहुत बधाई और अनेक शुभकामनाये ।
ReplyDeleteब्लॉगर मंच उन लोगों के लिए तो वरदान है ही जो थोड़ी बहुत फुर्सत निकल कर लिखते हैं , पढ़ते हैं . जो लोंग अपना पैसा खर्च कर अपनी ख़बरें , किताबे प्रकाशित करवा सकते हैं , उन्हें शायद इसकी क़द्र नहीं है ! उसने हमको जवाब दिया , हम उसको जवाब देंगे , इसी फेर में हिंदी ब्लॉगिंग की साख को नुकसान पहुँच रहा है तो किसी को इसकी परवाह नहीं ! काश कि इस देश में रहने वाले भारतीय भी हिंदी पर गर्व करें !!
ReplyDeleteसार्थक चिंतन !
बहुत बधाई और शुभकामनायें !
लेखक का समाज के प्रति भी दायित्व होता है शब्दों मे बहुत शक्ति होती है जिसके सदुपयोग मेंही लेखन की सार्थकता है.
ReplyDeleteलिखना सफल हो जाता है जब कोई उसके द्वारा हमें पहचानता है.
आपकी लेखनी को सम्मान मिला -बधाई !
जानकर ख़ुशी हुई , बधाई स्वीकारें.....
ReplyDeleteशायद आपको यह मालूम न हो और आपकी अनुमति से यह न किया गया हो लेकिन हमारे यहाँ एक पापुलर न्यूज पेपर है नवभारत उसमें संडे स्टोरी में आपकी आवरण कथा छपी है। अभि वाली स्टोरी देखकर मुझे यह याद आ गया पिछले रविवार का यह वाकया है।
ReplyDeleteअभिषेक के चाहने वाले बंगलोर में अब भी घूमते हुये मिल जाते हैं। राजदूत का पत्र निश्चय ही उत्साह बढ़ाने वाला है।
ReplyDeleteप्रवीण भैया...आपने उन लोगों को कोफ़ी वैगरह पिलवाई या नहीं :D
ReplyDeleteआपकी बातें हम सब सुनें यही कामना है।
ReplyDeleteसबसे पहला काम बधाई स्वीकारें . लेखन आपके चिंतन का लिपिबद्ध अंकन है.
ReplyDeleteऔर जैसा आपने कहा ..... ब्लॉग में डालना पूरी इमानदारी से तब ही आपके विचारवान
होने का मजा और औचित्य .......... ज्यादा क्या लिखू लोग सब समझते हैं ...
इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - माँ की सलाह याद रखना या फिर यह ब्लॉग बुलेटिन पढ़ लेना
ReplyDeleteशिखाजी हमारा लेखन ही तो हमारे और पाठकों के बीच का सेतु होता है ...उसे जितना मज़बूत और सुन्दर बनायेंगे ...उतना ही वह पाठकों के करीब लायेगा ......और अपने मनकी बात अगर सच के पुख्ता नीव पर न खड़ी हो ...तो वह किसीको कभी भी प्रभावित नहीं कर पायेगी .....और हाँ भारत को गौरान्वित करने के लिए बहुत बहुत बधाई ...!!!!
ReplyDeleteभारत में रूसी उच्चायुक्त श्री एलेक्जेंडर कदाकिन के पत्र के लिए बहुत बधाई....
ReplyDeleteहमें लेखन कार्य पूरी संजीदगी से करना चाहिए |
सच कहा आपने हमें वही लिखना चाहिये जिसके लिये हमें कभी शर्मिदा ना होना पडे ।
ReplyDeleteआपकी किताब की प्रशंसा पत्र के लिये बधाई । ब्लॉगिंग का यह मंच वाकई एक नियामत है ।
ब्लॉग के विषय में आपने बहुत सही कहा है....
ReplyDeleteऔर आपको इस विशेष उपलब्धि के लिए बधाई :-)
सार्वजनिक रूप से जब आप अपने विचार रखते हैं तो उनमें भाषा का संतुलन तो होना ही चाहहिये ... ब्लोगिंग भी एक सार्वजनिक मंच है ...
ReplyDeleteकाश हमें भि ऐसी कोई पहचान मिले ... माल में तो मैं भी खूब जाता हूँ घूमने ... हा हा ...
आपको इतना सम्मान मिला समझिए हमें भी सामान मिला भारतीय के नाते ... बहुत बहुत बधाई ...
ब्लॉग के बारे में तो नही जानता हूं, कभी लिखा नही लेकिन इसे मैं बहुत बड़ी उपलब्धि मानता हूं कि जिस देश के बारे में किताब लिखा गया उस देश का उच्चायुक्त खुद हिन्दी में पत्र लिख कर रिकौग्नाईज़ करे..तारीफ़ और शुभ कामना दे...असीम बधाई.
ReplyDeleteसोच रहा हूँ...जरा नहीं बहुत सोच रहा हूँ। कितनी अच्छी और जरूरी बात लिखी है आपने यह सोच रहा हूँ। ब्लॉगिंग को पुस्तक में बदलते और पुस्तक को अपना सम्मान पाते सोच रहा हूँ। जिस मुल्क के संस्मरण लिखे उस मुल्क के उच्चायुक्त के पत्र की सुंदर अभिव्यक्ति के बारे में सोच रहा हूँ। अभिषेक की खुशी के बारे में सोच रहा हूँ। सोच रहा हूँ कि कहीं कभी जाने अनजाने मैने कभी कुछ गलत तो नहीं लिखा था। अंत में यह सोच सोच कर भी पुलकित हो रहा हूँ कि अभि और शिखा जैसे बड़े ब्लॉगर मेरा लिखा भी पढ़ते हैं।
ReplyDelete..आभार लेख के लिए, बधाई सम्मान के लिए।
"एक लिखने वाला जब खुद को एक लेखक कहता है तो उसकी एक सामाजिक जिम्मेदारी भी बन जाती है"
ReplyDeleteश्री एलेक्जेंडर कदाकिन ने आपकी पुस्तक को सराहा ....बहुत बधाई
बहुत बेहतरीन व प्रभावपूर्ण रचना....
ReplyDeleteमेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।
उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...
ReplyDeleteबहुत सही कहा, ब्लॉगर हो या लेखक सदैव अपनी गरिमा बना कर रखनी चाहिए और ऐसा लिखें कि न कोई आहत हो न खुद शर्मसार. आपकी पुस्तक की सराहना में रूस के उचायुक्त का हिन्दी में पत्र प्रशंसनिए है. बधाई.
ReplyDeleteसही कहा, नेक सलाह! लेकिन सब तो अभिषेक (और आप) जैसे गरिमावान नहीं हो सकते बेचारे, फिर भी खबरों में रहना चाहें तो क्या करें. आपको मिले प्रशंसापत्र के लिए बधाई !
ReplyDeleteपत्र के लिए बधाई...
ReplyDeleteअभिषेक भाई की तरह अनूठी ख़ुशी का आनंद मैं भी ले चूका हूँ.. अपनी लास्ट पोस्ट में इस बात का जिक्र भी किया है...